विकास समन्वय एवं निगरानी समिति की बैठक में गूजर की नौटंकी फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) पहले मोदी लहर पर सवार होकर और अबकी बार चुनाव आयोग की मेहरबानी से संसदीय चुनाव जीत कर केन्द्रीय मंत्री बने कृष्णपाल गूजर, बीते 11 साल से लगातार इस शहर की निगरानी करते आ रहे हैं। उस निगरानी के फलस्वरूप शहर की जनता जो भुगत रही है वह किसी से छिपा नहीं है। टूटी सड़कें, उफनते सीवर, सड़कों पर ट्रैफिक जाम, स्कूलों व अस्पतालों की दुर्दशा, जगह-जगह लगे कूड़े के ढेर, सड़कों पर घूमते आवारा पशु तो जनता की परेशानी का कारण बने हुए ही हैं। बरसात के मौसम में हर साल होने वाला जल-भराव जनता की परेशानी को अत्यधिक बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ता। जबकि बरसात से पहले करोड़ों रुपये के टेंडर नालों की सफाई एवं जल निकासी के नाम पर छोड़े जाते हैं। सड़कों से उड़ती धूल, फैक्टरियों व कूड़े के जलते ढेरों से उडऩे वाला धुआं शहर के वायु-प्रदूषण को बढ़ाने में कोई कमी नहीं छोड़ते। इसके बावजूद कृष्णपाल, समिति की बैठक में कहते हैं कि वे प्रशासन की लापरवाही बर्दाश्त नहीं करेंगे।
मंगलवार दिनांक 23 दिसम्बर को लघु सचिवालय के सभागार में हुई उक्त समिति की बैठक में जि़ले के तमाम उच्चाधिकारियों को अपनी नाटकीय शैली में हड़काते हुए उन्होंने कहा कि शहर के विकास कार्यों में कोई कोताही एवं लापरवाही न बरती जाए। उन्होंने यह नहीं कहा कि यदि उच्चाधिकारी लापरवाही बरतेंगे तो वे उनका क्या कर देंगे? विदित है कि इस तरह की हड़काऊ भाषणबाजी, मंत्री जी बीते 11 साल से करते आ रहे हैं, उसके बावजूद धरातल पर कहीं कोई अमल होता नजर नही आ रहा। सारे काम ज्यों के त्यों चल रहे हैं। सड़क बनाने के काम हों या जल निकासी के या फिर सफाई आदि के, हर काम के लम्बे-चौड़े टेंडर जारी करके करोड़ों रुपये डकार लिए जाते हैं, लेकिन परिणाम के नाम पर वही ढाक के तीन पात। हां, एमसीएफ वालों को निकम्मा एवं चोर बता कर अनेकों काम एफएमडीए को सौंप दिए गए हैं। उन्होंने तो एमसीएफ से भी बढ़ कर लूट मचाई है। एमसीएफ वाले जहां गजों से नापते थे वहीं एफएमडीए वाले लाठियों से नापते हैं।
उक्त दोनों महकमों से बढ़ कर लूट के जो नए कीर्तिमान स्मार्ट सिटी लिमिटेड कम्पनी ने बनाए हैं उनका तो कोई मुकाबला ही नहीं। शहर को स्मार्ट बनाने का जो काम एमसीएफ से कराया जा सकता था, उसके लिए स्मार्ट सिटी कम्पनी का गठन करके उन चोर अफसरों को तैनात किया गया जो कभी एमसीएफ अथवा ‘हूडाÓ में लूट कमाई के रिकॉर्ड तोड़ कर रिटायर हो चुके थे। उन्हें घर से बुलाकर और लूट कमाई करने का मौका दिया गया।उनका यहअनुभव, उन उच्चाधिकारियों के लिए आवश्यक था जो इस धंधे में नए-नए तैनात हुए थे। पांच हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च करने के बावजूद यह शहर कितना स्मार्ट बन सका, किसी से पूछने की जरूरत नहीं। शहर में बने तीन रेलवे अंडरपास चार बूंद बरसते ही बंद हो जाते हैं और कोई गलती से इनमें फंस जाए तो जिंदा नहीं बचता। विदित है कि बीते दिनों ओल्ड $फरीदाबाद वाले अंडरपास में दो बैंककर्मी अपनी कार सहित डूब मरे थे। इसमें फंसने वाले वाहनों की तो कोई गिनती ही नहीं। बुढिय़ा नाले के निकट स्थित अंडरपास में भी अनेकों लोग अपने प्राणों से हाथ धो चुके हैं।
किसी भी शहर को स्मार्ट बनाने के लिए सबसे सरल और सस्ता काम सड़कों को जाम-मुक्त रखना हो सकता है। इसके लिए मात्र थोड़ी सी सख्ती नियमों को लागू करने में होनी चाहिए तथा थोड़ी सी समझदारी सड़कों के डिजाइन के लिए चाहिए। जो सड़कें केवल वाहनों के चलने के लिए बनी है उन पर होने वाली पार्किंग को सख्ती से रोका जाए। दूसरे, चौराहोंंं एवं टी प्वाइंटों पर स्लिप रोड के अलावा सर्विस लेन बनाने से बहुत हद तक जाम से बचा जा सकता है। परन्तु इन छोटी-छोटी बातों की ओर प्रशासन का कतई कोई ध्यान नहीं।
नीलम-चौक से रेलवे ओवर-ब्रिज पर चढ़ कर जब अजरौंदा चौक पर पहुंचते हैं तो भारी जाम लगता था इसे कम करने के लिए मात्र एक स्लिप रोड उन वाहनों को चाहिए थी जिन्हें दिल्ली की ओर जाना होता है। इस बात की समझ आने में प्रशासन को बीसियों वर्ष लग जाने के बाद अब आई है तो जाकर एक स्लिप रोड बन पाई जिससे जाम लगभग समाप्त हो गया। इसी तरह थॉम्सन प्रेस से लेकर अजरोंदा मोड़ तक, मात्र 500 मीटर की सर्विस रोड बनाने की समझ आने में भी प्रशासन को अनेकों वर्ष लग गए। यह सर्विस लेन तो बन गई लेकिन इस पर आज भी वाहनों की पार्किंग तथा कुछ दुकानदारों के कब्जे के कारण वाहन चालकों को काफी परेशानी होती है जो वहां बैठे चार पुलिसकर्मियों को नहीं दिखती। इसी तरह के अनेक तमाशे शहर भर के चौराहों व तिराहों पर देखे जा सकते हैं। यदि प्रशासन अपनी लापरवाही से बाज आए तो इन सब मुसीबतों से जनता को राहत मिल सकती है।
पता नहीं कृष्णपाल जी को यह सब नजर आता है या नहीं? आता भी होगा तो वे कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं होंगे। सभी जानते हैं कि नगर निगम में अब कोई उनकी परवाह नहीं करता, उनके कहने से अब कोई काम होता नहंीं। अपने साथ लिए फिरते जिस विधायक अदलखा ने निगम में अपनी हुकूमत चलानी चाही थी अब उसके भी कुत्ते फेल हो चुके हैं। विदित है कि ये विधायक महोदय भी उक्त मीटिंग में मौजूद थे। समझने वाली बात यह है कि जिस जमाने में कृष्णपाल की इतनी चला-पिला करती थी कि खट्टर ने उन्हें यहां के सीएम जैसी पावर दे रखी थी तभी उनसे इस शहर का कोई भला न हो सका तो आज क्या भला कर देंगे वे? अब तो केवल उस सांप जैसी फुंकार रह गई है जिसके दांत यहां के विधायकों एवं हरियाणा सरकार के मंत्रियों ने तोड़ कर फेेक दिए हैं। इस हकीकत से तमाम छोटे-बड़े अधिकारी भली-भांति परिचित हैं।
गौरतलब है कि कृष्णपाल की बौखलाहट का एक मात्र कारण, लूट कमाई में उनकी घटती हिस्सेदारी है। चाहे नगर निगम हो या एफएमडीए अथवा स्मार्ट सिटी कम्पनी विकास के नाम पर चाहे जितने भी घोटाले पर घोटाले करे कुष्णपाल की हिस्सेदारी हर विभाग में सुरक्षित रहती थी। अनाधिकृत प्लॉटिंग अथवा किसी भी प्रकार का जमीनी कारोबार, सब पर उन्हीं का एकाधिकार रहता आया था। उनकी इच्छा के विरुद्ध कोई भी तहसीलदार किसी भी कारोबारी की रजिस्ट्री नहीं कर सकता था। परन्तु जब से विपुल गोयल, राजेश नागर व गौरव गौतम हरियाणा सरकार के मंत्री बने हैं तब से मानो कृष्णपाल के पंख ही कतर दिए गए हों। इसी के चलते वे अफसरों पर अपनी बौखलाहट का प्रदर्शन करते हैं।