फऱीदबाद (मज़दूर मोर्चा) सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास का जुमला उछालने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कथनी और करनी में अंतर का खेल उनकी पार्टी के सतीश फागना विधायक बनते ही खेलने लगे हैं। जिस तरह मोदी खुद को 140 करोड़ जनता का सेवक बता कर गरीब, दलित, अल्पसंख्यकों के अधिकार छीनने में लगे हैं ठीक उसी तर्ज पर सतीश फागना भी हिंदुत्व और उसमें भी खासकर अपनी जाति यानी गूजरों के हित ही साधने में लगे हुए हैं।
हाल ही में मंत्री अनिल विज ने बिजली आपूर्ति व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए बिजली चोरों पर शिकंजा कसने का आदेश दिया था। बिजली महकमे के पास बिजली चोरी करने वाले इलाकों का पूरा काला चिट्ठा पहले से ही मौजूद था। मंत्री का इशारा मिलते ही महकमे ने बिजली चोरों के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया। रिकॉर्ड के अनुसार सबसे ज्यादा लाइन लॉस, महकमा बिजली चोरी छिपाने के लिए इसी शब्द का इस्तेमाल करता है, वाले गांवों में मंत्री कृष्णपाल गूजर का गांव मेवला महराजपुर और सतीश फागना द्वारा संरक्षित गांव पाली हैं। महकमे के अधिकारी मेवला महराजपुर में अभियान चलाने की हिम्मत नहीं बटोर सके लेकिन बीते सप्ताह एक टीम पाली गांव भेज दी गई। टीम ने अभियान शुरू किया तो गांव वालों में खलबली मच गई, तुरंत ही नए नवेले विधायक सतीश फागना को फोन कर सजातीय होने और चुनाव में सबसे ज्यादा वोट देने वाला गांव होने की दुहाई दी गई।
फिर क्या था विधायक जी ने तुरंत ही एसडीओ को फोन कर वहां से तुरंत टीम हटाने को कहा। एसडीओ ने विनम्रतापूर्वक बताया कि सर पाली में सबसे ज्यादा लाइन लॉस है, अभियान चलाना जरूरी है। इस पर नाराजगी जताते हुए विधायक जी ने कहा कि पाली में झांकने की जरूरत न है, जा उन मुल्लाओं के गांव में जाकर बिजली चोरी काट जिन्होंने न तो वोट दिए और न कोई काम किया, पाली में दोबारा दिख मत जाना। विधायक जी का आदेश सुनकर एसडीओ ने टीम वापस बुला ली। टीम के जाते ही गांव वालों में अपने सजातीय विधायक के गुणगान होने लगे, बिजली चोरी करने वालों ने उन्हें गूजर अधिकार रक्षक, गूजरों का सिरमौर तक कह डाला। बताया जा रहा है कि इसके बाद धौज इलाके में बिजली चोरी पकडऩे का अभियान चलाया गया लेकिन वहां लाइन लॉस मानक के अनुरूप यानी पांच प्रतिशत के आसपास होने के कारण कोई बड़ी चोरी नहीं पकड़ी जा सकी। बिजली चोरी पकड़ी भी जाती तो इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि केवल उन्हीं इलाकों में अभियान चलाया जाए जहां विधायक चाहे और उन इलाकों को छोड़ दिया जाएगा जहां विधायक को लगता है कि उसके वोट हैं।
अलगाववादी सोच रखने वाले सतीश फागना को यह बात समझ लेनी चाहिए कि वह एनआईटी विधानसभा के विधायक हैं न कि केवल उन्हें वोट देने वाली जनता और इलाकों के। दरअसल, वह जिस भाजपा से विधायक हैं उस पार्टी के प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री से लेकर छुटभैये नेता तक बहुसंख्यकवाद से ग्रस्त हैं। चुनावी मंचों पर प्रधानमंत्री मोदी मुसलमानों को कभी रोटी-बेटी और जमीन छीनने वाला बताते हैं तो कभी उन पर मंगलसूत्र तक लूटने का आरोप लगाते हैं।
यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ तो चुनाव में अस्सी-बीस का नारा देकर अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के बीच दरार पैदा करते हैं, उससे भी बात नहीं बनी तो बंटोगे तो कटोगे जैसे जुमले उछाल कर वोटों का ध्रुवीकरण करने लगे। मोदी-योगी की संविधान विरोधी विचाराधारा का जहर न्यायपालिका तक पहुंच चुका है। इसके हालिया उदाहरण इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस शेखर यादव हैं, न्यायामूर्ति जैसे गरिमापूर्ण निष्पक्ष समझे वाले पद पर रहते हुए वह न केवल अतिवादी हिंदू संगठन विश्व हिंदू परिषद के कार्यक्रम में शामिल हुए बल्कि मुसलमानों के खिलाफ विवादित बयान भी दिया।
सतीश फागना भी उसी स्कूल से शिक्षा दीक्षा लेकर विधायक बने हैं, तो उनके द्वारा ऐसा किया जाने पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए, बल्कि इस बात पर चिंता होनी चाहिए कि संघ-भाजपा किस तरह देश में संविधान द्वारा दी गई लोकतांत्रिक-धर्म निरपेक्ष, समतावादी सामाजिक व्यवस्था को अपने राजनीतिक हित के लिए तबाह करने में लगे हुए हैं।