सैमसंग आंदोलन : दक्षिण भारत का ‘मारुति आंदोलन’ क्रांतिकारी मज़दूर आंदोलन 9 अक्टूबर को तमिलनाडु पुलिस ने ‘सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स चेन्नई’ कंपनी के गेट पर धरने पर बैठे ‘सैमसंग वर्कर्स यूनियन’ के 11 मज़दूर कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया और उनके टेंट उखाड़कर फेंक दिए। कंपनी के 1000 से ज्यादा मज़दूर 9 सितंबर से हड़ताल पर हैं। वेतन-भत्ते वृद्धि और दूसरी सुविधाओं के साथ उनकी प्रमुख मांग है कि उनकी यूनियन को मान्यता दी जाए। ट्रेड यूनियन क़ानून 1926 और भारत का संविधान उन्हें अपना संगठन बनाने और अपनी मांगों को मनवाने के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन करने का अधिकार देता है। पूरे 1 महीने की हड़ताल और धरने के दौरान आंदोलनकारी मज़दूरों ने जऱा भी शांति भंग नहीं की है, सड़क यातायात में कोई बाधा तक नहीं पहुंचाई है।
सैमसंग का मुख्यालय दक्षिण कोरिया में है। हमारे देश के विशाल उपभोक्ता बाज़ार में यह प्रमुख ब्रांड है। इस कंपनी ने 2022-23 में देश में कुल 12 बिलियन डॉलर यानी 1,00,705 करोड़ रुपये का कारोबार किया। चेन्नई का प्लांट सैमसंग के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में खपने वाले कुल माल के एक चौथाई भाग का उत्पादन यहीं होता है। एक महीने की हड़ताल से कंपनी प्रबंधन दहल गया और उसने दो दिन पहले मज़दूरों के एक हिस्से से समझौता कर लिया। उसने मंज़ूर किया की मार्च 2025 तक के लिए उनका मासिक वेतन औसत 5,000 रुपये से बढ़ा दिया जाएगा, कैंटीन में कॉफ़ी नाश्ता सस्ता कर देंगे, चेन्नई की गर्मी को देखते हुए, उनके आने-जाने की बसें एसी कर दी जाएंगी और बच्चे के जन्म पर उन्हें 24 डॉलर का गिफ्ट देना भी मंज़ूर है, लेकिन यूनियन को मान्यता नहीं देंगे।
मज़दूरों की यूनियन बनने की ख़बर से मालिकों का हलक क्यों सूख जाता है? मज़दूरों की एकता को तोडऩे के लिए कंपनी, मज़दूरों के हिस्से से बातचीत करने लगी, उनकी कई मांगें भी मान लीं। कंपनी ने यह संकेत दिया कि वह और आर्थिक मांगें भी मंज़ूर कर सकती है लेकिन यूनियन को मान्यता देने की बात सुनने को भी वह तैयार नहीं। ‘यूनियन मत बनाओ, हम कंपनी के बाहर के किसी लीडर से बात नहीं करेंगे’ इस बात पर अड़ी हुई है भले उसे चेन्नई का ये प्लांट बंद ही क्यों ना करना पड़। 2012 से आज तक जारी मारुति मज़दूर आंदोलन की याद ताज़ा हो जाती है जिसमें मानेसर तहसील पर धरने पर बैठे मज़दूर 10 अक्टूबर से भूख हड़ताल पर चले गए हैं। मूल सवाल है मज़दूरों के संगठित होने की ख़बर से मालिकों का हलक क्यों सूख जाता है?
दरअसल, मज़दूर अगर अपना खून चुसवाने में आनाकानी करने लगें, चीखने-चिल्लाने लगें तो मालिक चंद सिक्के उनकी ओर फेंकने को राज़ी हो जाते है। वे लेकिन उन्हें यह एक खैरात, मेहरबानी की तरह देना चाहते हैं। संगठित होने पर मज़दूर जो भी हांसिल करते हैं वह मालिकों की आंखों में आंखें डालकर मेज पर आमने-सामने बैठकर अधिकारपूर्वक हांसिल करते हैं। उस प्रक्रिया में मज़दूर अपनी ताक़त और मालिक की कमज़ोरी दोनों से रूबरू हो जाते हैं। उन्हें पता चल जाता है कि बात-बात पर अपनी शेखी बघारने वाला शान-ओ-शौक़त की हेंकड़ी दिखाने वाला मालिक उत्पादन रुकते ही घुटनों पर आकर मिमियाने लगता है। इसीलिए लेनिन ने हर हड़ताल को क्रांति का छोटा स्वरूप बताया था।
सैमसंग के इस प्लांट में 1,500 स्थाई तथा बाक़ी अस्थाई ठेका मज़दूर हैं जिनकी तादाद ज़रूरत के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है। बाज़ार में धड़ाधड़ बिकने वाले सैमसंग कंपनी के चमचमाते टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन, इन्हीं मज़दूरों के हाथों से बनते हैं। यहां की मज़दूर यूनियन सीपीएम की सीटू से सम्बद्ध है। एक और महत्वपूर्ण बात पाठकों को याद रखनी है। कांग्रेस, सीपीआई, सीपीएम पार्टियां तमिलनाडु की सत्ता में क़ाबिज़ डीएमके की सहयोगी पार्टियां हैं। मुख्यमंत्री स्टालिन डेमोक्रेसी, नागरिक अधिकारों, मज़दूर अधिकारों की लफ्फाज़ी करता है तब उनकी ये सहयोगी पार्टियां तालियां बजाती हैं।
9 अक्टूबर को सत्तारूढ़ दल की सहयोगी कांग्रेस, सीपीएम, सीपीआई का डेलीगेशन हड़ताली मज़दूरों से मिलने जाने वाला था। पुलिस ने उनके वहां पहुंचने से पहले ही कांड कर दिया। अपना असली रूप दिखाते हुए टेंटों को उखाड़कर फेंक दिया तथा 11 मज़दूर कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया। मुख्यमंत्री स्टालिन ने पुलिस के माध्यम से स्पष्ट कर दिया कि मज़दूर अगर कॉर्पोरेट हित पर चोट करेंगे तो नागरिक अधिकार, मज़दूर अधिकार, संविधान, सत्ता में भागीदार होना, गया तेल लेने। मज़दूरों की हड़ताल 9 सितंबर को उस वक़्त शुरू हुई थी जब स्टालिन, बड़े अमेरिकी कॉर्पोरेट मगरमच्छों को रिझाने अमेरिका के दौरे पर था। ‘तमिलनाडु में आओ यहाँ शांति है जो मर्जी वेतन दो, मज़दूर नीचे मुंडी कर काम करते रहते हैं; यह भाषण पेलता फिर रहा था।
‘बस्ती भी जलानी है; मातम भी मनाना है’ सैमसंग के मज़दूर सत्ता की मलाई चाट रही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (माक्र्सवादी) के नेताओं पर भी उंगली उठा रहे हैं। यूनियन बनाने का हक़ मज़दूरों ने अंग्रेज़ों से लड़कर 1926 में हासिल किया था। मालिक उसे दो कौड़ी की क़ीमत नहीं दे रहा। साफ़ कह रहा है यूनियन नहीं बनाने देंगे। तमिलनाडु का उद्योग मंत्री टीआरबी राजा कह रहा है कि हम मालिक कंपनी को मज़दूरों की कुछ और मांगें मनवाने को राज़ी कर सकते हैं, लेकिन मज़दूरों को तुरंत हड़ताल वापस लेकर काम पर लौट जाना होगा। उत्पादन रुकने से देश का नुकसान हो रहा है! तमिलनाडु का नाम खऱाब हो रहा है! कंपनी यूनियन को मान्यता दे इस बाबत कुछ नहीं बोल रहा! कंपनी मंत्री को भी चिढ़ा रही है; ‘सैमसंग का मज़दूर मासिक औसत 36,000 रुपये वेतन पाता है, जबकि तमिलनाडु के बाक़ी कारखाने उससे आधा वेतन ही दे रहे हैं।’
सीटू के तमिलनाडु राज्य महासचिव सुंदरराजन ने जैसे ही घोषणा की कि मालिकों द्वारा मज़दूरों के मालिक-परस्त हिस्से से जो समझौता हुआ है उसे हम नहीं मानेंगे और यूनियन को मान्यता मिले बगैर हड़ताल समाप्त नहीं होगी उन्हें तथा सीटू के कांचीपुरम जिला सचिव मुथुकुमार समेत 11 मज़दूर कार्यकर्ताओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और उनके टेंट उखाड़ कर फेंक दिए। मज़दूरों को धकियाया भी गया। सत्ता के सहयोगी दलों के प्रतिनिधि मज़दूरों से मिलने आने वाले हैं, पुलिस ने इस बात का कोई लिहाज़ नहीं किया। ये नेता गिरफ्तार मज़दूरों से मिलने पुलिस स्टेशन गए, डीएमके ने इस बात का भी बुरा माना। तमिलनाडू का राज्य सचिव मुरुगानंदन कंपनी गया भी लेकिन मालिकों से मिलकर चला आया। गेट पर धरने पर बैठे मज़दूरों की ओर देखा तक नहीं। उसके बाद भी सत्ता में सहयोगी सीपीएम सहयोगी ही बनी हुई है, कुछ नहीं बोल रही! राजनीति से अनजान मज़दूर हैरान हैं जो राजनीति समझते हैं, उन्हें कोई हैरानी नहीं!
इसी कंपनी में पहले सीपीआईएमएल लिबरेशन के प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय जुझारू कम्युनिस्ट नेता कुमारस्वामी ने यूनियन बनाई थी जो एआईसीसीटीयू से सम्बद्ध थी। यूनियन को मान्यता देने के मामले में उन्होंने समझौता नहीं किया जबकि उनकी यूनियन और लिबरेशन पार्टी मालिकों से जोड़-तोड़ कर लेना चाहते थे। नतीजतन कुमारस्वामी लिबरेशन पार्टी और उनकी ट्रेड यूनियन से अलग हो गए। उस आंदोलन के सभी अगुवा मज़दूर कार्यकर्ताओं को कंपनी ने बरखास्त कर दिया। तमिलनाडू के हर जि़ले में कम्युनिस्ट पार्टियां और मज़दूर आंदोलन मज़बूत स्थिति में हुआ करते थे। वहां कम्युनिस्ट आंदोलन को करूणानिधि ने बर्बाद किया है। मौजूदा आंदोलन का हश्र भी अगुवा कार्यकर्ताओं की छंटनी में होने की आशंका है क्योंकि स्टालिन सरकार तमिलनाडु में मालिकों को मनमानी करने की छूट दे चुकी है। वे ख़ुद भी तमिलनाडू के बड़े उद्योगपति हैं। स्टालिन ने पिछले लोकसभा चुनावों में चुनाव लडऩे के लिए सीपीआई को 15 करोड़ तथा सीपीआईएम को 25 करोड़ रुपयों की ‘मददÓ दीरुपये दोनों पार्टियों को लोकसभा में 2-2 तथा विधानसभा में 5-5 सीटें दी हैं। स्टालिन ने इन पार्टियों को सरकार में शामिल नहीं किया बल्कि खऱीद लिया। डीएमके की पूंछ पकड़े बगैर इन पार्टियों को सीटें तो आती ही न चुनाव लडऩे की भी हैसियत नहीं थी। ये हाल बना रक्खा है इन ‘कम्युनिस्ट’ पार्टियों ने। डीएमके से रिश्वत ले चुकीं ये पार्टियां क्या मज़दूरों की लड़ाई लड़ सकती हैं?
यूनियन ‘माक्र्सवादी’ पार्टी की है पार्टी सत्ता को समर्पित हो चुकी है। मुख्यमंत्री कहता है राज्य में बड़ा निवेश चाहिए, बड़े धन्ना सेठों के सामने मुंह बंद रखो शरमाओ मत, दंडवत हो जाओ। सत्ता से भारी-भरकम लिफ़ाफ़ा पकड़ चुकी और दो ‘कामरेडों’ को सांसद बना चुकी, ‘माक्र्सवादी’ पार्टी मज़दूरों के साथ आने का ढोंग तो कर पाएगी लेकिन साथ कैसे आएगी? फ़ासीवाद के अंधेरे घटाटोप में जो पार्टी सत्ता की खुरचन चाटने को जीभ लपलपाएगी वह मज़दूरों की लड़ाई नहीं लड़ सकती। उस पार्टी के नाम में अगर ‘कम्युनिस्ट’ या ‘माक्र्सवाद’ लिखा है और हाथ में लाल झंडा है तो मज़दूरों का और गंभीर नुकसान करेगी। मारुति मज़दूरों की तरह सैमसंग के इन बहादुर मज़दूरों को पहले राजनीति समझनी पड़ेगी और फिर अपनी लड़ाई का नेतृत्व अपने हाथ में लेना होगा। उन्हें ख़ुद राज्य और देश के मज़दूर आंदोलन के साथ फ़ौलादी एकता क़ायम करनी होगी। हम सैमसंग के मज़दूरों की लड़ाई से एकजुटता का ऐलान करते हैं. वसीम बरेलवी का ये शेर याद आ रहा है; इस दौर-ए-सियासत का इतना सा फ़साना है, बस्ती भी जलानी है, मातम भी मनाना है।