बल्लबगढ़ (मज़दूर मोर्चा) स्थानीय राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक कन्या पाठशाला के प्रिंसिपल, छतरपाल बारहवीं के छात्राओं की बोर्ड दाखिला फीस के 7 लाख 4 हज़ार 950 रुपये लेकर चंपत हो चुका है। प्रशासन ने अभी तक इस गबन करने वाले प्रिंसिपल के खिलाफ कोई मुकदमा तक दर्ज नहीं कराया है।
विदित है कि दसवीं तथा बारहवीं की परीक्षाएं हरियाणा शिक्षा बोर्ड द्वारा आयोजित की जाती हैं। इसके लिए विद्यार्थियों से दाखिला फार्म भरवा कर, दसवीं वालों से रुपये 950 तथा बारहवीं वालों से 1150 रुपये बतौर दाखिला फीस लिए जाते हैं। प्रिंसिपल छतरपाल ने अपने स्कूल की इन छात्राओं से नवम्बर माह के पहले सप्ताह में ही फीस वसूली शुरू कर दी थी। बोर्ड में फीस जमा कराने की अंतिम तिथि विभिन्न कारणों से बढ़ते-बढ़ते तीन दिसम्बर हो गई थी। इसके बावजूद भी प्रिंसिपल ने यह फीस जमा नहीं कराई।
सरकारी सेवा शर्तों के अनुसार इस तरह के पैसे को एक दिन भी अपनी जेब में रखना कानूनी अपराध है। इसके बावजूद प्रिंसिपल ने इस कानून की कोई परवाह न करते हुए वसूली गई 7 सात लाख 4 हजार 950 रुपये की रकम पूरी तरह से डकार ली। अंतिम तिथि निकल जाने के बाद जब बोर्ड ने लेट फीस लगानी शुरू करी तो छात्राओं में हंगामा मच गया। अभिवावकों ने स्कूल के चक्कर लगाने शुरू किए तो मामला खंड शिक्षा अधिकारी महेन्द्र सिंह से होते हुए जिला शिक्षा अधिकारी अजीत सिंह तक पहुंचा तो उन्होंने प्रिंसिपल को हड़का कर तुरन्त फीस जमा कराने को कहा। प्रिंसिपल ने फीस जमा कराने की बजाय अपने स्टाफ को कहा कि वे अपनी जेब से पैसा इकट्ठा करके फीस भर दे। स्टाफ के इनकार करने पर उसने लड़कों वाले वरिष्ठ माध्यमिक स्कूल की प्रिंसिपल रेनू चौधरी से आग्रह किया कि वह अपने स्कूल फंड से यह फीस जमा करा दे। उनके द्वारा भी इनकार करने पर प्रिंसिपल छत्रपाल 9 तारीख से लापता हो गया है।
अब समस्या यह बनी खड़ी है कि बगैर फीस भरे ये छात्राएं परीक्षा में कैसे बैठ पाएंगी? यदि नहीं बैठ पाई तो उनके इस वर्ष की बर्बादी का जिम्मेवार कौन होगा? देखा जाए तो यह कोई समस्या नहीं है। यदि शिक्षा विभाग के अधिकारियों की नीयत ठीक हो तो तुरन्त सरकारी खाते से फीस जमा करा दी जाए और उसे प्रिंसिपल के वेतन आदि से काट लिया जाए।
इस कदम से पहले गबन करके $फरार होने वाले प्रिंसिपल के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 406, 409 आदि के अन्तर्गत पुलिस में मुकदमा दर्ज करा देना चाहिए था। वैसे यह काम शिक्षा विभाग के अतिरिक्त एसडीएम तथा डीसी द्वारा स्वत: संज्ञान लेकर भी कराया जा सकता है। परन्तु ऐसा कुछ भी होने वाला दिखता नहीं है, यदि ऐसा होने लग जाए तो सरकारी विभागों से भ्रष्टाचार एवं गबनखोरी पूरी तरह नहीं तो काफी हद तक समाप्त हो सकती है। यों भी शिक्षा विभाग में तो खुली लूट मची हुई है। प्रिंसिपल छत्रपाल का मामला केवल दाखिला फीस के गबन तक ही सीमित नहीं है। उसने स्कूल फंड के करीब डेढ़ करोड़ रुपये पहले से ही हजम कर रखे हैं, जिसके बारे में किसी भी उच्चाधिकारी ने कोई कार्रवाई करने की जरूरत नहीं समझी। जरूरत समझी भी क्यों जाए जब लूट कमाई का हिस्सा ऊपर तक पहुंचता हो।
केवल अधिकारियों पर ही नहीं लानत उन नेताओं पर भी है जो चुनावों के वक्त वोट पाने के लिए जनता की सेवा के लिए तरह-तरह के वायदे और आश्वासन देते हैं, परन्तु इस मौके पर कोई भी नेता मुंह खोलने को तैयार नहीं है। सबसे पहला फर्ज स्थानीय विधायक मूलचंद का बनता है कि वे इस कांड में यथाशीघ्र कानूनी कार्रवाई अमल में लाएं। इसके अलावा तमाम अन्य हारे हुए नेताओं को भी इसे लेकर आन्दोलन खड़ा कर देना चाहिए था। इन्होंने तो कुछ भी नहीं किया, अब देखना यह है कि शिक्षा मंत्री महिपाल ढांडा इस मामले में कितनी ईमानदारी से काम कर पाते हैं?
सरकारी स्कूलों में अब गरीब घरों के बच्चे ही पढ़ते हैं। निम्न और अति निम्न आय वर्ग के इन बच्चों के अभिभावकों के पास मोटी फीस जमा करने तक का पैसा नहीं होता। बावजूद इसके बच्चों को शिक्षा दिलाने के लिए सरकारी स्कूलों में इस भरोसे से भेजते हैं कि शिक्षा के नाम पर ठगी या लूट नहीं होगी। बोर्ड परीक्षा के लिए निर्धारित शुल्क ही वसूला जाएगा, बच्चों के भविष्य के लिए अभिभावक हजार-बारह सौ रुपये का जुगाड़ कर बोर्ड परीक्षा की फीस भरते हैं। यदि उनकी गाढ़ी कमाई से चुकाया गया शुल्क भी सुरक्षित नहीं है तो यह सरकार की साख पर बट्टा ही है। सरकार एक ओर ई गवर्नेंस और पारदर्शिता के दावे करती है तो दूसरी ओर छतरपाल सौरोत जैसे प्रिंसिपल खुलेआम न केवल सरकारी फंड बल्कि बच्चों की फीस तक हड़प जाते हैं और सरकार कुछ नहीं करती, इससे भ्रष्टाचारियों के हौसले बुलंद हैं।
करोड़ों हड़पे फिर भी नहीं हुई कार्रवाई प्रिंसिपल छतरपाल सिर्फ छात्राओं की बोर्ड परीक्षा की फीस लेकर ही नहीं फरार हुआ है उसके इससे भी बड़े कारनामे हैं। कॉलेज के चार्जिंग ऑफ कंसोलिडेटेड चिल्ड्रेन्स वेलफेयर फंड (सीसीसीडब्ल्यूएफ) में 1 करोड़ 70 लाख रुपये जमा था, इसी तरह चाइल्ड वेलफेयर फंड (सीडब्ल्यूएफ) में सत्तर लाख रुपये उनके प्रधानाचार्य रहते जमा थे। कुल 2 करोड़ 40 लाख रुपये में सात आठ लाख रुपये ही बचे हैं बाकी धन हड़प लिया गया। सूत्रों के अनुसार अगस्त सितंबर में छतरपाल सौरोत ने इस फंड से काफी धन आरटीजीएस के जरिए अपने खाते में ट्रांसफर कराया था। अगस्त में डीईओ ने छापा मारा था और गड़बड़ी पकड़े जाने पर फंड से संबंधित दस्तावेज भी तलब किए थे लेकिन कार्रवाई के नाम पर निल बटा सन्नाटा ही है। इसका मतलब डीईओ साहब ने भी आंखें बंद करना उचित समझा, यदि उसी समय सख्ती की जाती तो छतरपाल छात्राओं की फीस हजम करने की हिम्मत न जुटा पाता।