ठरकी डॉक्टर वर्मा बर्खास्त, पत्नी की भी गई नौकरी

ठरकी डॉक्टर वर्मा बर्खास्त, पत्नी की भी गई नौकरी
May 01 16:33 2026

ईएसआई मेडिकल कॉलेज अस्पताल
फरीदाबाद (मजदूर मोर्चा) ईएसआई मेडिकल कॉलेज अस्पताल के कार्डियोलॉजी विभाग में प्रोफेसर बने बैठे डॉ. राकेश वर्मा को महिलाओं के प्रति उनकी नीच हरकतों के चलते दिनांक 20 अप्रैल को बर्खास्त कर दिया गया। इतना ही नहीं उनकी पत्नी डॉ. सीके दुर्गा, जो संस्थान के रजिस्ट्रार एकेडमिक पद को हथिया कर बैठी हुई थीं, उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। सीके दुर्गा कामकाज में सिफर होने के बावजूद डीन के बराबर वाला एक बड़ा केबिन हथियाए बैठी थीं, जहां वे यदा-कदा ही चंद घंटों के लिए ही आती थीं।

सुधी पाठकों ने मजदूर मोर्चा के दिनांक 22-28 मार्च अंक में ‘डॉक्टर राकेश वर्मा को कैथलैब से भगाया गया, महिलाओं को छेड़ता था डॉक्टर, काम नहीं करता था’ शीर्षक से प्रकाशित खबर में पढ़ा था कि यह डॉक्टर के नाम पर अपनी सहयोगी महिला कर्मचारियों के साथ किस तरह से छेड़छाड़ किया करता था। पानी जब सिर से ऊपर गुजरने लगा तो पीडि़त महिलाओं ने आईसीसी (अंदरूनी शिकायत समिति) को इस मामले की शिकायत लगाई। इस पर शर्मसार होने के बजाय डॉक्टर वर्मा ने न केवल पीडि़ताओं को बल्कि आईसीसी की अध्यक्ष को भी धमकियां भेजनी शुरू कर दीं। वह पूरी तरह ठोंक-बजा के कहता था कि उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। बतौर सबूत वह कहता था कि उसने फलां-फलां डॉक्टरों, यहां तक कि डीन तक को भी अपने रास्ते से हटाने में देर नहीं लगाई थी। उसकी इन धमकियों से पूरे संस्थान में खौफ का माहौल बना हुआ था।

मजदूर मोर्चा के उक्त प्रकाशन के बावजूद भी जब उसके विरुद्ध कोई कार्रवाई होती नजर नहीं आई तो पीडि़ताओं व आईसीसी के सदस्य भी घबराने लगे थे। वे भी उसकी धमकियों को सच मानते हुए मानने लगे थे कि इस नीच आदमी की पहुंच बहुत ऊपर तक है। सारे मामले पर नजर बनाए मजदूर मोर्चा ने भी उसका पीछा न छोड़ते हुए दिनांक 12-18 अप्रैल 2026 को ‘ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज अस्पताल का ठरकी डॉक्टर, डॉ. राकेश वर्मा अब धमकियां भी देने लगा है’ शीर्षक से एक और समाचार प्रकाशित किया। इसके साथ-साथ पूरा मामला हरियाणा के राज्य महिला आयोग तक भी पहुंचाने का प्रयास किया।

जब पांच सप्ताह तक मीडिया में इस नीच डॉक्टर के साथ-साथ पूरे संस्थान एवं कॉरपोरेशन की भी फजीहत बड़े पैमाने पर होने लगी तो मजबूरन इस ठरकी डॉक्टर को संरक्षण देने वाले, मुख्यालय में बैठे उच्च अधिकारियों ने भी घुटने टेक दिए। इसके परिणामस्वरूप दिनांक 23 अप्रैल को इस निकम्मे डॉक्टर को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। इतना ही नहीं कार्पोरेशन के डायरेक्टर जनरल एके सिंह आईएएस खुद चल कर 21 अप्रैल को संस्थान में आए और पीडि़ताओं को बुलाकर उनको आश्वासन दिया और उन्हें भरोसा दिया कि यदि ऐसी कोई बात हो तो आप सीधे हमें बताया करें, हम आपके साथ हैं, आदि आदि। सवाल यह बनता है डीजी साहब इतने दिन कहां सोते रहे ये पीडि़ताएं तो पिछले डेढ़ दो महीने से रो रहीं थी, तो क्या आप पूरे संस्थान की छीछालेदर होने की प्रतीक्षा कर रहे थे?
बर्खास्त होने को तो यह हो गया, लेकिन जाते-जाते पूरे कार्डियोलॉजी विभाग को बर्बाद कर गया। अगस्त 2025 से पहले जिस कार्डियोलॉजी विभाग में रोजाना अनेकों हृदय रोगियों का इलाज करने के लिए डॉ. अरविंद, डॉ. बिनय पांडे जुटे रहते थे, उनको इस नालायक ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। डॉ. बिनय पांडे तो खैर आंशिक रूप से ही कुछ घंटों के लिए आकर काफी काम कर जाया करते थे, जबकि डॉ. अरविंद बतौर रेगुलर फैकल्टी एसोसिएट प्रोफेसर यहां कार्यरत थे, जिन्हें इस हरामखोर ने बसई दारापुर भिजवा दिया।

मजे की बात तो यह है कि बसई दारापुर में डॉ. अरविंद के करने लायक कुछ भी नहीं था क्योंकि वहां वो कैथ लैब ही नहीं है जिसमें हृदय रोगियों का उपचार किया जाता है। डॉ. अरविंद ने मुख्यालय में बैठे धूर्त अधिकारियों को यही बात समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वे सब तो इस नीच डॉक्टर वर्मा के इशारे पर नाचते रहे। अंतत: डॉ. अरविंद ने ईएसआई की नौकरी ही त्याग दी। जानकार बताते हैं अगस्त 2025 से लेकर खबर लिखे जाने तक कार्डियोलॉजी विभाग में दस प्रतिशत काम भी नहीं हो रहा। यानी कि अस्पताल में काम बंद है और रेफर करने पर पाबंदी लगी होने के चलते कॉरपोरेशन उन मरीजों को मौत के मुंह की तरफ धकेल रहा है, जिनसे वह नियमित वसूली करता है। वर्मा दम्पत्ति के बर्खास्त होने पर कुछ लोग मुंह खोलने की हिम्मत जुटा पा रहे हैं। वे बताते हैं कि वर्मा दम्पत्ति, दो बेटों के साथ इक_े दिल्ली से चल कर यहां करीब ग्यारह बजे पहुंचते हैं। आईएमटी म फैक्ट्री चलाने वाला बेटा इन्हें यहां छोड़कर फैक्ट्री निकल जाता है। विकलांग बेटे की देखभाल माता-पिता दोनों मिलकर जैसे-तैसे यहीं करते रहते हैं। यदा-कदा बड़ा बेटा भी उसे अपने साथ फैक्ट्री ले जाता था। करीब दो-तीन बजे वे चारों वापस घर के लिए निकल पड़ते थे और महीने में पांच लाख की वसूली बतौर वेतन कॉरपोरेशन से कर लेते थे। बहुत कम लोग जानते हैं कि यह ठरकी डॉक्टर कार्डियोलॉजी का ककहरा भी नहीं जानता।

मुंह खोलने वाले अब बता रहे हैं कि ये दोनों मियां-बीवी अपने आईएमटी वाले बेटे के लिए किसी महिला डॉक्टर आदि को रिश्ते के लिए फंसाना चाहते थे। बार-बार कहते थे कि उससे बात किया करो। लड़कियां साफ कह देती थीं कि हम क्यों बात करें, हमें बात करने की कोई जरूरत नहीं है। फिर ये लोग धमकाने के साथ-साथ उज्ज्वल भविष्य का लालच भी दिखाते, लेकिन कोई इनके जाल में नहीं फंसी। अब यह बात भी सामने आने लगी है कि इनका आईएमटी वाला बेटा अस्पताल में इस्तेमाल होने वाले कैथेटर जैसे कुछ आइटम बनाकर किसी अन्य वेंडर के नाम से सप्लाई करता था। इसकी पोल तब खुली जब एक मरीज को लगे ऐसे ही एक आइटम से बड़ी गड़बड़ हो गई। जांच-पड़ताल करने पर सारा खेल सामने आ गया था, लेकिन इस बदमाश वर्मा के प्रभाव के चलते सारा मामला दबा दिया गया।

बेहतरीन डॉक्टरों को यहां से भगाया जाता है
पढऩे-पढ़ाने व चिकित्सा में रुचि रखने वाले बेहतरीन डॉक्टर किसी भी व्यावसायिक अस्पताल में नौकरी करने की अपेक्षा उस सरकारी अथवा अर्ध-सरकारी संस्थान में काम करना पसंद करते हैं जहां उन्हें समुचित संसाधन उपलब्ध होते रहें। बड़े सरकारी संस्थानों के अलावा फौज से रिटायर होने वाले वरिष्ठ डॉक्टर किसी व्यावसायिक अस्पताल में जाने की अपेक्षा फरीदाबाद के इस ईएसआई अस्पताल में आना पसंद करते रहे हैं। यहां उन्हें पूरे सम्मान के साथ वांछित संसाधनों की कभी कोई कमी नहीं रही। लेकिन आज के दिन न तो यहां सम्मान ही बचा है और न ही वांछित संसाधन उपलब्ध होते हैं। कभी कोई इम्प्लांट नहीं है, तो कभी सर्जिकल ब्लेड नहीं है, तो कभी ग्लव्स नहीं हैं, तो कभी स्टिचिंग का सामान नहीं है। दवाइयों का तो कहना ही क्या, दवाओं के लिए डॉक्टरों से कहा जाता है कि वे वही दवा लिखें जो स्टोर में उपलब्ध हो, मरीज जिए या मरे। कार्डियोलॉजी के जिस नियमित एसोसिएट प्रोफेसर अरविंद को ईएसआई छोडऩे के लिए मजबूर किया गया, वे यहां केवल दो लाख चालीस हजार मासिक वेतन पाते थे। वेतन कम होने के बावजूद वे काम से न केवल संतुष्ट थे बल्कि और भी बेहतरी करना चाहते थे, जिसके रास्ते में ठरकी डॉक्टर वर्मा रोड़े अटकाता था। आज दोनों ही ईएसआई कॉरपोरेशन से बाहर हैं। लेकिन डॉ. अरविंद साढ़े आठ लाख मासिक वेतन से कहीं अधिक पा रहे हैं, जबकि वर्मा दम्पत्ति को कोई पचास हजार में भी न रखे।

इसी तरह रेडियोलॉजी में एक बेहतरीन डॉ. सोनाली हुआ करती थीं। इनका पद असिस्टेंट प्रोफेसर का था और वेतन करीब डेढ़ लाख। डॉ. सोनाली ने तमाम औपचारिकताएं पूरी होने के बाद जब डीन बहादुर से कहा कि उसे वेतन भले ही यही मिलता रहे लेकिन उनका पद एसोसिएट प्रोफेसर कर दिया जाए, डीन द्वारा इनकार कर दिए जाने पर डॉ. सोनाली ने कॉरपोरेशन की नौकरी छोड़कर इसी शहर में स्थित अमृता मेडिकल कॉलेज अस्पताल में बतौर एसोसिएट प्रोफेसर ज्वाइन कर लिया। अब उन्हें वहां पांच लाख वेतन मासिक मिल रहा है। ये उक्त दो तो केवल उदाहरण मात्र हैं, जबकि दर्जनों ऐसे वरिष्ठ डॉक्टर यहां कम वेतन पर भी काम करके संतुष्ट हैं, लेकिन पता नहीं कब मुख्यालय की अफसरशाही इन्हें किसी न किसी बहाने नौकरी छोडऩे के लिए मजबूर कर सकती है। सबसे अच्छा बहाना इनका तबादला हो सकता है। पिछले दिनों इस तरह की खुराफातें करने का प्रयास भी किया गया था।

  Article "tagged" as:
  Categories:
view more articles

About Article Author

Mazdoor Morcha
Mazdoor Morcha

View More Articles