फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) नागरिकों की जान-माल की सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य में पुलिस नामक संगठन को खड़ा किया गया है। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि आज पुलिस इनमें से कोई भी काम ढंग से नहीं कर पा रही। पुलिस केवल शासक वर्ग की सुरक्षा करना ही अपना दायित्व समझती है जिसके बदले वह सरकारी वेतन के अलावा मोटे हाथ मारने का कोई मौका भी नहीं चूकती। हां, यदा-कदा दिखावे के लिए चेकिंग अभियान का खेल जरूर खेलती रहती है। ऐसा ही खेल बीते रविवार को भी खेला गया जिसे सुरक्षा की मजबूती करना बताया गया।
कहने को जो मर्र्जी कहा जाए लेकिन असली निशाना उन गरीब मुस्लिम मेहनतकशों पर ही रहा जो कच्ची-पक्की कॉलोनियों में बसे हुए हैं। न केवल घरों में बल्कि उनकी मस्जिदों आदि में भी घुसकर पुलिस ने तलाशी ली। और तो और सर्दियों के मौसम में हर साल आने वाले उन कश्मीरी लकड़हारों को भी नहीं बक्शा गया जो कंधे पर कुल्हाड़ी रखे काम की तलाश में गली-गली घूमते हैं। इसी तरह रिक्शा में गर्म कपड़े व शॉल आदि रख कर बेचने वाले कश्मीरियों को भी इस चेकिंग का शिकार होना पड़ा। पुलिसिया पूछताछ एवं चेकिंग का मतलब आसानी से समझा जा सकता है। इस दौरान घंटों इन लोगों को हिरासत में रख कर तरह-तरह के वाहियात एवं बे-सिर-पैर के सवाल पूछे जाते हैं।
अपराधियों, असामाजिक तत्वों एवं खुराफाती तत्वों की खोज-बीन करना उनकी हरकतों पर नजर रखना पुलिस का एक महत्वपूर्ण काम है। यह काम कभी-कभार चलाए जाने वाले विशेष अभियान के द्वारा न करके, नियमित रूप से किए जाने वाला है। इस काम को यदि ईमानदारी से किया जाए तो आपराधिक गतिविधियों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है, बहुत सी वारदातों को होने से पहले ही रोका जा सकता है। पुलिस को यह भी समझना होगा कि अपराधी का कोई धर्म नहीं होता, वह किसी भी मजहब एवं सम्प्रदाय से हो सकता है।
दरअसल पुलिस तो वही सोचती व करती है जो उसके आका उसे बताते हैं। जब सरकार की नजर में अपराधी केवल एक सम्प्रदाय विशेष के ही होते हैं तो पुलिस को भी उसी दृष्टि से देखना होता है। इसके अलावा जब सरकार का सीधा निर्देश ही किसी सम्प्रदाय विशेष के लोगों को प्रताडि़त करना ही हो तो बेचारे पुलिसकर्मी इसके अलावा और सोच भी क्या सकते हैं? उक्त चेकिंग अभियान में पकड़े गए शराब के 70 पव्वे तथा छ: बिना नम्बर प्लेट की मोटरसाइकिलों को विशेष उपलब्धि के तौर पर बताया गया है।