स्मार्ट सिटी लिमिटेड के खोदे गए गड्ढे में डूब कर गई बच्चे की जान

स्मार्ट सिटी लिमिटेड के खोदे गए गड्ढे में डूब कर गई बच्चे की जान
April 19 18:06 2025

ठेकेदार और अधिकारियों की स्पष्ट लापरवाही होने के बावजूद पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ दर्ज किया केस
फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) स्मार्ट सिटी लिमिटेड द्वारा ओल्ड फरीदाबाद स्थित बराही तालाब में कराए जा रहे विकास कार्य के तहत खोदे गए बारह फीट गहरे गड्ढे के पानी में डूबने से दस वर्षीय प्रियांशु की मौत हो गई। न तो स्मार्ट सिटी के निकम्मे अधिकारियों ने और न ही हरामखोर ठेकेदार ने गड्ढे के चारों ओर सुरक्षा रेलिंग लगाई और न ही कोई चेतावनी बोर्ड लगाया। यदि सुरक्षा मानकों का पालन किया जाता तो बच्चे की जान नहीं जाती।

स्पष्ट है कि बच्चे की मौत स्मार्ट सिटी लिमिटेड के निकम्मे अधिकारियों और ठेकेदार पीपीएस बिल्डर की लालच के कारण गई। यदि स्मार्ट सिटी के हरामखोर अधिकारी मौका मुआयना करते और ठेकेदार को सुरक्षा मानक लागू करने को मजबूर करते तो बच्चा या कोई और उस गड्ढे तक पहुंच ही नहीं पाता। ठेकेदार भी ज्यादा मुनाफे की लालच न करके सुरक्षा रेलिंग लगाने पर खर्च करता। पिता बाबा नगर शिव कॉलोनी निवासी मित्रपाल ने स्मार्ट सिटी के अधिकारियों और ठेकेदार पीपीएस बिल्डर की लापरवाही से प्रियांशु की मौत होने की लिखित शिकायत ओल्ड फरीदाबाद पुलिस को दी। जघन्य अपराधों को हल्की धाराओं में दर्ज कर क्राइम रिपोर्ट क्लीन रखने की कला में माहिर ओल्ड थाने की पुलिस ने यहां भी खेल कर दिया और बिना जांच परख के अज्ञात के खिलाफ केस दर्ज कर मामले की जांच का पाखंड किया जा रहा है।

दरअसल हरामखोर और निकम्मे अधिकारियों के दिलों में यह बात अच्छे से बैठ चुकी है कि कोई भी दुर्घटना हो, कितने ही लोगों की मौत हो जाए उनके खिलाफ न तो रिपोर्ट दर्ज की जाएगी और न ही उन्हें जेल भेजा जाएगा। यही हाल ठेकेदारों का है अधिकारियों को मोटी मलाई चटाने के बाद वह सिर्फ पैसा कमाने में ही जुटे रहते हैं, अब आम आदमी इनकी लापरवाही के कारण जान गंवा दे इनकी बला से। सुधी पाठकों को याद दिला दें कि इसी तरह पल्ला थाना क्षेत्र में नगर निगम द्वारा डिस्पोजल के लिए खुदवाए गए गड्ढे में सितंबर 2024 के अंतिम रविवार को डूबने से चार वर्षीय आर्यन की मौत हो गई थी। पल्ला पुलिस ने पिता राधो की शिकायत पर निगम अधिकारियों के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का केस तो दर्ज कर लिया था लेकिन गिरफ़्तारी तो दूर जांच ही ठंडे बस्ते में डाल दी गई।

इससे एक सप्ताह पहले ही यानी 23 सितंबर 2024 को ओल्ड रेलवे अंडरपास के जलभराव में डूबने से दो बैंककर्मियों पुण्येश शर्मा और विराज की मौत हो गई थी। अंडरपास से पानी निकालने के लिए नगर निगम द्वारा जेनरेटर-डीजल के नाम पर लाखों रुपये के बिल बना कर अधिकारियों के बीच बंदरबांट होने से जलभराव होता रहा, और दो लोगों की जान चली गई। बल्लभगढ़ में सड़क किनारे खुले छोड़े गए करीब छह फीट चौड़े और आठ फीट गहरे नाले में डूबने से प्रिंस नामक युवक काल के गाल में समा गया था। उस मामले में भी पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ केस दर्ज किया था। इससे पहले चार जुलाई 2024 को सेक्टर 22 हार्डवेयर सोहना रोड पर श्मशान के पास एफएमडीए द्वारा सीवर लाइन के लिए सड़क में खुदवाए गए गडढ़े में गिरकर बाइक सवार बिल्लू उर्फ विमल की मौत हो गई थी। इस मामले में भी पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ केस दर्ज किया लेकिन आज तक दोषी ज्ञात नहीं हो सका।

पुलिस के सहयोगात्मक रवैये के कारण ही एफएमडीए, नगर निगम, स्मार्ट सिटी आदि के संवेदनहीन, निष्ठुर और हरामखोर अधिकारियों को गिरफ्तारी और जेल जाने का डर नहीं है। इन अधिकारियों को मालूम है कि भले ही उनकी स्पष्ट लापरवाही के कारण किसी नागरिक की जान चली जाए, पुलिस उनके पद के खिलाफ या नामजद केस नहीं दर्ज करेगी। मामला जैसे ही पुराना पड़ेगा गोल मोल क्लोजर रिपोर्ट लगाकर केस बंद करने का कुप्रयास किया जाएगा। सरकार और पुलिस से शह मिले तो फिर कोई क्यों हरामखोरी न करे। गौर तलब है कि इन सरकारी उपक्रमों की करतूत से मरने वाले पहले मामले में यदि दोषी अधिकारियों को जेल भेज दिया गया होता तो उसके बाद एक भी मौत न हुई होती। आए दिन होने वाली ये मौतें केवल इसलिए हो रही हैं कि भ्रष्ट अधिकारी बेखौफ होकर जगह जगह मौत के गड्ढे खोद देते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि उनका कुछ बिगडऩे वाला नहीं। पुलिस इस तरह के हादसों में फौरी तौर पर फर्जी सा केस दर्ज कर जांच को ठंडे बस्ते में डाल देती है, अधिकतर पीडि़त भी निम्न आय वाले परिवारों से होते हैं और लंबी कानूनी प्रक्रिया से थक कर चुपचाप बैठने को मजबूर हो जाते हैं।

इक्का दुक्का ही मनोज वाधवा जैसे होते हैं जिन्होंने करीब ग्यारह साल पहले एनएचएआई और ठेकेदार एलएंडटी कंपनी की लापरवाही के कारण बेटे पवित्र को खो दिया था। पवित्र की मौत दिल्ली मथुरा हाईवे पर बाटा पुल के पास सड़क के गड्ढे में गिरने से हुई थी। मनोज वाधवा बीते ग्यारह साल से केस लड़ रहे हैं लेकिन पुलिस की कृपा से आज तक दोषी अधिकारी को चिह्नित नहीं किया जा सका है।

पुलिस की कार्यशैली देख कर तो लगता नहीं कि वह प्रियांशु की मौत के जिम्मेदार अधिकारी और ठेकेदार के कारिंदों की पहचान कर पाएगी। जिस तरह आए दिन पैसा लेकर केस से नाम हटाने के मामलों का खुलासा होता रहता है, उससे तो लगता है कि प्रियांशु सहित किसी भी मामले में कोई दोषी नहीं पाया जाएगा। रही जनता की बात तो जब तक वह अंधभक्तों की तरह अपनी ही चुनी गई डबल, ट्रिपल सरकारों से सवाल नहीं करेगी, उसके काले-सफेद कानून-आदेशों का आंख बंद कर अनुसरण करेगी तो उसका शोषण होना तय है।

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Mazdoor Morcha
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