मज़दूर मोर्चा ब्यूरो हर तरह की गुंडागर्दी व हत्या तक के गुनाहों से फारिग हो चुके हरियाणा के जेलमंत्री डॉ.अरविंद शर्मा ने घोषणा की है कि राज्य में 284 करोड़ की लागत से पंचकूला, चरखी दादरी के भैरवी व फतेहाबाद के बीघड़ में नई जेलों की स्थापना की जाएगी। ये कोई लुकी छिपी बात नहीं है कि उक्त राशि में से केवल आधी राशि ही काम पर लगेगी और बाकी मंत्री व लगुए भगुओं की जेब में जाने वाली है। रही बात जेलों की उपियोगिता तो 1977-78 में तत्कालीन मुख्यमंत्री देवी लाल ने जेलों को सुधारगृह का नाम दिया था लेकिन आज तक वहां से कोई सुधर का आया इसका तो पता नहीं लेकिन नित नए ट्रेंड अपराधी निकलकर बड़ी संख्या में आ रहे हैं। जेलें अपराधियों के ट्रेनिंग सेंटर बन चुकी है।
विदित है कि राज्य के लगभग प्रत्येक जि़ले में जेलें मौजूद हैं। इन जेलों में क्षमता से अधिक लोगों को ठूंस रखा है। इनमें से 60 प्रतिशत तो ऐसे लोग हैं जिन पर अभी दोष सिद्ध भी नहीं हुआ, यह भी पता नहीं कि उन पर कभी कोई दोष सिद्ध हो भी पाएगा, या नहीं? इसी इंतजार में इन विचाराधीन कैदियों के कई-कई वर्ष निकल जाते हैं। निर्दोष सिद्ध होने पर जेल में बिताए गए समय का कोई मुआवजा भी इन्हें नहीं मिलता। इसके लिए कानून में जमानत का प्रावधान तो है लेकिन वह आसानी से सर्वसुलभ नहीं है। कानून तो यह कहता है कि जेल अपवाद है, जमानत नियम है लेकिन हो इसका उल्टा रहा है। जेल में बंद दूसरी श्रेणी में वे कैदी आते हैं जिन पर निचली अदालत में दोष सिद्ध हो चुका होता है लेकिन ऊपरी अदालत द्वारा अपील की सुनवाई में वर्षों-वर्ष लग जाते हैं। इस दौरान भी जमानत का प्रावधान तो है लेकिन उच्च अदालतों से जमानत खरीद पाना जन-साधारण के बस की बात नहीं। ऊपरी अदालत द्वारा सुनवाई के बाद बेशक कोई निर्दोष साबित हो जाए तो भी उसके द्वारा जेल में बिताए समय का कोई मुआवजा नहीं। और तो और उसे जेल भेजने वालों के विरुद्ध भी किसी प्रकार की कोई कार्रवाई का प्रावधान नहीं है।
जेलों की संख्या और उनमें कैदियों को ठूंसने की क्षमता बढ़ाने की बजाय इस बात पर शासन-प्रशासन कोई विचार नहीं करता कि जनता को जेलों में ठूंसने की नौबत क्यों आ रही है? इस पर शासक विचार करने को तैयार नहीं कि युवाओं में अपराध की प्रवृत्ति क्यों बढ़ती जा रही है? जब शिक्षा, रोजगारपरक प्रशिक्षण तथा रोजगार के अवसर युवाओं से छीन लिए जाएंगे तो उनका अपराध की ओर अग्रसर होना का$फी हद तक स्वाभाविक हो जाता है।
आज हरियाणा के देहातों में बड़ी संख्या में युवाओं के झुंड के झुंड कतई निठल्ले घूम रहे हैं। देहातों में अच्छा खान-पान होने के साथ-साथ कसरत एवं पहलवानी आदि करने का शौक तो सदा से ही रहा है। गांव के स्कूलों से पढ़े ये बच्चे अपने इसी जीवन शैली के चलते फौज, पुलिस आदि में अच्छी नौकरियां पा लिया करते थे, लेकिन अब सब कुछ खत्म हो चुका है। इसी के चलते गांव-गांव में आपराधिक गैंग बनते जा रहे हैं। इनके बीच गैंगवार की खबरें भी दिनों-दिन बढ़ती जा रही है।
समझने वाली बात यह है कि जब अपराध व अपराधियों की बाकायदा फसल बोई जा रही हो तो उसे काबू करने के लिए जेलों व पुलिस थानों की कोई भी संख्या पर्याप्त नहीं हो सकती। इसे केरल उदारहण से बखूबी समझा जा सकता है जहां शिक्षा, रोजगारपरक प्रशिक्षण उपलब्ध होने के चलते वहां न तो कोई अनपढ़ रहता है और न ही कोई अकुशल मज़दूर बनता है। अपने हुनर की कुशलता के बलबूते वहां के लोग न केवल केरल, भारत बल्कि पूरी दुनिया में उपलब्ध रोजगार के अवसरों का पूरा लाभ उठाते हैं, वहां के युवाओं को गैंगस्टर बनने की जरूरत नहीं पड़ती।