भाजपा के लिए दिल्ली ब्लास्ट बना ध्रुवीकरण का हथियार फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) कुछ मुस्लिम लड़कों ने दिल्ली ब्लास्ट क्या कर दिया कि संघी-भाजपाई सरकार को पूरी मुस्लिम कॉम को निशाने पर लेने का सुनहरा मौका मिल गया। अब तक काफी समझदार हो चुके मुसलमानों ने संघियों के तमाम सरकारी व गैरसरकारी जुल्मों को चुपचाप सहने की रणनीति अपनाई हुई थी। पूरे देश भर में संघियों के तमाम ताांडव सहने के बावजूद इन्होंने कभी भी पलट कर जवाबी कार्रवाई नहीं की थी लेकिन पढ़े-लिखे कश्मीरी डॉक्टर युवाओं को अपने समाज की यह नीति पसंद नहीं आ रही थी, इसलिए ब्लास्ट जैसा बेहूदा कारनामा कर दिया। उक्त ब्लास्ट को लेकर एनआईए (नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी) के साथ-साथ हरियाणा व जम्मू कश्मीर पुलिस भी इस केस की जांच में जुटे हुए हैं। असल दोषियों को पकडऩे का काम तो लगभग पूरा हो चुका है। लेकिन संघ एवं भाजपाई सरकार का एजेंडा तो लम्बा चलने वाला है।
इस वारदात की आड़ में न केवल मेवात के घरों को बड़े पैमाने पर खंगाला जा रहा है बल्कि अल्फलाह यूनिवर्सिटी को भी लूटने व बर्बाद करने का पूरा प्रपंच रचा जा रहा है। संघियों द्वारा लगातार मांग की जा रही है कि इस यूनिवर्सिटी को बुलडोज कर दिया जाय तथा इससे सम्बध तमाम लोगों को जेल में डाल दिया जाय। उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं कि इस यूनिवर्सिटी में सैंकड़ों बच्चे एमबीबीएस व पीजी की पढ़ाई कर रहे हैं। इसके अस्पताल में प्रति दिन हजारों ग्रामीण इलाज के लिए आते हैं और सैंकड़ों मरीज भर्ती भी रहते हैं। इसी परिसर में पैरा मेडिकल व नर्सिंग कॉलेज के अलावा एक इंजीनियरिंग कॉलेज भी चल रहा है।
अपने इसी एजेंडे के तहत सरकार ने इसके चेयरमैन जवाद सिद्दीकी को गिरफ्तार कर लिया है। जिसे दिल्ली की पटियाला हाउस अदालत ने 19 तारीख को 11 दिन के लिए पुलिस रिमांड पर भेज दिया है। ‘मज़दूर मोर्चा’ गतांक में लिख चुका है कि सिद्दीकी परिवार इन्दौर शहर में चिट फंड एवं फाइनेन्स का काला-पीला धंधा करता था। वहां से खूब धन लूटने व बदनाम होने के बाद यह परिवार दिल्ली आ बसा। 1995 में इन्होंने गांव धौज के निकट 70 एकड़ जमीन खरीद कर पहले एक इंजीनियरिंग कॉलेज और बाद में मेडिकल कॉलेज आदि बनाए थे। इन सभी संस्थानों की मंजूरी, समय समय पर आने वाली केन्द्रीय व राज्य सरकारों से विधिवत प्राप्त की गई। मोदी राज में तत्कालीन शिक्षामंत्री स्मृति ईरानी तथा स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा के मंत्रालयों से तमाम तरह की स्वीकृतियां एवं प्रमाणिकताएं प्राप्त की गई।
सिद्दीकी परिवार के अलफला ट्रस्ट द्वारा खरीदी गई उक्त 70 एकड़ जमीन का समय-समय पर, आवश्यकतानुसार, तीन बार सीएलयू कराया गया। तीसरा एवं अंतिम सीएलयू खट्टर सरकार ने किया तथा इसी सरकार ने 2018 में मेडिकल कॉलेज चलाने की स्वीकृति प्रदान की थी। इसके अतिरिक्त, नियमानुसार एमसीआई (मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया) ने निरीक्षण उपरांत, इन्हें मेडिकल कॉलेज चालू करने की स्वीकृति प्रदान की थी। इसके बाद भी समय-समय पर एमसीआई इसका निरीक्षण करके स्वीकृति देती रही है। बाद में एनएमसी बनने पर उसने भी तमाम औपचारिकताएं पूरी होने पर इन्हें पीजी कोर्स शुरू करने की अनुमति बीते वर्ष ही प्रदान की थी।
यह रहस्य किसी से छिपा नहीं है कि तमाम शिक्षा व्यापारी, चैरिटी ट्रस्ट की आड़ में लूट एवं मोटी कमाई के लिए ही शिक्षण संस्थानों को खड़ा करते हैं। इन्हीं में से एक यह ट्रस्ट भी है। एनएमसी के कड़े नियमों से ढील पाने के लिए उन्हें रिश्वत देने का चलन कोई नया नहंी है, सो इस ट्रस्ट में भी उस चलन का फायदा उठाया। गौरतलब है कि हरियाणा सरकार के हाल ही में चालू हुए तीन मेडिकल कॉलेजों को एनएमसी द्वारा स्वीकृति देने से इनकार करने के बावजूद उन्हें चलाया जा रहा है। छांयसा स्थित अटल बिहारी मेडिकल कॉलेज तो बीते चार साल से बिना स्वीकृति के ही चल रहा है। इतना ही नहीं इसी वर्ष देश भर में ईएसआई कॉर्पोरेशन द्वारा चालू किए गए 10 मेडिकल कॉलेज भी इसी तरह चल रहे हैं। इनमें न तो पर्याप्त फैकल्टी है और न ही आवश्यक साजो सामान व बिल्डिंग।
ईडी भी पहुंची जांच करने लूट कमाई के लिए चल रहे शिक्षण संस्थान किसी से छिपे नहीं है। लेकिन उन पर शिकंजा केवल तभी कसा जाता है जब सरकार चाहे। अब अलफला ट्रस्ट पर सरकार की नजर टेढ़ी हुई तो ईडी भी अपना बस्ता लेकर वहां जा धमकी। बही-खाते खंगालने के बाद, बताया जाता है कि उसने 400 करोड़ की वह काली कमाई पकड़ी है जो छात्रों व अन्य स्रोतों से एकत्रित की थी। यह सारी कमाई चेक आदि के द्वारा न लेकर नकद प्राप्त की गई थी।
संदर्भवश जब खट्टर सरकार अपने मेडिकल छात्रों से 80 हजार सालाना फीस को बढ़ा कर आठ लाख कर सकती है तो निजी धंधेबाज 16 लाख वसूले तो क्या बड़ी बात है? समझने वाली बात यह भी है कि जिस अलफलाह ट्रस्ट का उद्देश्य ही लूट कमाई है वह भला आतंकवादियों को पालने-पोसने का जोखिम कैसे उठा सकता है? यह ठीक है कि अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा प्राप्त होने के चलते यहां मुस्लिमों को अपेक्षाकृत अधिक सीटें उपलब्ध होती हैं। इन्हें दाखिला या नौकरी देते समय यह जानना आसान नहीं होता कि कौन आतंकवादी है या नहीं? ऐसे में एक ग्रुप द्वारा की गई किसी आतंकवादी वारदात के लिए पूरे संस्थान को तो दोषी नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन संघी भाजपाई सरकार हाथ आए इस मौके को भला कैसे छोड़ दे?
हरियाणा सरकार के आदेश पर ट्रस्ट की सारी भूूमि की पैमायश व सीएलयू आदि की जांच की जा रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार दो एकड़ जमीन पर बनी मस्जिद व कुछ हॉस्टल ऐसे हैं जो बगैर सीएलयू के हैं। हो सकता है संघी इन्हें बुलडोज करके कुछ संतुष्टि प्राप्त कर लें।