सच्चे भारतीय की खोज में न्यायपालिका

सच्चे भारतीय की खोज में न्यायपालिका
August 10 17:48 2025

डॉ. रामवीर
नेताओं के सार्वजनिक भाषण और संसद व विधानसभाओं में हुई बहस मीडिया में हैडलाइन बनती देखी है पर कुछ दिनों से न्यायालयों की कार्यवाही में न्यायाधीशों की टिप्पणी भी ट्रेंड होने लगी है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश दीपांकर दत्ता का राहुल गांधी को ‘यदि आप सच्चे भारतीय होते तो…’ कहना न्यायाधीश पर ही सवालिया निशान लगाता दिख रहा है। लोग पूछ रहे हैं मी लोर्ड यदि आप सच्चे जज होते तो क्या आप ऐसी बेतुकी बात कहते। आपकी टिप्पणी आपके पद की गरिमा के प्रतिकूल व्हाट्सैपी/फेसबुकिया गैरजिम्मेदाराना पोस्ट जैसी प्रतीत होती है। 12 जनवरी 2018 को सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की कार्यप्रणाली के विरोध में चार न्यायाधीशों ने प्रेस काँफ्रेंस कर के न्यायपालिका के उच्चतम स्तर पर मौजूद सड़ांध की ओर देश का ध्यान खींचा था। दुर्भाग्य है कि इसके बाद भी न्यायपालिका ने आत्मनिरीक्षण नहीं किया और सड़ांध पहले से भी अधिक बढ़ती जा रही है। जस्टिस रंजन गोगोई जो उक्त प्रेस काँफ्रेंस में सम्मिलित थे जब स्वयं मुख्य न्यायाधीश बने तो उन्हीं कमियों को दुगना करने में लग गए जिनसे लडऩे के लिए कभी वे आगे आए थे। न्यायिक नैतिकता के यू टर्न का उनका रिकॉर्ड जन मानस में सुरक्षित है।

बाकी कोई कमी रह गई हो तो उसे जस्टिस डी वाई चन्द्रचूड ने न केवल निभाया बल्कि सेवानिवृत्ति के बाद भी निभा रहे हैं। सरकारी निवास खाली न करना और अपनी नई मर्सिडीज बेंज कार के खास नम्बर के लिए सर्वोच्च न्यायालय से पत्र भिजवाना उनकी वैयक्तिक प्रतिष्ठा में चार चांद लगा रहे हैं। उनकी प्रतियोगिता अगर किसी से है तो अपने स्वर्गीय पिता जस्टिस वाई वी चन्द्रचूड से ही है जिन्होंने 1976 के एडीएम जबलपुर केस के निर्णय में आपातकाल में जीवन के अधिकार के निलम्बन का भी समर्थन किया था और जब जनता पार्टी सरकार के समय उनके सीजेआई बनने का नम्बर आया तो अपने उस निर्णय पर खेद प्रकट किया था।

चैरिटी बिगिंस एट होम की तर्ज पर जजों को चाहिए कि वे सच्चे जज तलाशें। माननीयों को मान दें और निजी लाभ के लोभी नाम बडा और दर्शन छोटे टाइप येन केन प्रकारेण पदारूढ़ों की उपेक्षा करें। सच्चे भारतीय की पहचान न्यायपालिका का कार्यक्षेत्र नहीं है इसके लिए जूडिशल जार्गन वाले जज नहीं पूर्वाग्रह मुक्त स्वतन्त्रचेता चिन्तक और साहित्यकार चाहिए जो आजकल एंडैंजर्ड स्पीसीज में आते जा रहे हैं। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता Where the mind is without fear… सुन कर बडी हुई पीढ़ी बुद्धिजीवियों (इंक्लूडिंग जजिज) की बौद्धिक बेईमानियां देख कर व्यथित है। सच्चे भारतीय के रूप में लेखक के क्रेडेंशल्स क्लीअर हैं, बिल्कुल वैसे ही जैसे कवि माखनलाल चतुर्वेदी के – उनका उपनाम था ‘एक भारतीय आत्मा’।

  Article "tagged" as:
  Categories:
view more articles

About Article Author

Mazdoor Morcha
Mazdoor Morcha

View More Articles