गांव धनौता, मौजा बहादुरपुर पोस्ट जमनिया, जि़ला गाज़ीपुर, उप्र, में रहते हैं हरिनारायण सिंह और उनकी पत्नी सोमर देवी। उनके पास 2 बीघा ज़मीन है इसलिए वे किसान कहलाने के भी हक़दार हैं लेकिन उनकी जि़ंदगी ईंट भट्टे पर मज़दूरी या किसी धनी किसान की ज़मीन पर अध-बटाई पर खेती करने से चलती है इसलिए वे खेत मज़दूर कहलाने के भी हक़दार हैं। बहरहाल, जो भी कहिए दिन भर हाड़ तोड़ मेहनत कर दो जून की रोटी का जुगाड़ बिठाना उनकी नियति है। एक-दो बीघा ज़मीन के मालिक सीमांत किसान-सह-मज़दूर की जिंदगी क्या होती है वह हरिनारायण जी की प्रोफाइल को जाने बगैर समझ नहीं आएगी।
पिछड़ी खेती करने के लिए भी न्यूनतम 2 बैलों की ज़रूरत होती है जबकि हरिनारायण जी के पास एक ही है अर्थात कोई भी काम तब ही हो पाएगा जब उनके जैसा एक बैल वाला कोई दूसरा साझीदार हो। उनके 6 बच्चों के स्वास्थ्य की जि़म्मेदारी एक गाय और एक बकरी के जि़म्मे है। साल में बा-मुश्किल 100 दिन खेती और बाक़ी 265 दिन भर मज़दूर यही उनकी नियति है। छुट्टी क्या होती है वे नहीं जानते। उनकी ज़मीन में बस गेहूं- चावल उगाया जा सकता है। रोटी-चावल के साथ दाल भी चाहिए होती है इसलिए हरिनारायण और उनकी पत्नी सोमर देवी को गांव से 4 किमी दूर जहां दाल की फ़सल ज्यादा उगाई जाती है बनिहारी पर अरहर, चना और मसूर की फ़सल की कटाई करनी होती है। श्रम की बनिहारी व्यवस्था का मतलब है फ़सल काटने वाले श्रमिक को भुगतान पैसे में नहीं बल्कि फसल का दसवां हिस्सा देकर किया जाता है। उनका निवास मतलब पुआल की एक झोंपड़ी! टपकने से रोकने के लिए झोंपड़ी की छत पर बारिश के दौरान लगातार मरम्मत कार्य करना होता है। साथ ही न टपक रहे क्षेत्र में सारे सामान के साथ सिमट जाने की कला आना भी ज़रूरी ह।
फ्रेडरिक एंगेल्स ने कहा था, सीमांत किसान की जिंदगी मज़दूर से भी ज्यादा तक़लीफ़देह होती है। उसका शोषक वह ख़ुद होता है। जिंदा रहने की ज़द्दोज़हद में वह ज़मीन के अपने छोटे से टुकड़े में अपने बच्चों समेत पूरे परिवार को झोक देता है और घटती आय से निबटने के लिए अपना खर्च कम करता जाता है। शाम को 5 बजे मज़दूर तो खुश होता है कि चलो पसीना बहाने का वक़्त समाप्त हुआ हाथ-पैर धोकर आराम कर पाता है लेकिन सीमांत किसान शाम होने पर कराहता हुआ कहता है काश दिन कुछ और लंबा होता, सूरज इतनी जल्दी क्यों छिप गया?
हरिनारायण अपनी 6 संतानों में से सिफऱ् 4 को ही पढ़ा सकते थ। चौथे नंबर वाले लालबहादुर सिंह (जन्म 15 अगस्त 1985) का नंबर लग गया। बिछाने के लिए सीमेंट का एक ख़ाली कट्टा और लकड़ी की तख्ती शिक्षा के इन दो उपकरणों को संभाले लालबहादुर, गांव के प्राइमरी स्कूल जाने लगे। प्रोफाइल प्राइमरी स्कूल की भी ‘घर’ से मिलती हुई ही थी। स्कूल भी पुआल की झोंपड़ी में ही समाया हुआ था। मौसम में कैसी भी खऱाबी होने पर स्कूल की छुट्टी रहेगी यह शाश्वत नियम था।
एक दिन उस स्कूल में एक चमत्कार हुआ; स्लेट पर खडिय़ा से लालबहादुर ने एक बाघ का चित्र बनाया जिसे देखकर सब दंग रह गए! सब तरफ़ शोर मच गया। गांव के लोग राम-सीता, हनुमान, शंकर, मोर, बैल, बकरी के चित्र बनवाने लगे। उनके चित्रों की चर्चा फैलती जा रही थी। अब उन्हें शादी-ब्याह में दीवारों पर चित्रकारी करने के भी न्यौते आने लगे मतलब दावतें भी मिलने लगीं।
हरिनारायण, गांव के जिस धनी किसान की ज़मीन पर बटाई पर गन्ना और सब्जी उगाते थे उनकी बेटी की शादी का उत्सव चल रहा था। वे चाहते थे कि उनके घर की दीवार पर अनेमल पेंट से चित्रकारी बने जिससे उनकी बेटी की शादी की याद अमर हो जाए। लालबहादुर को बुलाया गया। उन्होंने अपने हुनर का करिश्मा फिर दिखा दिया। इस बार लालबहादुर ख़ुशी से झूम उठे क्योंकि उनके पूरे परिवार को दावत के साथ ही उनकी मां को तोहफ़े में एक साड़ी भी मिली!
चित्रकारी के साथ ही लाल बहादुर ने मिट्टी से मूर्तियां बनाने पर भी हाथ आजमाया। उनकी उंगलियों और दिमाग ने इस विधा में भी कमाल दिखाया। उन्होंने गणेश, दुर्गा, सरस्वती की मिटटी की मूर्तियां बनाई और रामनवमी पर पास के गांव के मेले में उन्हें बेचने ले गए। उनकी मूर्तियां बेहतरीन तराशी हुईं और जीवंत थीं लेकिन मेले में चमकीले रंगों वाली बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ भी उपलब्ध थी इसलिए उनकी मूर्तियां नहीं बिकीं। दोस्त का दिल ना टूट जाए इसलिए स्कूल के एक साथी ने उन्हें 20 पैसे में खऱीद लिया। लालबहादुर छठी क्लास में थे जब क़स्बा ज़मनिया गए। वहां पुआल की मूर्तियाँ बन भी रही थीं और बिक भी रही थीं। तुरंत उनके दिल में वैसी ही मूर्ति बनाने की हलचल हुई लेकिन बगैर किसी सांचे के मूर्ति कैसे बनतीं? मूर्तियों के वे व्यवसायी क्यों उन्हें अपना सांचा दिखाते। बच्चे के ज़हन में आईडिया आया। उसने मूर्ति का सर खऱीद लिया उसके ऊपर गीली मिट्टी जमाकर सांचा बना डाला और झट से सरस्वती की दो मूर्तियां गढ़ डालीं। एक मूर्ति 150 रुपये में बिक भी गई। उत्साह कई गुना हो गया क्योंकि लालबहादुर देखते थे कि एक-एक रुपया कमाने के लिए उनके मां-बाप को कितनी मेहनत करनी पड़ती है। ‘मैं उनका सहारा बनूं’ इससे ज्यादा ख़ुशी की भला क्या हो सकती थी! दूसरी मूर्ति गांँव में सरस्वती पूजा में काम आई।
गांव में अपना अस्पताल चलाने वाले डॉ सैय्यद वदूद की भूमिका उनके मुस्तक़बिल को तामीर करने में बहुत अहम गिनी जाएगी। डॉ वदूद लालबहादुर से बहुत प्यार करते थे। वे दवाइयां खऱीदने गाज़ीपुर के ‘मिश्रा बाज़ार’ जाते थे। उसी बाज़ार में ‘ब्याहुत आट्र्स’ नाम से गाज़ीपुर में ही नहीं बल्कि आस-पास के जिलों बनारस, मऊ, बलिया, बक्सर तक प्रसिद्ध पेंटर प्रदीप ब्याहुत की एक दुकान थी। पेंटर की दुकान देखते ही उनके ज़हन में लालबहादुर का चेहरा चमक आया। नवीं कक्षा में आ चुके लालबहादुर की आर्ट अब और परिपक्व होने लगी थी। गर्मी की छुट्टियों में डॉ वदूद ने उन्हें ‘ब्याहुत आट्र्स’ पर रखवा दिया।
दिल में लगातार घुमड़ रही कला प्रतिभा को अब लालबहादुर की नन्ही उंगलियां कच्चे-पक्के रंगों में बड़े-बड़े नेताओं की मूर्तियां, कट आउट, बैनर बनाकर अभिव्यक्ति देने लगीं। पिताजी तथा उनके जैसा लाड़ करने वाले उन्हें अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने की समझाईश देते रहे लेकिन लालबहादुर के दिल में चित्रकारी की उमंग कुलाचें भर रही थी। वे बहुत कुछ बना डालना चाहते थे। लालबहादुर अब दीवारों पर पशु आहार और ट्रेक्टर आदि के इश्तहार भी बनाने लगे। उनकी कला हर रोज़ निखरती जा रही थी। उनकी कला की मांग उन्हें आस-पास के शहरों में भी ले जाने लगी।
तब ही उनकी जिंदगी में एक और अहम शख्शियत की एंट्री होती है। गांव खालिसपुर निवासी कला अध्यापक श्रीकांत दुबे एक दिन ‘ब्याहुत आट्र्स’ पधारे। वे बच्चे की कला का हुनर देखकर दंग रह गए और कहा ‘बेटा, यहाँ क्या कर रहे हो, तुम तो दिल्ली आओ’। दिल्ली का नाम सुनते ही दिल में कला की बहुत ऊंंची लहर उठी। तब ही उन्हें ख्याल आया कि दिल्ली में तो प्यारेलाल जीजा, दीदी और भैया सनातन हैं ही जो राज मिस्त्री और बेलदारी का काम करते हैं। झोले में झटपट अपने कपड़े और पेंटिंग का सामान रखा और लालबहादुर पहुंच गए वसंत कुंज इलाक़े में अंधेरिया मोड़ झुग्गी बस्ती अपने बड़े भैया सनातन दीदी और जीजा प्यारेलाल के पास।
हर तरफ़ फि़ल्मी कलाकारों की पेंटिंग्स, होर्डिंग्स के चमचमाते विशालकाय आकर्षक बोर्ड उन्हें लुभाते। लेकिन ये बनते कहां हैं? लालबहादुर दिल्ली नाम के कंक्रीट के अंतहीन जंगल में उस जगह को ढूंढने लगे। सिनेमा हाल में गाड्र्स उन्हें हड़का देते। सनातन भैय्या की मदद से उन्हें मोरी गेट में 600/ महीना का काम मिल गया। बसें बदल-बदल कर अंधेरिया मोड़ से मोरी गेट के भीड़-भाड़ वाले इलाक़े में जाना जहां उनके मालिक को उनकी कला से कोई मतलब नहीं कभी दो शब्द शाबाशी के नही। महीना भर तक हर रोज़ हाथ-मुंह, कपड़े रंगने के बाद हाथ में 600 रुपये! उतने तो किराए में ही खर्च हो जाते थे। ऐसी दिल्ली किस काम की? इससे तो अपना गाज़ीपुर ही अच्छा था। निराश बालक लालबहादुर दिल्ली छोड़ गया।
वापस गाज़ीपुर। ‘ब्याहुत आट्र्स’ पर बैनर, पोस्टर, वाल पेंटिंग बनाना और यार इरशाद अंसारी उफऱ् पप्पू के घर में रहना उनकी दिनचर्या बन गई। एक साल ही बीता था कि दिल्ली से श्रीकांत दुबे की चिट्ठी आ गई। ‘दिल्ली आ जाओ। रहने का बंदोबस्त तुम खुद करो काम का बंदोबस्त हो गया ह। चित्रकारी का काम है 70 रुपये वर्ग फुट। भले हर रोज़ पापड़ बेलने पड़ें कमबख्त दिल्ली दिल से कहां निकलती है! पहले वाली, वही दिल्ली-लहर फिर ज़ोर मारने लगी। लेकिन रहेंगे कहाँ? अब तो जीजा-दीदी और भैया भी वापस गांव आ गए हैं। दोस्त लालबहादुर की मायूसी इरशाद बरदाश्त नहीं कर पा रहे थे। तुरंत बोले ‘मामू जावेद भी तो दिल्ली में रहते हैं वे किस दिन काम आएंगे! मैं भी चलूंगा तेरे साथ। झोले में एक चद्दर, पेंट-कमीज़, पेंटिंग का जुगाड़ और जेब में 1500 रुपये संभाले लाल बहादुर और इरशाद मामू जावेद के घर दिल्ली में संत नगर बुराड़ी पहुंच गए।
3 गुणा 4 फुट में रेमब्रांट की नाइट वाच पेंटिंग का काम दुबे जी ने ढूंढ ही रखा था। पैसे आने लगे तो सोचा जावेद मामू को क्यों तक़लीफ़ दी जाए, लालबहादुर ने वहीं पास में 250 रुपये महीना कमरा किराए पर ले लिया। कमरे की विशेषता इस प्रकार थी: ईंटों को प्लास्टर नसीब नहीं हुआ था, दरवाज़ा था ज़रूर लेकिन वह अपनी जि़म्मेदारी निभाएगा कोई गारंटी नहीं थी! पानी एक किलोमीटर दूर से लाना होता था वह भी तब जब नल पानी देने को राज़ी हो! टट्टी पेशाब के लिए दूर खेत में जाना पड़ता था। सिफऱ् ईंटों की दीवार पर कीलें गाड़कर चित्रकारी का कैनवास टांगने में पूरे कमरे के भरभराकर गिर जाने का ख़तरा था। दो महीने काम करने के बाद जैसे ही कुछ और पैसे जेब में आए लालबहादुर उस कमरे से मुक्ति पाकर जहांगीरपुरी में 500 रुपये महीने पर सीमेंट चद्दर की छत वाले लेकिन प्लास्टर दीवारों वाले कमरे में दाखि़ल हो गए।
जहांगीरपुरी मे लेकिन टट्टी-पेशाब करना बुराड़ी से भी ज्यादा कठिन था। पूरी गली के लिए नगर निगम का एक ही शौचालय था। 4 पुरुषों के और 4 महिलाओं के शौचालयों को दरवाज़े नसीब नहीं हुए थे। हर सुबह लंबी लाइन लगती थी। शौचालय के बाहर रखा पानी का डब्बा ही सबूत था कि बंदा अंदर टट्टी-पेशाब से मुक्ति पाने की ज़द्दोज़हद में है! कुछ लोग यह अहतियात भी बरतते थे कि जैसे ही किसी मनुष्य के नज़दीक बढ़ते पदचाप सुनाई पड़ते थे वे खांसते-खखारते थे। सघन सड़ांध को बरदाश्त करने के लिए नाक पर गमछे को टाइट बांधना ज़रूरी था। गांव से आए मासूम लालबहादुर ने इंसानी मल से लबालब भरे पॉट जिसमें से सफ़ेद कीड़े रेंग रहे होते थे वाली इस कठिन परीक्षा को भी पास करने का एक तरीका ढूंढ लिया था। कितना भी प्रेशर हो वे 10 बजे से पहले टट्टी करने नहीं जाते थे क्योंकि उसी वक़्त नगर निगम के सफ़ाई कर्मचारी वहां सफ़ाई करने आते थे।
जावेद मामू को अभी एक और ऐतिहासिक जि़म्मेदारी निभानी थी। वे दिल्ली के मशहूर नुक्कड़ नाटक संगठन, ‘निशांत नाट्य मंच’ से जुड़े थे। निशांत नाट्य मंच; क्रांतिकारी गीत, संगीत, नाटक की विधा द्वारा अपनी गौरवशाली क्रांतिकारी विरासत; भगतसिंह, अशफाकुल्लाह, चंद्रशेखर आज़ाद, उधम सिंह आदि महान क्रांतिकारियों के सपनों का भारत बनाने की मुहीम में लगा हुआ है। लालबहादुर के दिल में वह ज़ज़्बा पहले से ही मौजूद था। एक दिन वे अपने जावेद मामू के साथ उनके कार्यक्रम के लिए निकल लिए। वहां उनकी मुलाक़ात होती है ‘नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा (एनएसडी)’ से बाक़ायदा एक्टिंग का कोर्स कर इसी क्रांतिकारी मुहिम को समर्पित कॉमरेड नीलिमा शर्मा जी तथा सत्यवती कॉलेज दिल्ली में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर कॉमरेड शम्सुल इस्लाम से। सामाजिक सरोकार और संवेदनशीलता शुरू से ही पर्याप्त मात्रा में मौजूद थ मेहनतक़शों की तक़लीफ़ों को साक्षात भुगतने की वज़ह से उनकी टीस को महसूस करते ही थे। उसी दिन से लाल बहादुर, ‘निशांत नाट्य मंच’ का अभिन्न अंग बन गए। सामाजिक संवेदनशीलता के बगैर कोई इंसान अच्छा कलाकार नहीं बन सकता।
उनके व्यक्तित्व को गढऩे, निखारने में कॉमरेडस शम्सुल इस्लाम और नीलिमा जी का बड़ा हाथ ह। लालबहादुर ने उनसे ना सिफऩाट्य-गायन विधा सीखी बल्कि आर्थिक कठिनाईयों से आकंठ डूबे होने के बावजूद भी पढाई जारी रखना भी सीख। शुद्ध हिंदी बोलना, खाना बनाना भी सीखा। सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि देश के प्रतिष्ठित संस्थान ‘दिल्ली कॉलेज ऑफ़ फाइन आट्र्स’ से बैचेलर और मास्टर की डिग्रियां हासिल कीं। भले उनके लिए पेंटिंग का काम न मिलने पर फैक्ट्री में मज़दूरी ही क्यों ना करने पड़ी हो। एक और बहुत अहम विधा सीखी; ‘हार न मानने की जि़द’, जिसे माक्र्सवाद-लेनिनवाद हर किसी को सिखाता है। परेशानियां चाहे जितनी हों मंजि़ल चाहे जितनी मुश्किल हो हार नहीं माननी, मैदान छोड़कर नहीं भागना!
कठिनाइयाँ और अभाव साझा करने ख़ुशी और प्यार के रंग बिखेरन जब उनकी पत्नी रीना उनके जीवन में आइ तब वे 10 वीं में थे। कॉलेज पहुंचे तब बिटिया तूलिका और बेटे अबीर का प्रवेश हुआ। सफऱ अब भी उबड़-खाबड़ था लेकिन चलना आनंददायक हो गया था। धीरे-धीरे अभाव भी ग़ायब होने लगे। झुग्गी बस्ती जहांगीरपुरी से यह परिवार गढ़ी राजू पार्क होते हुए 2014 म फऱीदाबाद की पूर्वी सीमा से सटे गांव, ‘भूपानी’ शिफ्ट हुआ। हर रोज़ निखरती कला से अब लालबहादुर अपनी पहचान बना चुके थ उनकी सोच का कैनवास विस्तार ले रहा था, उनकी शोहरत फ़ैल रही थी और धन भी ला रही थी। लालबहादुर सिंह अब ‘एलबी सिंह’ के नाम से ख्याति पा चुके थे। उनकी रिहाइश अब ग्रेटर फऱीदाबाद की परिधि के बाहर भूपानी गांव से उसके ठीक बीचोंबीच तशरीफ़ ला चुकी थी।
‘एलबी सिंह’ के नए घर की एक विशिष्टता ने एक और करिश्मा किया। उनके घर की बाहरी दीवार पर ऊपर तीसरी मंजि़ल से नीचे ज़मीन तक हमारे महान शहीदों, क्रांतिकारियों चंद्रशेखर आज़ाद, भगतसिंह और अशफाकुल्लाह खान की तस्वीरें बनाई हुई हैं जो बाहर, दूर सड़क से ही स्पष्ट नजऱ आ जाती हैं। हमारे एक कार्यकर्ता ने उन्हें देख लिया और ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा फऱीदाबाद’ तथा इन पंक्तियों के लेखक को उनके घर पहुंचा दिया। मुलाक़ात हुइ बात हुई, बात आगे बढ़ी और दोस्ती हुई। उसके बाद घटी एक अहम घटना का उल्लेख बहुत ज़रूरी है। 2023 में दिल्ली के रामलीला मैदान में ‘संयुक्त किसान मोर्चा’ का एक कार्यक्रम था जिसमें हम संगठन के कई कार्यकर्ता, लालबहादुर, निशांत के दूसरे साथी ओमबीर जी भी थे जो बहुत हुनरमंद गायक और ढोलक वादक है। रामलीला मैदान पर हमने जो दो बैनर पकड़े हुए थे उन्होंने हमें ही नहीं बल्कि वहां उपस्थित कई हज़ार लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। सब लोग उन्हें ही देख रहे थे। देश में आज हिंदुत्ववादी, कट्टरवादी, अंधराष्ट्रवादी, उन्मादी समूह, फ़ासीवादी परियोजना का औज़ार बना हुआ है। उसने पूरे देश की नाक में दम कर रखा ह। एक बैनर पर अशफ़ाक, बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद की तस्वीरें थीं, दूसरा बैनर चित्रकार की शानदार सोच रेखांकित कर रहा था। उलटे लटके कमल के फूल से अनगिनत उलटे त्रिशूल नीचे हल पकड़े किसानों पर झड़ रहे थे। जो भी पोस्टर को देखता वह उस कला का संदेश स्पष्ट समझ जाता। इन महान शहीदों की गौरवशाली विरासत के वारिस होने का मतलब है इस कट्टरवादी, हिंदुत्ववादी, विघटनकारी ज़हरीली विचारधारा को पलट डालन उससे किसानों को बचाने के काम में लग जाना। समाज को फ़ासीवादी ख़ूनी पंजे से आज़ाद करना। कोई भी भाषण इस विचार को इतने प्रभावशाली तरीक़े से लोगों के ज़हन में नहीं उतार सकता था। उस कार्यक्रम के बाद हमारे संबंध प्रगाढ़ होते गए। लिट्टी-चोखा और चिकन-भात की लज्ज़तदार सामूहिक दावतों के बाद दोस्ती बेरोकटोक आगे बढ़ती गइ और पूरे संगठन को गर्व है कि वह कॉमरेड बनने तक विकसित प्रफुल्लित हो चुकी है।
हमें फख्र है कि कॉमरेड लालबहादुर सिंह क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा के सदस्य हैं। उन्हीं के मार्गदर्शन में हमारे कार्यक्रमों म बातों को क्रांतिकारी गीतों के सहारे रखा जाना शुरू हुआ और उन्हीं की सरपरस्ती में ‘उमंग रंग मंच’ वज़ूद में आया जो हमारे संगठन की शान है। कई बहुत सुंदर और क़ामयाब कार्यक्रम आयोजित कर चुका है। साथी लालबहादुर सिंह, रीना जी, तूलिका, जो फाइन आट्र्स के बैचेलर कोर्स की तैयारी कर रही हैं तथा अबीर जिन्होंने बारहवीं की परीक्षा बहुत शानदार अंदाज़ में पास की है; सभी क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा के बहुत जि़म्मेदार सदस्य हैं। हर कार्यक्रम में बहुत उत्साह और उमंग से हिस्सा लेते है। संगठन को उनकी उपलब्धियों पर नाज़ है।
साथी लालबहादुर सिंह क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा ही नहीं बल्कि मज़दूर महानगरी फऱीदाबाद का गौरव हैं। उनकी कला को सामाजिक सरोकार से अलग नहीं किया जा सकता। वे मूल रूप से जन-कलाकार हैं। बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं तथा ‘द हिन्दू’ जैसे प्रतिष्ठित अख़बार में उनकी आर्ट के रिव्यू और उनके इंटरव्यू छपते हैं। समूचे देश में उनका नाम है लेकिन उनकी शोहरत उन्हें अहंकारी नही बल्कि विनम्र बना रही है। उन्होंने ग़ुरबत भुगती है, समाज की आर्थिक तलहटी को महसूस किया है। उनकी जड़ें ज़मीन में बहुत गहरी और मज़बूत है जिन्हें शोहरत की कैसी भी चकाचौंध हिला नहीं सकती। मौजूदा प्रदर्शनियों में प्रदर्शित उनकी बहुत ही शानदार पेंटिंग्स में उन्होंन पर्यावरण विनाश के मुद्दे को बहुत सशक्त रूप से समाज के सामने पेश किया है। उनका स्पष्ट कहना है कि मौजूदा मुनाफ़ाखोर पूंजीवादी व्यवस्था में पर्यावरण को बचाया नहीं जा सकता। हमारे इस खूबसूरत गृह पृथ्वी को मुनाफ़े की हवस की भट्टी में राख होने से बचाना होगा। पूंजीवाद को ज़मीन में गाड़े बगैर यह मुमकिन नहीं। फिलहाल की उनकी गौरवशाली उप्लब्धियां इस तरह हैं:-
एकल प्रदर्शनियां; ‘फ़लक में परवाज़ की ख़ामोश आवाज़ और नीचे धरती की सुगबुगाहट, नव्या आर्ट गैलरी, बीकानेर भवन तथा साकेत, नई दिल्ली, 2025। ‘बहार नव्या आर्ट गैलरी, साकेत, नई दिल्ली, 2021। ‘यत्र , नव्या आर्ट गैलरी, ‘इंडिया आर्ट फेयर नई दिल्ली, 2018। ‘दृष्टिकोण नव्या आर्ट गैलरी, ललित कला अकादमी, नई दिल्ली, 2014।
सामूहिक प्रदर्शनियां एवं शो:- इंडिया आर्ट फेस्टिवल, नेहरू सेंटर, मुंबई 2025। ‘द मैजिक ऑफ़ गोल्ड नव्या आर्ट गैलरी साकेत, मुंबई, 2024। ‘नेचर वर्त, नव्या आर्ट गैलरी साकेत, जहांगीर आर्ट गैलरी, मुंबई, 2023। ‘इमेजिन फेस्ट, नव्या आर्ट गैलरी, नेहरू पार्क, नई दिल्ली तथा मुंबई आर्ट फेस्टिवल, मुंबई 2020।