फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) बीके अस्पताल में चल रहे रेफरल रैकेट के दो प्यादों 112 एंबुलेंस के चालक कन्हैया और इमरजेंसी मेडिकल टेक्नीशियन (ईएमटी) कृपाराम के खिलाफ करीब आठ महीने की कवायद के बाद एसजीएम नगर थाने में आईपीसी की धारा 420 के तहत केस नंबर 384 दर्ज कर लिया गया। इनके खिलाफ तो केस दर्ज कर लिया गया लेकिन उन लोगों को भी आरोपी बनाया जाना चाहिए था जो इनको संरक्षण देते हैं और लगातार आठ महीने से इन दोनों को बचाने के लिए पीडि़त परिवार पर दबाव बनाने से लेकर जांच की दिशा दशा बदलने में लगे थे। संभव है कि पुलिस घटना में इन दोनों को दोषी साबित कर न्यायालय से सजा दिलवा दे लेकिन वह रेफर के गोरखधंधे पर पाबंदी नहीं लगा पाएगी क्योंकि मोटी कमाई के इस खेल में बीके अस्पताल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से लेकर डॉक्टर तक शामिल हैं जिन्हें पीएमओ-सीएमओ की मूक सहमति रहती है।
सेक्टर 55 निवासी खुशबू शादी के आठ साल बाद गर्भवती हुई थी। 23 जनवरी 2024 की शाम प्रसव पीड़ा हुई तो पति मोनू ने उसे बीके अस्पताल में भर्ती कराया था। 24 जनवरी की रात खुशबू को अपरिपक्व प्रसव हुआ लेकिन कुछ देर बाद ही शिशु की मृत्यु हो गई थी। रात करीब दो बजे खुशबू की भी तबीयत बिगड़ गई, ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों ने उसे सफदरजंग अस्पताल रेफर कर दिया। बीके 112 एंबुलेंस सेवा से चालक कन्हैया और कृपाराम खुशबू को एंबुलेंस में लेकर सफदरजंग के लिए रवाना हुए लेकिन कुछ दूर चलने के बाद ही एंबुलेंस रोक दी। दोनों ने मोनू को वरगलाया कि खुशबू की हालत ज्यादा खराब है वह सफदरजंग अस्पताल नहीं पहुंच पाएगी। यदि जान बचानी है तो करीब ही स्टेशन रोड स्थित प्रयाग नर्सिंग होम में भर्ती करा दो। मोनू ने पैसा नहीं होने की बात कही तो दोनों ने कहा कि दस पांच हज़ार रुपये खर्च होंगे लेकिन तुम्हारी पत्नी की जान बच जाएगी, इसके बाद सफदरजंग ले जाना। मोनू कुछ निर्णय लेता इससे पहले ही दोनों ने प्रयाग नर्सिंग होम के दलालों को फोन कर वहीं बुला लिया। मोनू के ना नुकुर करने के बावजूद खुशबू प्रयाग नर्सिंग होम पहुंचा दिया गया।
यहां मौजूद डॉ. अमित ने नर्सिंग होम में उसे लूटने का खेल शुरू किया, पहले तो जांच प्लाज्मा चढ़ाने के नाम पर उसके दस हजार रुपये खर्च करवा दिए गए। सुबह बताया गया कि खुशबू की तबीयत सुधर रही है फिर अचानक बताया कि प्लेटलेट्स तीस हज़ार पहुंच गई है इसलिए आईसीयू में भर्ती करना पड़ेगा। इस बीच मोनू को वहां के दूसरे तीमारदारों ने वहां होने वाली लूट खसोट की जानकारी दी। इस पर मोनू ने पत्नी को डिस्चार्ज करने की जिद पकड़ ली। डॉ. अमित ने एंबुलेंस चालक कन्हैया और कृपाराम को भी बुला लिया। इन दोनों ने मोनू से अभद्रता तक की और मरीज को इसी नर्सिंग होम में भर्ती कराए रखने का दबाव बनाया। आखिर में आठ हजार रुपये चुकाने के बाद उन्होंने खुशबू को रिलीव किया था। सफदरजंग अस्पताल में खुशबू तीन दिन में ही भली चंगी होकर डिस्चार्ज कर दी गई थी।
मोनू ने इसकी शिकायत तत्कालीन सीएमओ विनय कुमार से की तो दोषियों को सजा देने के बजाय उन्होंने उल्टे उसे ही धमका दिया था। वह अड़ा रहा और एनआईटी तीन नंबर चौकी में इन दोनों के खिलाफ लिखित शिकायत दे दी। बताया जाता है कि क्योंकि 112 एंबुलेंस वाले सफरदरजंग रेफर किए गए मरीजों में से कुछ को आए दिन पुलिस चौकी के पास ही स्थित संतोष नर्सिंग होम पहुुंचाते रहते हैं, इसके बदले में चौकी वालों को भी कुछ चुग्गा पानी मिल जाता है इसलिए पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की लेकिन उसका शिकायती पत्र सीएमओ के यहां भिजवा दिया। इस पर सीएमओ ने दिन के उजाले जैसे साफ मामले की जांच के नाम पर कमेटी बैठाने का नाटक किया।
जैसा कि पहले से ही तय था मोनू को बुलाए बिना ही जांच कमेटी ने चालक और ईएमटी के बयान दर्ज कर लिए कि मोनू ने ही उसकी पत्नी को प्रयाग नर्सिंग होम ले जाने की बात कही थी। उन्होंने साढ़े सात रुपये प्रति किलोमीटर की दर से दो किलोमीटर के पंद्रह रुपये मोनू द्वारा चुकाए जाने की रसीद भी पेश कर दी। इस बयान के आधार दोनों को क्लीनचिट् दे दी गई। सुधी पाठकों को बताते चलें कि भले ही उन्होंने रसीद दिखा कर दो किलोमीटर जाने की बात साबित की लेकिन जीपीएस आधारित ऑनलाइन लॉग में एंबुलेंस का 65 किलोमीटर यानी सफदरजंग आना-जाना दर्ज था।
दरअसल, क्लीनचिट् तो दी ही जानी थी, रेफर किए गए मरीज के बिल का बीस से तीस प्रतिशत कमीशन जो एंबुलेंस चालक से लेकर 112 प्रभारी और उनके जरिए ऊपर तक बंटता है। यह रकम कितनी होती है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बीके अस्पताल से प्रतिदिन औसतन 24 मरीज रेफर किए जाते हैं। इनमें से आधे भी मान लिए जाएं हालांकि 75 प्रतिशत मरीजों को स्थानीय निजी नर्सिंग होम पहुंचा दिया जाता है। नर्सिंग होम में मरीजों का बिल तीस हजार से लेकर एक डेढ़ लाख तक बनाया दिया जाता है। यानी एक मरीज से कमीशन के रूप में न्यूनतम 10 हजार से लेकर पचास हजार रुपये तक मिलते हैं। एक दिन में यदि पंद्रह मरीजों से भी न्यूनतम कमीशन मिला तो यह रकम डेढ़ लाख रुपये होती है, जिसकी हिस्साबांट की जाती है।
मोनू ने आपत्ति जाहिर की थी कि उसका पक्ष नहीं लिया गया लेकिन पीएमओ सविता यादव से लेकर सीएमओ विनय गुप्ता ने उसकी बातों को सिरे से खारिज कर दिया। इस पर उन्होंने न्याय पाने के लिए कोर्ट का सहारा लेना चाहा। वह पत्नी को रेफर किए जाने संबंधी दस्तावेज की प्रतियां लेने बीके गए तो 112 एंबुलेंस स्टाफ के साथ कन्हैया और कृपाराम ने उन्हें रास्ते में ही रोक कर शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया। इनकार करने पर जाने से मारने की धमकी दी, उन्होंने इसकी शिकायत भी पुलिस में की लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई थी। यहां तक कि खुद को राष्ट्रीय समाचार पत्र कहने वाले अमर उजालाअखबार ने तो कन्हैया और कृपाराम को निर्दोष बताते हुए समाचार प्रकाशित कर दिया था जबकि बहुत सारे तथ्य इन दोनों के दोषी होने की गवाही दे रहे थे।
कहीं सुनवाई न होने पर उन्होंने डीसी से इसकी शिकायत की थी। डीसी ने एसडीएम बडख़ल को इसकी जांच सौंंपी, हालांकि बाद में एसीपी एनआईटी ने भी इसकी जांच की। जांच में सब दूध का दूध और पानी का पानी हो गया। अब मोनू की शिकायत पर दोनों के खिलाफ तो केस दर्ज हो गया है, लेकिन पुलिस को चाहिए कि इनको बचाने के लिए झूठी जांच करने वाले स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को भी साजिशकर्ताओं में शामिल कर उनके खिलाफ भी केस दाखिल करे।