फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) भ्रष्टाचार पर ज़ीरो टॉलरेंस का ढिंढोरा पीटने वाले खट्टर ने अपने रिश्वखोर भ्रष्टाचारी चेले धनेश अदलखा को लूट कमाई के बड़े हाथ मारने के लिए बडख़ल विधानसभा चुनाव का टिकट दिलवा दिया। कहने को तो अदलखा का टिकट भाजपा केंद्रीय चुनाव समिति ने 10 सितंबर को जाने की घोषणा की लेकिन खट्टर ने तीन महीने पहले ही उसका टिकट पक्का करवा दिया था। यही कारण है कि उसने हरियाणा फॉर्मेसी काउंसिल की मोटी लूट कमाई वाले अध्यक्ष पद से तीन महीने की छुट्टी ले ली थी और बडख़ल विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय हो गया था। मज़दूर मोर्चा ने जुलाई के अंक में ‘फार्मेसी काउंसिल की लूट कमाई ने खट्टर के विश्वासपात्र को प्रेरित किया शीर्षक से समाचार प्रकाशित कर बता दिया था कि अदलखा बडख़ल विधानसभा से चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहा है। मज़दूर मोर्चा की खबर सही साबित हुई, खट्टर-गूजर की पैरवी के कारण विधायक सीमा त्रिखा को टिकट नहीं दिया गया। हालांकि खट्टर से सीएम पद छीने जाने के बाद नायब सैनी ने सीमा को शिक्षामंत्री बनाया तो उनका कद बड़ा होने की अटकलें लगाई जा रही थीं लेकिन संघ-भाजपा को करीब से जानने वाले राजनीतिक विश्लेषकों ने तब ही कह दिया था कि सीमा को ऊपर उठा कर गिराने की तैयारी की जा है।
सदाचार, अनुशासन और पार्टी विद डिफरेंस का ढिंढोरा पीटने वाली भाजपा ने धनेश अदलखा को उसकी रिश्वखोरी- भ्रष्टाचार और गबन करने की योग्यता देख कर ही बडख़ल विधानसभा का टिकट दिया है। पार्षद रहते हुए नगर निगम की फाइनेंस कमेटी का सदस्य बन कर उसने मेयर सुमनबाला की आर्थिक शक्तियों का जमकर शोषण और दुरुपयोग किया, इस लूट मार में उसका पूरा साथ केंद्रीयमंत्री के बेटे और वरिष्ठ उपमहापौर देवेंद्र चौधरी ने दिया। दो सौ करोड़ के घोटाले में भी उसने प्रमुख भूमिका निभाई थी। संघ से आकर मुख्यमंत्री बने खट्टर ने अदलखा के भ्रष्टाचारी कौशल देखे तो उसके दीवाने हो गए और तुरंत ही उसे हरियाणा सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक चेयरमैन बना दिया। यहां तो नगर निगम से भी काफी कम कमाई थी। इस पर उसे हरियाणा फार्मेसी काउंसिल का चेयरमैन बना दिया गया। खट्टर की आकांक्षाओं पर खरा उतरते हुए उसने फार्मेसी छात्रों के पंजीकरण से लेकर फार्मासिस्टों के लाइसेंस रिन्यू करने में रिश्वतखोरी के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर डाले। उसकी रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार की शिकायत हुई तो मुकदमा दर्ज हुआ, दो गुर्गे गिरफ़्तार हुए, अदलखा फरार हुआ, अपने कमाऊ पूत का नाम एफआईआर से कटवाने के लिए खट्टर ने डायरेक्टर विजिलेंस शत्रुजीत कपूर पर दबाव डाला तब कहीं जाकर अदलखा पुन: लूट के मैदान में सक्रिय हो पाया। ‘ईमानदार खट्टर ने यह सब इसलिए किया क्योंकि अदलखा जो भी बड़ा हाथ मारता उसमें ईमानदारी से उनका हिस्सा पहुंचा देता। खट्टर को अदलखा का ‘ईमानदारी वाला भ्रष्टाचार इतना पसंद आया कि उसे लूट कमाई का और बड़ा मैदान उपलब्ध कराने के लिए हरियाणा स्टेट बोर्ड ऑफ टेक्निकल एजुकेशन (एचएसबीटीई) की परीक्षा कमेटी का सदस्य बना दिया। इस बोर्ड का सदस्य बन कर वह संघ परिवार के अयोग्य अभ्यर्थियों को तो पास कराता ही, मोटा पैसा देने वाले मोटी बुद्धि वाले अभ्यर्थियों को भी उत्तीर्ण करवाता।
अदलखा खट्टर और गूजर का इतना विश्वासपात्र है कि किसी भी सरकारी विभाग में लूट कमाई वाले सारे काम पर उसे एकाधिकार दे दिया गया। पूरे प्रदेश में हूडा के रिज्यूम प्लॉटों की ई ऑक्शनिंग में अदलखा ने खूब धांधली की। बताया जाता है कि गूजर और उसके लगुए भगुए बिल्डर भूमाफिया के लिए अदलखा ने हूडा के रिज्यूम प्लॉटों के ई ऑक्शन में खेल किया। उसने प्लॉटों की पूरी की पूरी लॉट बेस मूल्य पर खरीद कर प्रीमियम दामों पर बेच कर करोड़ों रुपये पीटे, जिसका हिस्सा ईमानदारी से खट्टर-गूजर तक पहुंचाता रहा।
कमाऊ चेले अदलखा को खट्टर ने इसी का ईनाम बडख़ल विधानसभा से टिकट देकर दिलाया है। जानकारों के मुताबिक सीमा त्रिखा को भी करीब चार महीने पहले ही यह पता चल गया था कि इस बार उनका टिकट कटेगा, यही कारण है कि उन्होंने मंत्री पद का मजा लेने के लिए प्रदेश भर में दौरा तो किया लेकिन अपनी बडख़ल विधानसभा में जनसंपर्क करने की कोई जरूरत नहीं समझी। त्रिखा के शिथिल पड़ते ही राजीव जेटली, राजन मुथरेजा भी काफी सक्रिय थे। राष्ट्रीय प्रवक्ता जेटली और भाजपा विधानसभा कोषाध्यक्ष को प्रदेश भाजपा नेतृत्व ने टिकट का आश्वासन देकर पार्टी के प्रचार में जुटा दिया था। इन दोनों ने बडख़ल विधानसभा क्षेत्र में जन संपर्क भी शुरू कर दिया था, लेकिन अचानक अदलखा ने फार्मेसी काउंसिल चेयरमैन पद से छुट्टी ली और विधानसभा चुनाव लडऩे का दावा करते हुए बडख़ल में कूद पड़े। खट्टर और गूजर की जी हुजूरी काम आई और उसे टिकट दे दिया गया। बताया जा रहा है कि अदलखा को टिकट मिलने से दुखी राजन मुथरेजा ने विधानसभा कोषाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है, अब ये देखना है कि वो नवीन गोयल, दीपक डागर आदि की तरह पार्टी से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे या केवल नाराजगी दिखा कर शांत हो जाएंगे।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार धनेश अदलखा का चुनाव जीतना नामुमकिन है। इसका कारण दस साल में भ्रष्टाचार चरम पर पहुुंचना और कोई विकास नहीं होना माना जा रहा है। दरअसल, संघ का फॉर्मूला है कि किसी भी स्वयंसेवक या कार्यकर्ता को इतना सशक्त न होने दो कि भविष्य में वह किसी पद की लालसा करे, यही कारण है कि भाजपा मेें चाहे विधायक हो या मंत्री अपने मन से न तो कोई विकास कार्य करा पाता है न ही किसी विकास कार्य की घोषणा कर पाता है। मोदी की तरह संघ-भाजपा के केंद्रीकृत शासन को लगता है कि यदि वो किसी अनजान चेहरे को भी टिकट देंगे तो वह जीत जाएगा। इसी अतिउत्साह का खामियाजा मोदी ने लोकसभा चुनाव में भुगता। हालांकि संघ उसी फार्मूले को हरियाणा में भी लागू करना चाह रही थी, बताया जा रहा है कि संघ का इरादा सत्तर प्रतिशत विधायकों का टिकट काट का अपने स्वयंसेवकों को प्रत्याशी बनाने का था। लेकिन लोकसभा चुनाव में करारी चोट खाने के बाद भाजपा के केद्रीय नेतृत्व से लेकर प्रदेश कार्यकारिणी ने इसका विरोध कर दिया। बावजूद इसके संघी खट्टर अपने चहेते अदलखा को टिकट दिलाने में कामयाब हो गए।