फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) बीके अस्पताल में मोदी-खट्टर के शाहाकार के रूप में 2017 में जोर शोर से खोला गया निजी हार्ट सेंटर भ्रष्टाचार और लूट कमाई का खुलासा होने के बाद से बीते आठ मार्च से बंद है। इसका खामियाजा करीब 28 लाख आबादी वाला शहर भुगत रहा है। बीके अस्पताल के आंकड़ों के अनुसार आज भी यहां प्रतिदिन औसतन साठ से सत्तर हृदयरोगी आते हैं लेकिन हार्ट सेंटर बंद होने के कारण उन्हें बिना इलाज के लौटना पड़ता है। सरकार की इच्छा ही नहीं है कि बीके अस्पताल में हृदयरोग या अन्य विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाएं दी जाएं, यदि इच्छा शक्ति होती तो सारा सेटअप मौजूद है, केवल हृदयरोग विशेषज्ञ डॉक्टर की तैनात करने से कम से कम इमरजेंसी हृदयरोगियों को तुरंत इलाज उपलब्ध करा उनकी जान बचाई जा सकती है।
मोदी-खट्टर सरकारों और संघ के करीबियों की मेडिट्रिना कंपनी को उचित दर पर दिल के रोगों का इलाज करने के लिए बीके अस्पताल में बाकायदा जगह उपलब्ध कराई गई थी। निजी कंपनियां कभी भी जनकल्याण नहीं बल्कि मोटे मुनाफे के लिए काम करती हैं। मेडिट्रिना प्रबंधन ने भी यही किया, मरीजों से अलग पैसा वसूला, सरकार से भी वसूली की और एकबार इस्तेमाल किए जाने वाला सामान भी कई कई मरीजों की सर्जरी में बार बार इस्तेमाल कर खूब पैसा बचाया। सरकार से विषेशज्ञ चिकित्सक की दर से भुगतान लिया और सर्जरी करवाई कम पैसा लेने वाले एक साधारण एमबीबीएस डॉक्टर से, इसमें कम से कम तीन मरीजों की जान भी चली गई। यही है मोदी-खट्टर-सैनी के स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण का सच।
मेडिट्रिना कंपनी फिलहाल यहां दोबारा हार्ट सेंटर चलाती नजर नहीं आ रही। ऐसे में सरकार को चाहिए कि हार्ट सेंटर सीएमओ-पीएमओ के अधीन कर हृदयरोगियों का इलाज शुरू करवाए। सुधी पाठकों को बताते चलें कि हार्ट सेंटर शुरू होने से पहले बीके अस्पताल में डॉ. नवीन गर्ग और तत्कालीन पीएमओ डॉ. वीरेंद्र यादव कॉर्डियोलॉजिस्ट थे। ये दोनों ही हृदयरोग की ओपीडी करते थे, कैथलेब की सुविधा न होने के कारण एंजियोग्राफी आदि सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। हार्ट सेंटर खुलने के बाद डॉ. नवीन गर्ग को पलवल के जिला अस्पताल भेज दिया गया। इससे भी बुरी बात यह हुई कि एक कार्डियोलॉजिस्ट को वहां स्त्री रोग एवं प्रसूति का काम सौंपा गया, एक विशेषज्ञ डॉक्टर के हुनर को बर्बाद करने की सरकारी योजना का यह बेहतरीन उदाहरण है। नवीन गर्ग की ही तरह प्रदेश भर में न जाने कितने अन्य विशेषज्ञ चिकित्सक जनरल फिजीशियन आदि की तरह काम कर रहे हैं।
यदि इन विशेषज्ञ चिकित्सकों को उनका ही काम सौंपा जाए तो प्रदेश भर की स्वास्थ्य सेवाओं में काफी सुधार हो सकता है। रेफर मुक्त फरीदाबाद के सतीश चोपड़ा कहते हैं कि डॉ. नवीन गर्ग को यहां बुलाकर उन्हें हार्ट सेंटर में लगाया जा सकता है। कैथलैब होने के कारण डॉ. नवीन गर्ग के हुनर का इस्तेमाल भी होगा और हृदयरोगियों को सरकारी दर पर इलाज भी मिल जाएगा। क्योंकि सारा सेटअप सरकारी अस्पताल में लगा है तो हृदय रोगियों और आम जनता के हित में जब तक मेडिट्रिना का विवाद समाप्त नहीं हो जाता तब तक सरकारी हृदयरोग विशेषज्ञों से हार्ट सेंटर चलवाया जा सकता है। मोदी-सैनी की पूंजीपति समर्थक सरकारें ऐसा करेंगी लगता नहीं है। ये सरकारें तो जनता को आयुष्मान, चिरायु योजनाओं के जरिए पांच लाख रुपये तक इलाज मुफ्त कराने का झुनझुना दिखा कर स्वास्थ्य सेवाओं से पल्ला झाडऩे वाला काम कर रही हैं। सरकार ने ही हर प्राइमरी, सेकेंडरी और टर्शरी स्वास्थ्य केंद्र, अस्पताल, मेडिकल कॉलेजों में चिकित्सकों के पदों का मानक तय किया है। बीके सिविल अस्पताल में करीब दो दशक पहले 55 चिकित्सकों के पद सृजित किए गए थे, वर्तमान में मानक के अनुसार चिकित्सकों की संख्या कम से कम नब्बे होनी चाहिए। सच्चाई यह है कि ये 55 पद ही पूरे नहीं भरे हैं तो समझा जा सकता है कि सरकार नागरिकों को कितनी स्वास्थ्य सेवाएं देना चाहती है। बीते करीब दस महीने से रेफर मुक्त फरीदाबाद के लिए धरने पर बैठे समाजसेवी सतीश चोपड़ा का अनशन बीते दिनों केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर और एनआईटी विधायक सतीश फागना ने जूस पिला कर खत्म कराया।
इन दोनों नेताओं ने रेफर मुक्त फरीदाबाद अभियान की सराहना तो की लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। कम से कम हार्ट सेंटर ही चलवाने का आश्वासन दे देते और हृदयरोगियों को इलाज के लिए निजी अस्पतालों में लुटने से बचा लेते। जानकार कहते हैं कि बीके अस्पताल में जल्द ही मदर चाइल्ड यूनिट का शिलान्यास होनेे वाला है। इसके लिए होने वाले भव्य कार्यक्रम में सतीश चोपड़ा का धरना प्रदर्शन काला दाग प्रतीत होता, इसलिए इसे समाप्त कराया गया। सरकार की मंशा यूनिट का उद्घाटन कर वाहवाही करवानी है न कि फरीदाबाद को रेफरमुक्त कराने की।