अशोक कुमार पांडेय
रंग-भंग सब भूल के मस्जिद पर हुड़दंग भौजी तरसें रंग को सूने पड़े मृदंग
सूने पड़े मृदंग होरिहर चीखें डीजे संग खड़ी प्रेमिका बंसवाड़ी में नारे सुन-सुन दंग
नारे सुन-सुन दंग होलिका भए प्रह्लाद मलंग राम-सिया के नयन पोछते, रावण हँसा प्रचंड
रावण हँसा प्रचंड हुआ होली के रंग में भंग देख तमाशा निकल लिए फिर राम लखन के संग
राम लखन के संग भगत सब लड़ते धर्म की जंग बोली सिया तब देवर से अब कौन लगाये रंग!