फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) सेक्टर 24 मुजेसर गांव में भारी आवागमन वाले मुजेसर फाटक के पास पूरी सड़क रेहड़ी-पटरी दुकानदारों से सुबह शाम पटी रहती है। इनके कारण यह रास्ता लगभग पूरी तरह अवरुद्ध हो जाता है, आने जाने वालों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। यहां मौजूद शराब की दुकान कोढ़ में खाज साबित होती है। दिन में 18 घंटे काम करने वाले प्रधानमंत्री मोदी से प्रेरित यह दुकान भी दारूखोरों के लिए चौबीसों घंटे चलती है, शटर गिराने के बाद भी चोर खिड़की से दारू की बिक्री जारी रहती है। इस ठेके के कारण यहां लगभग पूरे दिन शराबियों का जमावड़ा रहता है, जिनके कारण यहां अराजकता का माहौल बना रहता है। इससे सबसे कानून व्यवस्था बिगड़ती है, अपराध बढ़ते हैं लेकिन हरामखोरी पर तुले अधिकारियों को इस बात से कोई लेना देना नहीं।
सबसे ज्यादा परेशानी का सामना छात्राओं, औद्योगिक क्षेत्र में काम करने के लिए सुबह-शाम गुजरने वाले महिलाओं को होता है। ठेके पर ही शराब पीकर नशे में धुत्त ये शराबी इन छात्राओं व महिलाओं पर फब्ती कसने, अश्लील हरकतें तक करने से नहीं चूकते। स्थानीय लोगों के अनुसार पुलिस आयुक्त से लेकर नगर निगम और जिला प्रशासन तक सबसे दसियों बार शिकायत कर यहां अतिक्रमण की समस्या समाप्त करवाने और शोहदों व शराबियों पर अंकुश लगाने की मांग की गई लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती। दबाव पडऩे पर प्रशासन कार्रवाई का पाखंड करता है, दूसरे दिन से फिर वही अतिक्रमण, शराबनोशी और अराजकता का दौर शुरू हो जाता है। यह समस्याएं सिर्फ मुजेसर फाटक के पास होने वाले अतिक्रमण की नहीं बल्कि पूरे शहर की है लेकिन नगर निगम हो या पुलिस या जिला प्रशासन कार्रवाई नहीं करता। कारण बड़ा स्पष्ट है कि यह अतिक्रमण सरकारी अधिकारियों- कर्मचारियों की प्रतिमाह मोटी ऊपरी कमाई का जरिया है। ठेके के पास सड़क पर रेहड़ी लगाने वाला एक युवक आत्म विश्वास से कहता है कि कोई उन्हें नहीं हटवा सकता क्योंकि सबसे प्रतिदिन के हिसाब से वसूली होती है। रेहड़ी पर बैठा कर शराब पिलाने की सुविधा देने का एक दिन का रेट तीन सौ रुपये है। केवल रेहड़ी लगाने का रेट दो सौ रुपये और पटरी पर दुकान लगा वाले जगह के हिसाब से 110 से 150 रुपये तक देते हैं। मुजेसर फाटक के पास से ही प्रतिदिन तीस से चालीस हज़ार रुपये उगाही होती है। इस उगाही का काफी बड़ा हिस्सा पुलिस को जाता है, एक हिस्सा नगर निगम को और बाकी वसूली करने वाला दलाल रखता है। इस रकम के एवज में दलाल रेहड़ी वालों को हर प्रकार की कार्रवाई से बचाता है। युवक ने बताया कि जब बहुत ज्यादा दबाव बनता है तो फिर पुलिस दिखावटी कार्रवाई करती है, केवल उन्हीं रेहड़ी-पटरी वालों को हटाया जाता है जो या तो पैसे नहीं देते या वसूली दलाल उनसे नाराज हों। ऐसे दुकानदार तब तक रेहड़ी नहीं लगा पाते जब तक वो दलाल को संतुष्ट न कर दें या फिर बढ़ी हुई वसूली रकम अदा करें, बाकी दुकानदार तो कार्रवाई खत्म होने के बाद ही लौट आते हैं।
यह हाल सिर्फ मुजेसर फाटक ठेके का ही नहीं है, पूरे शहर में इस तरह की करीब डेढ़ सौ अतिक्रमण मार्केट रोजाना लगती हैं। इनके अलावा दिन के नाम पर लगने वाली बाजारें अलग हैं। सोम बाजार, बुध बाजार आदि नाम की इन बाजारों में करीब एक हज़ार छोटी बड़ी दुकानें लगती हैं। इनसे ढाई गुणे छह पांच फीट की एक मेज के लिए 110 रुपये, एक एलईडी लाइट और बैटरी के लिए तीस रुपये, जगह के हिसाब से 100 रुपये से 400 रुपये तक किराया वसूला जाता है। जानकारों के अनुसार इन बाजारों से रोजाना औसतन डेढ़ से दो लाख रुपये की वसूली होती है। क्योंकि ये बाजारें नगर निगम की जगह पर लगती हैं इसलिए वसूली का बड़ा हिस्सा नगर निगम के संबंधित जेई, एसडीओ को मिलता है, वे हिस्सापत्ती ऊपर तक पहुंचाते हैं। बाजार की कानून व्यवस्था संभालने के नाम पर संबंधित चौकी-थाने को भी हिस्सा पहुंचाया जाता है।
प्रत्येक महीने मिलने वाले वेतन के अलावा मोटी ऊपरी कमाई को न तो नगर निगम के भ्रष्ट अधिकारी और न ही अवैध वसूली के लिए बदनाम पुलिस महकमे के अधिकारी छोडऩा चाहते हैं। यही कारण है कि बार-बार शिकायतें होने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं होती। नगर निगम के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अतिक्रमण तो एक दिन में हटा दिया जाए लेकिन नेतागीरी के कारण कार्रवाई नहीं हो पाती। यह सच है कि जनता को परेशानी का सामना करना पड़ता है, सबसे आसान काम शिकायत करना है। जागरूक जनता को यह समझ लेना चाहिए कि गैंडे से मोटी चमड़ी वाले प्रशासन पर तब तक कोई असर नहीं होता जब तक जनता सड़कों पर न उतरे, प्रशासन को सीधी सादी भाषा में बात समझ में नहीं आती, इनकी खाल पर जूं केवल तब रेंगती है जब जनता सड़कों पर उतर आए।