मज़दूर जब भी जागा है, इतिहास ने करवट बदली है!!

मज़दूर जब भी जागा है, इतिहास ने करवट बदली है!!
April 05 17:09 2025

क्रांतिकारी मजदूर मोर्चा
हवाओं में रहेगी मेरे खय़ाल की बिजली; ये मुश्ते खाक़ है फानी रहे, रहे, ना रहे साथियों, 23 मार्च 1931 को, देश के 3 लाड़ले सपूतों, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव को, औपनिवेशिक साम्राज्यवादी लुटेरे शासक, अंग्रेज़ों ने लाहौर की सेंट्रल जेल में फांसी पर लटकाया था. आईये, महज़ 23-24 साल की उम्र में, हंसते-हंसते अपनी जान न्यौछावर करने वाले, इन महान क्रांतिकारियों को तहेदिल से सलूट करें. अपनी गौरवशाली क्रांतिकारी विरासत का सम्मान करते हुए, अमर शहीदों के विचारों को समझें, दूसरों को समझाएं और उनके आदर्शों पर चलने का अहद लें. उनके सही वारिश होने का फज़ऱ् अदा करें.

महान क्रांतिकारियों की शहादत के 94 साल बाद,आज, जब हम उनकी क़ुर्बानियों को याद करते हैं, तो ज़हन में सबसे पहला सवाल आता है: क्या ये वही आज़ादी है, जिसके लिए इन क्रांतिकारी योद्धाओं ने फांसी के फंदे चूमे थे? इस सवाल का जवाब हमें, शहीद-ए-आज़म भगतसिंह के 1928 में, फिऱोज़शाह कोटला में, देश के क्रांतिकारियों को संबोधित करते हुए दिए भाषण से ही मिल जाता है:

“सिफऱ् आज़ादी हमारा मक़सद नहीं. आज़ादी का मतलब क्या है? हुकूमत अंग्रेज़ों के हाथों से निकलकर, मुट्ठी-भर रईस और ताक़तवर हिंदुस्तानियों के हाथ आ जाए, क्या यही आज़ादी है? इससे आम इंसान की जि़ंदगी में कोई फ़र्क आएगा? क्या मज़दूर और किसान वर्ग के हालात बदलेंगे, उन्हें उनका सही हक़ मिलेगा? नहीं. आज़ादी सिफऱ् पहला क़दम है, साथियों! मक़सद है वतन बनाना. ऐसा वतन, जहाँ हर तबक़े के लोगों को बराबरी से जीने का हक़ मिले, जहां मज़हब के नाम पर समाज में बंटवारा ना हो. एक ऐसा वतन, जो इंसान पर, इंसान पर ज़ुल्म बरदाश्त ना करे. यह मुश्किल है, लेकिन असंभव नहीं. भारत, जहाँ इतने सारे धर्म, जातियां, भाषाएं, संस्कृति हैं, उसे एक साथ जोड़े रखना आसान नहीं. लेकिन अगर हम इस बात को आज नहीं समझेंगे और इस मसले को लेकर आज संघर्ष नहीं करेंगे, तो भारत, कल एक आज़ाद मुल्क तो होगा, लेकिन एक भ्रष्ट, शोषक और सांप्रदायिक समाज बनकर रह जाएगा.”

साथियों, ये हक़ीक़त अब छुप नहीं सकती कि 15 अगस्त 1947 को, देश, अंग्रेज़ों की गुलामी की जि़ल्लत से तो ज़रूर आज़ाद हुआ, लेकिन वह आज़ादी नहीं मिली, जिसके लिए आज़ादी के मतवाले, हज़ारों योद्धाओं ने अपनी जानें क़ुर्बान कीं, जेल गए और लाखों लोग अपने घर-परिवार छोड़ आज़ादी आंदोलन में कूद गए. असलियत ये है कि गोरे अंग्रेज़ों की जगह भूरे अंग्रेज़ सत्ता में आ गए. मज़दूरों-मेहनतक़श किसानों की मेहनत हड़पकर, अपनी तिज़ोरियां भरने का काम अब, अंग्रेज़ों की जगह; टाटा-बिड़ला; अडानी-अंबानी; लखानी-वमानी; चोपड़ा-गुलाटी कर रहे हैं. मज़दूरों का खून आज पहले से भी ज्यादा बेरहमी से चूसा जा रहा है. उनके अधिकारों पर डाका डालने, उन्हें एकजुट ना होने देने, मज़हब के नाम पर लड़ाने में, देसी अंग्रेज़, विदेशी अंग्रेज़ों से कहीं आगे हैं.

जिन काले क़ानूनों, ‘पब्लिक सेफ्टी बिल तथा ‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल के विरुद्ध, भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने, दिल्ली असेंबली में बम फोड़े थे: ‘बहरों को सुनाने के लिए धमाकों की ज़रूरत होती है, उनसे कहीं ज्यादा ख़तरनाक क़ानून, मोदी सरकार पास कर चुकी है. एक झटके में मज़दूरों की कुर्बानियों से हांसिल 44 क़ानून छीन लिए गए हैं. विरोध की हर आवाज़ को बेरहमी से कुचला जा रहा है. आज, मालिक जो कहें, वही कानून है. कमरतोड़ मंहगाई, बे-इन्तेहा बेरोजग़ारी और आधी भुखमरी वाला वाला वेतन!! ये कैसी आज़ादी है? सरकार, धन्ना सेठ कॉर्पोरेट, अडानी-अंबानी की मुंशीगिरी कर रही है. मंहगाई रोकना, रोजग़ार देना, शिक्षा-स्वास्थ्य की व्यवस्था करना, सरकार के एजेंडे में ही नहीं रहा. उसकी जगह मस्जिदों के नीचे मंदिर तलाशे जा रहे हैं. सरकार, दरअसल भयभीत है; दु:ख तक़लीफ़ों से कराहते लोग एक हो गए, तो पूंजी के इस लूट-तंत्र को कैसे बचाया जाएगा?

ज़ाहिर है, आज़ादी के नाम पर हमारे साथ ठगी हुई है. अमर शहीद क्रांतिकारियों की शहादतों का अपमान हुआ है. हमें, लेकिन, मायूस होकर कलपने की नहीं, बल्कि जागरुक और एकजुट होकर, असली आज़ादी हांसिल करने के लिए आगे बढऩे की ज़रूरत है. आर्थिक आज़ादी के बगैर, सभी आज़ादियाँ झूठी हैं, फऱेब हैं. शहीद-ए-आज़म भगतसिंह ने ही हमें समझाया है;

‘बम और बंदूकें क्रांति नहीं लाते. क्रांति की तलवार की धार, विचारों की सान पर तेज़ होती है. पूंजी की गुलामी से आज़ादी की लड़ाई को इसके अंजाम तक पहुँचाना होगा. फांसी से महज़ 3 दिन पहले भगतसिंह ने लिखा था कि देश के मज़दूरों, मज़लूमों, कमेरों तथा मुफ़्तखोर, लुटेरी मालिक जमात के बीच यह संघर्ष तब तक ज़ारी रहेगा, जब तक देश के समस्त आय के साधनों से, चंद लोगों का एकाधिकार ख़त्म नहीं हो जाता, जब तक पूंजी द्वारा लूट का ये मौजूदा ढांचा समाप्त नहीं हो जाता. असली आज़ादी लाने की ताक़त मज़दूर और मेहनतक़श किसान वर्ग में ही है. आईये, पूंजी से मुक्ति की अपनी ऐतिहासिक मंजि़ल की ओर आगे बढ़ें. अमर शहीदों के सही वारिस बनें.

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Mazdoor Morcha
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