मालेगाँव, करकरे और कुछ सवाल

मालेगाँव, करकरे और कुछ सवाल
April 06 17:51 2026

आनन्द स्वरूप वर्मा पत्रकारिता का अंधा युग-20
(12 मई, 2016 को यह खबर अखबारों की सुर्खियाँ बनीं कि 2008 के मालेगाँव बम धमाकों के मामले में नेशनल इनवेस्टिगेशन एजेंसी (एनआइए) ने तय किया है कि वह मुंबई की अदालत में जो चार्ज शीट दाखिल करने जा रही है, उसमें आरोपियों में साध्वी प्रज्ञा सिंह वाकुर का नाम नहीं रहेगा। इसी के साथ यह भी संकेत दिया गया कि महाराष्ट्र के पूर्व एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे द्वारा की गयी जाँच त्रुटिपूर्ण थी, उन्होंने दूसरे प्रमुख आरोपी कर्नल प्रसाद पुरोहित को ऊँसाने के लिए फर्जी साक्ष्यों का सहारा लिया और तमाम गवाहों से डरा-धमका कर बयान लिये । अखबारों में प्रकाशित खबरों के अनुसार एनआइए का मानना है कि 2008 में पुरोहित की गिरफ्तारी के समय देवलाली आर्मी कैंप स्थित उसके निवास में एटीएस ने ही विस्फोटक (आरडीएक्स) रखे थे। एनआइए ने यह भी तय किया है कि पुरोहित तथा अन्य आरोपियों के खिलाफ ‘महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून’ (मकोका) की धाराओं को निरस्त कर दिया जाएगा और अब उन पर मुंबई की यूएपीए अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया जाएगा। 2008 में जब जाँच दल एक-एक सूत्र को पकड़ते हुए साध्वी प्रज्ञा तक पहुँचा था उस समय भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी और मौजूदा गृह मंत्री राजनाथ सिंह सहित सभी छोटे-बड़े नेताओं ने इसका खूब विरोध किया था। अब इन आरोपियों को क्लीन चिट देने का समय आ गया है जिसकी कवायद मोदी सरकार के सत्ता में आते ही शुरू हो गयी थी। याद करें इस मामले की सरकारी वकील रोहिणी सालियान के 24 जून, 2015 के वक्तव्य को जिसमें उन्होंने एक भेंट वार्ता में यह रहस्योद्घाटन किया था कि मोदी सरकार के गठन के बाद से ही किस तरह उन पर दबाव डाला जा रहा है कि वह इन आरोपियों के मामले में ‘नरमी’ दिखायें। उन दिनों हेमंत करकरे को भी भारी मानसिक यंत्रणा से गुजरना पड़ रहा था और उन्हें आए दिन धमकियाँ मिल रही थीं 2009 में ‘हंस’ में प्रकाशित इस लेख को आज फिर से प्रकाशित करने का मकसद उन घटनाओं और उन हालात की रोशनी में सरकार के हाल के निर्णय को समझना है ताकि सही विश्लेषण तक पहुँचा जा सके-संपादक)

मई 2008 में देश के अंदर घटित अनेक आतंकवादी घटनाओं का विश्लेषण करते हुए ‘अवामी भारत’ मुंबई के संयोजक फिरोज मीठीबोरवाला और किशोर जगताप ने लिखा था- ‘हम जनता से अनुरोध करना चाहते हैं कि वह आतंकवाद की इस महाविपदा के प्रति जागरूक हो। यह हमारे समय की राजनीतिक और सामाजिक चुनौती बन गया है। इसने अभिजात्यवर्ग द्वारा भारत के व्यापक जनसमुदाय को नियंत्रित करने की नयी प्रणाली का रूप ले लिया है और हमें इस खतरे का मिलजुल कर मुकाबला करना चाहिए। आतंकवादी हमलों का शिकार कोई राजनीतिक नेता नहीं होता है-यहाँ तक कि उस समय भी नहीं जब संसद पर हमला किया जाता है। लेकिन हम मंदिरों, मस्जिदों, गिरिजाघरों, गुरुद्वारों और बुद्ध विहारों में मारे जाते हैं। हम बसों में, ट्रेनों में और टैक्सियों में मरते रहते हैं। हम जानते हैं कि वे झूठ बोल रहे हैं, मीडिया झूठ बोल रहा है और पुलिस भी वही कर रही है। हमें इनके जवाब ढूँढऩे की जरूरत है लेकिन इसके लिए हमें कुछ बुनियादी सवाल भी उठाने की जरूरत है और जरूरत है उस दायरे को चुनौती देने की जिसमें बँधे-बँधाये ढंग से हम सोचने के लिए, बल्कि न सोचने के लिए मजबूर रहते हैं।’ इस निष्कर्ष तक पहुँचने से पहले इन दोनों कार्यकर्ताओं ने देश के अंदर पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न स्थानों में हुए आतंकवादी हमलों का विश्लेषण किया था।

आज समूचा माहौल कुछ ऐसा बना दिया गया है जिसमें ‘आधिकारिक’ विवरण से अलग सोचने के प्रयास मात्र को न केवल सत्ता के भागीदार पक्ष-प्रतिपक्ष द्वारा बल्कि मीडिया के एक बहुत बड़े हिस्से द्वारा भी देशद्रोह मान लिया जाता है। सवाल उठाना राष्ट्रविरोधी काम मान लिया गया है। संदेह व्यक्त करना दुश्मन को मदद करने जैसा हो गया है। मुंबई की घटनाओं पर जब अंतुले ने कुछ सवाल उठाये तो उसे राजनीति से प्रेरित कह कर खारिज कर दिया गया। इतिहासकार अमरेश मिश्र ने जब मुंबई की घटनाओं के पीछे सीआईए-मोसाद-उग्र हिंदू संगठन का गठजोड़ कहा तो उसे ‘विकृत सोच’ बता दिया गया। किसी राजनेता ने सवाल उठाया तो उसे ‘तुष्टिकरण’ की नीति पर चलने वाला कह दिया गया। कई चैनलों ने चीख-चीख कर सवाल उठाने वालों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की माँग की। हालत यह हो गयी कि देश के एक प्रमुख अखबार ने अपनी फॉलोअप स्टोरी देने का साहस नहीं किया जिससे मालेगाँव धमाकों की जाँच कर रही एटीएस टीम के सदस्यों के सफाये पर रोशनी पड़ सकती थी। यह एक इत्तफाक ही है कि मुंबई हमले से तीन दिन पूर्व 23 नवंबर को ‘नई दुनिया’ ने प्रथम पृष्ठ पर विनोद अग्निहोत्री की एक लंबी रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें बताया था कि किस प्रकार ‘मुस्लिम आतंकवादी संगठनों के समानांतर हिंदू आतंकवादी संगठन’ बनाने में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए और इस्राइली खुफिया एजेंसी मोसाद के साथ ही कुछ अन्य विदेशी एजेंसियाँ सक्रिय हो गयीं हैं। इसमें यह भी कहा गया था कि हेमंत करकरे के नेतृत्व में मुंबई एटीएस की टीम ने मालेगाँव धमाकों के आरोपियों- साध्वी प्रज्ञा सिंह, सेनाधिकारी श्रीकांत पुरोहित और स्वघोषित शंकराचार्य दयानंद पांडे की गिरफ्तारी से जुड़ी कडिय़ों को जितनी कुशलता से पकड़ा है उससे कई रहस्यों पर से पर्दा उठ सकता है। इसी अखबार ने फरवरी 2007 में यहूदियों के सबसे बड़े धर्मगुरु (प्रधान रब्बी) योना मेट्जर की भारत यात्रा का जिक्र करते हुए बताया था कि इनकी मुलाकात राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंचालक के.एस. सुदर्शन, विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल, विष्णु हरि डालमिया आदि से हुई थी। रिपोर्ट में बताया गया था कि यहूदी प्रमुख रब्बी ने रात में लालकृष्ण आडवाणी के घर पर भोज किया, कि राजग सरकार के जमाने में उप-प्रधानमंत्री आडवाणी ने इस्राइल यात्रा के दौरान मोसाद के प्रमुख से उनके कार्यालय में जाकर मुलाकात की आदि। जिन लोगों ने मुंबई की घटनाओं पर सवाल उठाये उनमें से किसी ने यह नहीं कहा कि इन हमलों के पीछे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई अथवा लश्कर-ए-तैयबा का हाथ नहीं है। अमरेश मिश्र ने तो साफतौर पर कहा कि काफी समय से मोसाद और आईएसआई का कट्टरवादी खेमा मिलजुल कर काम कर रहा है फिर भी संदेह उठाने वालों पर आरोप लगाया गया कि वे पाकिस्तान का बचाव कर रहे हैं। क्या यह सवाल उठना स्वाभाविक नहीं था कि ऐसे समय जब एटीएस मुंबई की टीम आतंकवाद के एक सर्वथा नये रूप को उजागर करने वाली हो उसी समय यह हमला क्यों किया गया? क्या एटीएस मुंबई की जाँच टीम के सफाये का फौरी लाभ उन लोगों को नहीं मिला जो मालेगाँव सहित पिछले चार-पाँच वर्षों की आतंकवादी घटनाओं में उग्र हिंदू संगठनों के शामिल होने की बात को एक साजिश कह रहे थे? सरकारी/आधिकारिक वक्तव्यों अथवा विवरणों पर संदेह करने का पर्याप्त कारण क्या इसलिए नहीं है कि अतीत की अनेक आतंकवादी कार्रवाइयों में लिप्त मान कर मुस्लिम संगठनों के लोगों को प्रताडि़त किया गया जबकि एटीएस मुंबई की जाँच के प्रारंभिक नतीजों से इन घटनाओं में हिंदू उग्रवादी संगठनों के शामिल होने का पता चलता है? क्या इस तरह के आधे-अधूरे निष्कर्षों के आधार पर इस उपमहाद्वीप को युद्ध की आग में झोंकने का माहौल तैयार करना उचित है? इन सवालों का उठना स्वाभाविक है और इन सवालों से रूबरू होने की बजाय सवाल उठाने वालों को ही कठघरे में खड़ा करना सही अर्थों में राष्ट्र विरोधी कार्रवाई है।

2006 में नांदेड़ (महाराष्ट्र) बम धमाकों की जाँच के समय महाराष्ट्र एटीएस प्रमुख के पद पर के.पी.एस.रघुवंशी थे जिन्होंने अपनी चार्जशीट में कहा था कि इन धमाकों के पीछे विश्व हिंदूपरिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बजरंग दल का हाथ था। रघुवंशी ने आरोप पत्र में परबनी और पुरना के बम धमाकों में भी इन संगठनों का हाथ बताया था। उन्होंने यह भी कहा था कि पुणे में इन तत्त्वों ने प्रशिक्षण शिविर भी चलाये थे जिनमें पाइप बम बनाने का प्रशिक्षण दिया गया था। 15 नवंबर को ‘तहलका’ में प्रकाशित इंटरव्यू में रघुवंशी ने कहा है कि पिछले धमाकों की तरह मालेगाँव धमाकों में भी बाइक का इस्तेमाल किया गया है। फर्क इतना है कि इस बार आरडीएक्स का भी इस्तेमाल हुआ है और ज्यादा उन्नत हथियारों और तकनीकों को प्रयोग में लाया गया है। इस बार भी धमाकों का निशाना मुसलमानों को बनाया गया है। सारे तौर-तरीकों को देखने से रघुवंशी ने आशंका व्यक्त की कि मालेगाँव धमाकों में भी उन्हीं तत्त्वों का हाथ हो सकता है जिन्होंने नांदेड़, परबनी और पुरना में विस्फोट किये थे। रघुवंशी के बाद हेमंत करकरे इस पद पर आए और मालेगाँव की जाँच के सिलसिले में उन्हें एक के बाद एक ऐसे सूत्र मिलते गये जिससे जाँच टीम पुणे की एक संस्था ‘अभिनव भारत’ तक पहुँच गयी। इस संस्था की प्रमुख हिमानी सावरकर हैं जो नाथूराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे की पुत्री और कट्टरपंथी हिंदू विनायक दामोदर सावरकर के भांजे दिवंगत अशोक सावरकर की पत्नी हैं। नाथूराम गोडसे को 15 नवंबर, 1949 को गाँधी जी की हत्या के आरोप में फाँसी दी गयी थी। अभिनव भारत प्रतिवर्ष इस दिन ‘हुतात्मा नाथूराम गोडसे इच्छापत्र न्यास’ के बैनर तले उनकी पुण्य तिथि मनाता है जिसमें ‘अखंड भारत’ के लिए संकल्प लिया जाता है। इस बार भी 15 नवंबर, 2008 को पुणे के शिवाजी नगर में एक समारोह आयोजित किया गया जिसमें हिमानी सावरकर ने सभी हिंदुओं से अपील की कि वे मालेगाँव धमाकों में पकड़े गये लोगों की मदद करें। उन्होंने कहा कि इन आरोपियों को कानूनी मदद देने के लिए वे ‘हिंदू लीगल एड फर्म’ के नाम से ड्राफ्ट अथवा चेक भेजें।

उधर इसी दिन यानी 15 नवंबर को पानीपत में आयोजित एक समारोह में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि अगर केंद्र सरकार ने धार्मिक नेताओं के खिलाफ अपना अभियान बंद नहीं किया रामदेव, अशोक सिंघल, साध्वी ऋतंभरा, और राजनाथ सिंह के अलावा तो वे इस मामले को सड़क पर लेकर जाएँगे। इस मंच पर योगगुरु ढेर सारे धार्मिक संगठनों के नेता मौजूद थे। खराब मौसम की वजह से विमान उडऩे में दिक्कत पैदा हो गयी और आडवाणी नहीं पहुँच सके। साध्वी प्रज्ञा सिंह के मामले का जिक्र करते हुए रामदेव ने कहा कि सत्ता का इस्तेमाल आज उन लोगों द्वारा किया जा रहा है जिन्हें या तो जेल में होना चाहिए था या फाँसी मिल जानी चाहिए थी। सभी वक्ताओं का यही कहना था कि हिंदू आतंक के नाम पर हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा है।

  Categories:
view more articles

About Article Author

Mazdoor Morcha
Mazdoor Morcha

View More Articles