डॉ. रामवीर
राजनीति बाजार है नेता दुकानदार जनता खरीददार है लुटती बारम्बार।
राजनीति है आदमी का ऐसा हथियार जिससे करता आदमी आदमी का शिकार।
राजनीति भी रोग है लक्षण इसके चार भाषण उद्घाटन गबन औ कुर्सी से प्यार।
राजनीति में देखते चार मुख्य औजार चमचे वर्कर भेदिए और सुन्दरी नार।
राजनीति में भद्रता की न रही दरकार अब संसद में शोभते बड़े बड़े बदकार।
राजनीति में जब तलक दुष्टों की जयकार मची रहेगी सब जगह यूं ही मारामार।
राजनीति अब हो गई इक ऐसा व्यापार रंग लगे न फिटकरी पैसा मिले अपार।
राजनीति में आजकल ऐसी बहे बयार उसके गुनाह माफ हैं जिसकी है सरकार।
राजनीति ने क्या दिया ढेरों भ्रष्टाचार सदाचार गायब हुआ नष्ट हुए सुविचार।
राजनीति में झूठ का रहता गर्म बजार नेता शरमाए बिना बोले झूठ हजार।
राजनीति ने देश को दिया यह पुरस्कार भाषा जाति क्षेत्र में बांट दिए नर नार।
राजनीति से देश का सम्भव है उद्धार यदि इसमें पूरी तरह होवे उचित सुधार।
राजनीति को कवि कभी कर न सका स्वीकार इसका होना चाहिए इक नैतिक आधार।