फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) सरकारी गोरक्षक अनिल कौशिक और उसके गुुर्गों द्वारा गोतस्करी के आरोपी में आर्यन की हत्या किए जाने की घटना के बाद पुलिस खुद को पाक साफ साबित करने के लिए गोरक्षकों की सूची बनाने का पाखंड कर रही है। यह सच किसी से छिपा नहीं है कि सरकार द्वारा पाले गए इन गोरक्षक गुंडों को पुलिस न केवल संरक्षण देती है, बल्कि गोरक्षा के नाम पर उनके इशारों पर नाचती है, यहां तक कि हाईवे पर वाहन चालकों से उगाही भी करने में इन कथित गोरक्षकों का साथ देने के आरोप भी पुलिस पर लग चुके हैं।
2014 में केंद्र में मोदी की सरकार बनते ही संघ देशभक्ति, गोरक्षा आदि के नाम पर मुसलमानों को द्रोही साबित करने, उनके सामाजिक आर्थिक बहिष्कार के अपनी छिपे हुए एजेंडे को तेजी से लागू करने में जुट गई। पूरे देश में खास कर भाजपा की डबल इंजन सरकार वाले राज्यों में गोरक्षकों की फौज खड़ी गई। इन गोरक्षकों में अधिकतर अपराधी और असामाजिक तत्व शामिल किए गए।
गोरक्षा के नाम पर किसी को भी मारने-पीटने और उनके पशु लूटने की इन्हें खुली छूट दी गई। इनके अराजक और ग़ैर कानूनी क्रियाकलापों पर पुलिस अंकुश न लगा सके, इसके लिए सरकारी तौर पर गोरक्षा संरक्षण कानून, गो सेवा आयोग और गो रक्षा टास्क फोर्स स्थापित किए गए और डीसी, पुलिस आयुक्त, जैसे आला अधिकारियों को इनमें शामिल कर एक तरह से गोरक्षक गुंडों का ताबेदार बनने मजबूर कर दिया गया। जब विभाग के आला अधिकारी ही गोरक्षक गुंडों के साथ गलबहियां कर रहे हों उनसे सम्मानित हो रहे हों और उन्हें सम्मान दे रहे हों तो फिर किसी पुलिस अधिकारी की क्या हिम्मत कि वह इन सरकारी लाइसेंसधारी गुंडों के खिलाफ चले जाएं। ऐसे सैकड़ों उदाहरण है कि इन कथित गोरक्षकों ने पशु पालकों को रोक कर उन्हें मार मार कर अधमरा करने के बाद पुलिस के हवाले कर दिया, उनके पशु भी लूट कर ले गए, लूटे गए गए पशुओं को वापस कराने के बजाय पुलिस ने सुुपरदारी के नाम पर गोरक्षकों को ही सौंप दिया।
यही नहीं खट्टर के पहले कार्यकाल में तो पुलिस को इन गोतस्करों के साथ रात्रि गश्त करने, गोतस्करी रोकने के लिए उनके साथ अभियान चलाने का भी फरमान सुनाया गया था। गोरक्षकों और पुलिस द्वारा चलाए गए ऐसे ही एक कथित अभियान में पूर्व एनआईटी डीसीपी पूरनचंद पंवार ने दावा किया था कि पशु तस्करों ने उन पर फायर किया जिसमें वह बाल बाल बचे थे, हालांकि यह घटना झूठ निकली थी। इस घटना के बाद गोरक्षक और पुलिस के संयुक्त अभियान तो बंद कर दिए गए थे लेकिन गोरक्षकों की सूचना पर पुलिस तुरंत ही हाजिर होती थी और आज भी हो रही है।
इसका सीधा सा अर्थ ये है कि शहर में कितने गोरक्षक हैं, किस क्षेत्र में कौन सा गोरक्षक गिरोह सक्रिय है, उस गिरोह का सरगना कौन है, ये सारी जानकारी पुलिस को बहुत पहले से हैं, किस गिरोह में कौन सा नया गोरक्षक गुर्गा भर्ती हुआ, कौन दूसरे शहर चला गया ये जानकारियां भी उसके पास अपडेट हैं। यही नहीं इन गोरक्षक गुंडों से पशु तस्करों की मुखबिरी कौन करता है, किस क्षेत्र में, टोल प्लाजा पर कौन मुखबिर है इसकी जानकारी भी पुलिस के पास मौजूद है।
सीएम को सीधे रिपोर्ट करने वाला सीआईडी विभाग तो एक एक पशु तस्कर की पूरी कुुंडली, यानी उसका नाम-पता, वाहन, आर्थिक स्थिति, कितनी और कौन कौन सी आपराधिक घटनाएं अंजाम दीं आदि जानकारियां बाकायदा रिकॉर्ड में रखता है। इसके बावजूद एसीपी क्राइम अमन यादव का यह बयान हास्यास्पद लगता है कि वह जिले में सक्रिय गोरक्षकों की सूची तैयार कर रहे हैं और उनकी गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं। गोतस्करों को जिले में कोई भी अभियान चलाने की अनुमति नहीं है।
यह बात अमन यादव को आर्यन मिश्रा की हत्या के बाद समझ में आई। आर्यन को तीस किलोमीटर तक पीछा करने के बाद गोली मारने की घटना ही बताती है कि कथित गोरक्षक गुंडे रोजाना रात को पशु तस्करों की खोज के अभियान पर निकलते थे और आगे भी निकलते रहेंगे। देखना यह है कि अमन यादव इन गोरक्षक गुंडों के ये गैर कानूनी अभियान रोक पाएंगे या फिर संघी-भाजपाई सरकार के आगे वो भी घुटने टेकने को मजबूर हो जाएंगे।