शमी उद्दीन अंसारी सन् 1017 का एक साफ़ चमकीला दिन था, उस दिन हवा रुकी हुई थी और नन्दन क़िले से दूर, बहुत दूर क्षितिज साफ़ नजऱ आ रहा था। अल-बरूनी किले की अपनी वेधशाला से उस प्रयोग को करने के लिए बाहर आए जिससे पृथ्वी के आकार का पता चलने वाला था। आगे बढऩे से पहले हम आपको नंदन किले के बारे में बताते चलें जो आज के पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में है। वहाँ अब उसके भग्नावशेष ही बचे हैं। क़िले के परिसर में एक शिव मंदिर है जिसे राजा जयपाल के बेटे राजा आनंदपाल ने बनवाया था। पास ही एक मस्जिद है जिसका निर्माण महमूद गज़नबी ने करवाया। नन्दन किले का नाम देवताओं के राजा इन्द्र के बाग नन्दन के नाम पर पड़ा था। आठवीं शताब्दी में हिन्दू राजशाही वंश द्वारा बनवाए गए इस किले की स्थिति सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थी। ये सिल्क मार्ग पर एक पहाड़ी की चोटी पर था, जिससे नन्दन दर्रे पर निगरानी रखी जा सके और आक्रमणकारियों को रोका जा सके। ये वही नन्दन दर्रा था जिससे होकर सिकन्दर भारत आया था और 326 ई.पू. में राजा पोरस से उसका युद्ध हुआ था। 1013 में महमूद गजनबी ने आनंदपाल के बेटे त्रिलोचनपाल को पराजित कर इस किले पर कब्ज़ा कर लिया। वो अपने साथ विद्वान अल-बरूनी को भी ले आया था। महमूद तो अफग़़ानिस्तान चला गया, पर अल-बरूनी वहीं रह गए। उन्हें उस इलाके के इतिहास, विज्ञान और संस्कृति का अध्ययन करना था।
हम वापस उस ऐतिहासिक दिन पर लौटते हैं। किले के लोग इस प्रयोग को उत्सुकता से देख रहे थे। अल-बरूनी ने अपने कोण नापने के विशाल यंत्र को स्थिर किया और दूर क्षितिज को देखने के अवनमन कोण को नापा और उसे अपनी पुस्तिका में नोट किया। वहाँ मौजूद लोगों को नहीं पता था देखने और समझने की मनुष्य की क्षमता उस दिन कितना बड़ा पुरस्कार पाने जा रही थी। पृथ्वी की त्रिज्या नापने का ये विचार अल-बरूनी को तब कौंधा था जब क़िले से नीचे विशाल भूमि के उस पार दूर क्षितिज को उन्होने देखा था। अपने प्रयोग की सफलता से प्रसन्न अल-बरूनी वापस अपनी वेधशाला में गए। अब उन्हें बीजगणित और त्रिकोणमिति की सहायता से पृथ्वी की त्रिज्या और फिर उसकी परिधि पता करनी थी। इस तरह कुछ देर में उन्हें पृथ्वी का आकार पता चलने वाला था। इस प्रयोग के पहले चरण में वो त्रिकोणमिति की सहायता से किले की पृथ्वी तल से ऊंचाई नाप चुके थे। इसके लिए उन्होंने ज़मीन पर दो अलग-अलग स्थानों से किले का उन्नयन कोण नापा था और एक आसान से सूत्र की सहायता से ऊंचाई पता कर ली थी।
हालांकि उनसे लगभग 1250 साल पहले श्वह्म्ड्डह्लशह्यह्लद्धद्गठ्ठद्गह्य ने पृथ्वी की त्रिज्या और परिधि की गणना की थी। लेकिन अल-बरूनी पृथ्वी के सही आकार के बहुत निकट पहुंचे। उन्होने ह्यद्बठ्ठद्ग के नियमों का पहली बार पृथ्वी की त्रिज्या नापने के लिए इस्तेमाल किया। उनसे पहले किसी ने इस तरह से पृथ्वी के आकार को नहीं नापा था। अल-बरूनी ने बिलकुल मौलिक ढंग से पृथ्वी की त्रिज्या को नापकर दिखाया।
उन्होने पृथ्वी की त्रिज्या 6,339.9 किमी नापी, जो इसके वर्तमान मान 6,356.7 किमी से बस 16.8 किमी कम थी। पश्चिम ने ये काम 6 सदी बाद किया। हम ये भी बता दें कि पृथ्वी का आकार नापने की ज़रूरत मुसलमान शासकों को तब पड़ी जब अब्बासी खिलाफ़त (750-1517 ई.) के ज़माने में, जिसे इस्लाम का स्वर्ण युग कहा जाता है, उनका साम्राज्य यूरोप में स्पेन से लेकर एशिया में सिंधु नदी तक फ़ैल गया। उन्हें नमाज़ पढऩे के लिए काबे की दिशा का पता लगाना होता था और ये तभी संभव था जब पृथ्वी की वक्रता और आकार का पता हो। अब्बासी खलीफ़ा अल-मामून (786-833 ई.) ने राज्य के कुछ प्रसिद्ध विद्वानों को ये काम सौंपा। उन्होंने ज़मीन पर वो दूरी नापी जिस पर दोपहर में सूरज का कोण 1 अंश बदल जाता है, और उसे 360 से गुणा कर दिया और पृथ्वी की परिधि का पता लगाया। इसका मान वास्तविक परिधि से 4त्न थोड़ा ही कम था। इस तरीके के साथ दिक्कत यह थी कि रेगिस्तान की झुलसा देने वाली गर्मी में दो सीधे स्थानों के बीच दूर नापना मुश्किल काम था। अल-बरूनी ने 146 किताबें लिखीं। मैंने इतनी किताबें पढ़ी भी नहीं होंगी। उन्होने ज्ञान की सभी शाखाओं का अध्ययन किया। उन्हें “भारतीय उपमहाद्वीप के अध्ययन का संस्थापक” (फ़ाउंडर ऑफ इंडोलोजी) कहा जाता है। उन्हें “तुलनात्मक धार्मिक अध्ययन का पिता” (फादर ऑफ कम्पैरटिव रेलिजन) कहा जाता है। वो पहले अंथ्रोपोलोजिस्ट थे। उन्हें “आधुनिक भूगणित का पिता” (फादर ऑफ मॉडर्न जिओडेसी) भी कहा जाता है। वो भौतिकी, गणित, नक्षत्र विज्ञान और प्राकृतिक विज्ञानों के विद्वान थे। वो इतिहासकर, भाषाविज्ञानी और कालक्रमविज्ञानी भी थे। उन्हें अपनी मातृभाषा ख्वारिजमी समेत फ़ारसी, अरबी, संस्कृत, ग्रीक, हेब्रू और सीरि
यक भाषाओं का ज्ञान था। भारत आकर उन्होने संस्कृत का अध्ययन किया और कई संस्कृत ग्रन्थों का अरबी में अनुवाद किया। उनकी “तारीख़-अलहिंद” (हिन्द का इतिहास) एक प्रसिद्ध पुस्तक है। “अल-बरूनी का भारत” नाम से इस पुस्तक के हिन्दी अनुवाद में ये जानकारी है कि अल-बरूनी पहले मुसलमान थे जिन्होंने भगवतगीता का परिचय मुस्लिम जगत से कराया। उन्होने ही सबसे पहले पुराणों का अध्ययन किया। इस किताब का लिंक कमेंट बॉक्स में दिया गया है। आज हम दूसरी चीजों को महत्व देकर मूल उद्देश्य को भूले हुये हैं जो है- अथाह जिज्ञासा, सतत अन्वेषण और न्याय के लिए अनवरत प्रयत्न।