फरीदाबाद (मजदूर मोर्चा) बढ़ते प्रदूषण को नियंत्रित न कर पाने के इनाम के तौर पर केंद्र सरकार ने नगर निगम को 32 करोड़ रूपये का अनुदान दिया है। इस राशि से एंटी-स्मॉग गन, छोटी स्वीपिंग मशीने खरीदने के अलाबा सडको पर पानी छिड़काव व हरियाली बढ़ाने का काम किया जाएगा इसी तरह के अनुदान के रूप में बीते वर्ष भी 20 करोड़ रुपये नगर निगम को मिले थे. उस वक्त भी इसी तरह के साजो समान खरीदे गए थे. उस वक्त भी ऐसी कवायद का प्रदूषण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ पाया था अंत में प्रदूषण बढऩे का कारण पराली जलाने को बताकर पल्ला झाड लिया गया था जिन छोटी स्वीपिंग मशीनों का जिक्र किया जा रहा है, उनसे बड़ी मशीनें बीते चार पांच साल से नगर निगम की शोभा बढ़ा रही हैं, ये मशीने झाड़ू लगाने के विकल्प के तोर पर इस्तेमाल होती हैं, क्योंकि झाड़ू लगाने से धूल उड़ती है। जबकि ये मशीने सक्शन प्रक्रिया के द्वारा धूल आदि को भीतर खींच लेती हैं ये मशीनें तभी कामयाब हो सकती हैं जब सड़कों पर गड्ढे न हो और किनारे मिट्टी रहित हों ये दोनों ही परिस्थितियाँ शहर से नदारद हैं।
प्रदूषण का असल कारण जिसे प्रशासन लगातार नजऱअंदाज़ करता आ रहा है, व कूड़ा खासकर औद्योगिक कचरा जिसमे रबर व प्लास्टिक आदि शामिल होता है, को जलाने से होता है। इसकी बदौलत हर सुबह नियमित रूप से शहर भर में धुएं की चादर देखी जा सकती है। मजदूर मोर्चा कई बार लिख चुका है कि सेक्टर 8 से लेकर सेक्टर 29 तक सड़क के किनारे ग्रीन बेल्ट में रात के आखिरी पहर में औद्योगिक कचरा जलाने का काम होता है। इसी तरह का काम सरुरपुर के अवैध औद्योगिक क्षेत्र तथा शहर के विभिन भागो में छोटे कबाडियों द्वारा किया जाता है। दरअसल ये कबाड़ी औद्योगिक कचरे में से विभिन्न प्रकार की धातुएं निकाल कर बड़े कबाडियों को बेचते है। दिन में पकड़े जाने के भय से यह काम रात के अँधेरे में ही किया जाता है जब प्रशासन सो रहा होता है। बिजली की अपर्याप्त सप्लाई के चलते जनरेटर चलाना लोगो की मज़बूरी बन जाता है। कहने की ज़रूरत नहीं कि घरेलू व औद्योगिक डीजल जनरेटर प्रदूषण बढ़ाने का एक बड़ा स्रोत होते हैं। इसे रोकने के लिए प्रशासन बेशक जनरेटर चलाने पर पाबंदी तो लगाता है, लेकिन जिसका बड़ा नुक्सान हो रहा होता है तो वह संबंधित सरकारी कर्मचारियों को रिश्वत देकर जनरेटर चलाता ही है।
सड़कों के गड्ढों से जहां धूल तो उडती ही है वहीँ यातायात की रफ़्तार भी धीमी होकर जाम की स्थिति बनाते हैं जिससे प्रदूषण का बढऩा स्वाभाविक है। जाम के दौरान वाहन सड़क के किनारे कच्चे में चलने को मजबूर होते हैं तो धूल के गुब्बार प्रदूषण को बढ़ाते है भवन निर्माण कार्यों के दौरान अक्सर देखा जाता है वे किसी भी नियम का पालन नहीं करते हैं, रेती व स्टोन डस्ट के ढेर खुले में बिना ढके पड़े रहते है और तो और उन पर पानी तक छिडकने की जरूरत भवन निर्माता नहीं समझते हैं। इसके बदले संबंधित सरकारी कर्मचारी को चुग्गा-पानी देकर चलता कर दिया जाता है। औद्योगिक इंधन के तौर पर गैस का इस्तेमाल, कोयले से महंगा होने के कारण कारखानेदार नहीं कर पाते। गैस और बिजली के महंगे होने का असल कारण पूंजीवादी व्यवस्था की लूट है इसी लूट के कारण महंगी हुई घरेलू गैस की अपेक्षा गरीब बस्तियों के लोग लकड़ी व उपलों आदि से चूल्हा जलाकर खाना बनाते हैं. इसके परिणामस्वरूप इन बस्तियों के उपर सुबह व शाम को घना धुँआ छाया रहता है।
रही बात सडकों पर छिडकाव करने की तो इसका अनुभव बीते वर्ष भी किया गया था। जब नीयत ही खराब हो और निशाना काली कमाई पर हो तो दो टेंकर चलाकर दस का बिल बनाया जाता है ऐसा ही अनुभव आज भी किया जा सकता है। कहने को बेशक टेंकर छिडकाव को लगे हुए हैं लेकिन वह कहीं नजर नहीं आ रहेख् जाहिर है फाइलों में ही चल रहे होंगे।