डॉ. रामवीर आज एक पुराने मित्र का फोन आया – क्या करते रहते हो? ‘झाडू लगाता हूं’ मैंने कहा। ‘झाडू लगाते हो ! कमाल है कोई मेड/हैल्पर नहीं रख सकते?’ मित्र ने विस्मय व्यक्त करते हुए टोका। ‘झाडू घर आंगन में नहीं सोशल मीडिया में लगाता हूं। आजकल व्हाट्सैप जैसे प्लेटफॉम्र्स पर इतना कूडा फेंका जाता है कि गंदगी देखी नहीं जाती। फेक न्यूज के कूड़े को कोई मेड नहीं बुहार सकती। इसके लिए तो कोई सेवानिवृत्त प्रोफेसर/प्रिंसिपल रखना पडेगा’ मैंने अपनी स्थिति स्पष्ट की। ‘क्या बात कर रहे हो भाई साहब! आधी फेक न्यूज तो आजकल पढे लिखे लोग ही फोर्वार्ड करते हैं।’ मित्र ने अपना अनुभव बताया। मैंने मित्र से सहमति जताते हुए कहा कि यह असली विडम्बना है कि जिन्हें मार्गदर्शक होना चाहिए था वे स्वयं मार्गभ्रष्ट हो गए हैं। छात्रावस्था में पढी कुछ पंक्तियां स्वभाव बन जाती हैं। ऐसा ही एक शेर है – ‘माना कि इस ज़मीं को न गुलज़ार कर सके, कुछ ख़ार कम तो कर गए गुजऱे जिधर से हम।’ इसी स्पिरिट में फेक न्यूज देख कर उसे अग्रसारित करने वाले को आगाह करना कर्तव्य समझता हूं। कुछ सज्जन भ्रान्तिवश फेक को रीअल समझ कर अग्रसारित कर देते हैं, बताने पर समझ जाते हैं और कुछ रेअरेस्ट ऑव रेअर फैक्ट चैकिंग के लिए धन्यवाद भी देते हैं लेकिन असली फेक न्यूज डीलर वे होते हैं जो जानते हुए भी इस कुटेव के आदी होते हैं। मूलत: आर्यसमाजी पर अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ/भाजपा के दुष्प्रचार से प्रभावित ऐसे विद्वान् भी हैं जो संस्कृत के प्राचीन ग्रन्थों में प्रक्षिप्त (interpolated) श्लोकों की छान फटक तो कर लेते हैं पर टीवी और सोशल मीडिया पर बजबजाती बकवास में उन्हें बांस नहीं आती ! ‘गांधी फिल्म आने से पहले गांधी को कोई नहीं जानता था’ टीवी पर प्रधानमंत्री मोदी यह कह रहे हैं और भक्त इसे ही सच मान रहे हैं। ग्वालियर में विश्वविद्यालय में बोलते हुए राज्यपाल मनोज सिन्हा ने अपने भाषण में बताया कि महात्मा गांधी के पास कानून की डिग्री नहीं थी वे केवल दसवीं पास थे !
श्रोताओं में विश्वविद्यालय के प्रोफेसर्स हैं और सब चुप सुन रहे हैं ! एक पत्रकार ने बाद में मनोज सिन्हा से गलतबयानी के लिए क्षमा मांगने को कहा पर राज्यपाली ढिठाई के आगे पत्रकार क्या चीज है। आखिर में पत्रकार ने न्यायालय में रिट दायर की । लाखों पैंडिंग मुकदमों के बोझ से दबे न्यायालयों का यह भी काम बढ गया – प्रधानमंत्री की डिग्री और राज्यपालों के बयानों पर भी कोट्र्स का समय जाया हो! आर्यसमाज के दस नियमों में पांच बार सत्य शब्द आता है। विशेषत: चौथा नियम ‘सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोडऩे में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए’ तो इस सुधारवादी आन्दोलन की आत्मा रही है, पर जैसा किसी ने कहा है कि पहले आदमी मर जाता था और आत्मा भटकती थी और आजकल आत्मा मर जाती है आदमी भटकता है। आर्यसमाज में सहस्रों सत्यदेवों, सत्यव्रतों, सत्यपालों, सत्यकामों, सत्यानन्दों, सत्यचन्द्रों, सत्यजितों के होते हुए भी असत्य की भरमार क्यों हैं? अनुमान है कि संघी संगति और पोलिटिकली करैक्ट होने का लालच ही इसके पीछे है। मध्य युग में राजपूत राजाओं की मुगलों से जुगलबंदी भी तो पोलिटिकली करैक्ट होने के सिवा और क्या था? आज की परिस्थितियों में उक्त चौथे नियम का भावानुवाद होगा-स्वतन्त्र साहसी पत्रकारों को सुनने और सरकारी खरीदे हुए गोदी मीडिया को न सुनने के लिए सर्वदा उद्यत रहना चाहिए। वैसे डोनाल्ड ट्रम्प और नरेन्द्र मोदी में कुछ तो कॉमन है, ट्रम्प का नारा है ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ और मोदी जी का है ‘फेक न्यूज अगेन एंड अगेन’।