पत्रकारिता का अंधा युग-3

पत्रकारिता का अंधा युग-3
February 11 14:12 2026

आनन्द स्वरूप वर्मा
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म मंदिर-बाबरी मस्जिद प्रकरण जैसे-जैसे उग्र रूप लेता गया, हिंदी पत्रकारिता का सवर्णपक्षी सांप्रदायिक चरित्र उजागर होता गया। दरअसल 1977 में जनता पार्टी की सरकार में जब लाल कृष्ण आडवाणी सूचना और प्रसारण मंत्री थे, उस समय उन्होंने भारी संख्या में अखबारों, समाचार एजेंसियों तथा विभिन्न मीडिया संगठनों में बड़े सुनियोजित ढंग से आरएसएस के कार्यकर्ताओं की नियुक्ति करायी। उस समय प्रशिक्षु अथवा उप संपादक के पद पर भी नियुक्त व्यक्ति इन तेरह वर्षों में खबरों को नियंत्रित करने की स्थिति में पहुँच गया था और इसका असर 1989 में अयोध्या में विवादित भूमि पर राम मंदिर के शिलान्यास, 1990 में कारसेवा आंदोलन और 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस की रिपोर्टिंग में साफ तौर पर देखने को मिला। कारसेवा के समय ही हिंदी के लगभग सभी अखबार ‘राममय’ हो गये थे।

वरिष्ठ पत्रकार शीतला सिंह के संपादन में फैजाबाद से निकलने वाला दैनिक ‘जनमोर्चा’ एकमात्र ऐसा अखबार था जो सही खबरें दे रहा था पर उसका स्वर नक्कारखाने में तूती की आवाज बन कर रह गया था। आडवाणी की रथयात्रा और कारसेवा की रिपोर्टिंग पर अब तक ढेर सारे शोध पत्र आ चुके हैं कि किस तरह अखबारों ने सांप्रदायिक माहौल तैयार किया इसलिए इस पर बहुत लिखने की जरूरत नहीं लगती; तो भी ‘जनमोर्चा’ के ही पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह की रिपोर्ट का उल्लेख जरूरी लगता है जिसमें उन्होंने बताया था कि माहौल बिगाडऩे में अखबारों ने कितनी घृणित भूमिका निभायी। उन्होंने ‘दैनिक जागरण’ के बारे में लिखा- “लखनऊ से प्रकाशित एक दैनिक ने तो, जो अब खुद को विश्व का सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला अखबार बताता है, गजब ही कर दिया। दो नवंबर को अपराह्न उसने अपने पाठकों के लिए जो स्पेशल सप्लिमेंट छापा उसमें मृत कारसेवकों की संख्या कई गुना कर दी और लाउडस्पीकर से सजे वाहनों में लाद कर चिल्ला-चिल्ला कर बेचा मगर सुबह उसका जो संस्करण अयोध्या फैजाबाद आया, उसमें मृतक संख्या घट कर 32 रह गयी जो अभी भी वास्तविक संख्या से दोगुनी थी… गोरखपुर से छप रहे एक मसाला व्यावसायिक के दैनिक ने भी कुछ कम गजब नहीं ढाया। उसके उप संपादकों ने पहले पेज की फिल्म बनवायी थी।

मुख्य हेडिंग में 150 कारसेवकों के मारे जाने की खबर थी। संपादक जी ने उसमें एक और शून्य बढ़ा कर 1500 करवा दिया ताकि उनका अखबार सबसे मसालेदार दिखे।” अपने इसी लेख में कृष्ण प्रताप सिंह ने बताया है कि कैसे कड़ी चौकसी की वजह से जब विहिप के अध्यक्ष अशोक सिंघल का अयोध्या पहुँचना एक तरह से असंभव हो गया तो लखनऊ से प्रकाशित दैनिक ‘स्वतंत्र भारतÓ के संपादक राजनाथ सिंह उन्हें प्रेस लिखी कार में छुपा कर ले आए।

‘उन दिनों पत्रकारों में कारसेवक पत्रकारों’ की एक नयी शैली विकसित हो गयी थी जो कारसेवक पहले थी और पत्रकार बाद में। प्रभाष जोशी तो अपने लखनऊ संवाददाता के लिए जनसत्ता के ही अपने कालम में कारसेवक पत्रकार’ शब्द इस्तेमाल करते थे ।” कृष्ण प्रताप सिंह का मानना है कि राममंदिर आंदोलन विहिप और भाजपा से ज्यादा हिंदी मीडिया ने ही चलाया। बाबरी मस्जिद के गिराये जाने के बाद प्रभाष जोशी ने लगातार भाजपा और संघ के कट्टर हिंदुत्ववाद का विरोध किया और अंत तक भाजपा की नीतियों पर तीखा प्रहार करते रहे। क्या उनके हिंदुत्ववादी विचार पूरी तरह बदल गये थे? कहीं संघ और भाजपा के प्रति उनके मन में गुस्सा इसलिए तो नहीं था कि 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद गिराये जाने की योजना की भनक संघियों द्वारा उनको भी नहीं लगने दी गयी जबकि वे खुद को उनके सबसे करीबियों में से मानते थे? ऐसा कहने के पीछे वजह यह है कि उन्होंने बाद के दिनों में भी अपनी ब्राह्मणवादी सोच को बगैर किसी लाग-लपेट के व्यक्त किया। वर्ष 2009 में पत्रकार आलोक पुतुल से बातचीत में बताया कि दक्षिण भारत में आरक्षण लगने की वजह से पढ़े-लिखे ब्राह्मण अमेरिका जा कर बस गये।

उन्होंने कहा…सिलिकॉन वैली अमेरिका में नहीं होता, अगर दक्षिण भारत में आरक्षण नहीं लगा होता। दक्षिण के आरक्षण के कारण जितने भी ब्राह्मण लोग थे, ऊंची जातियों के, वो अमेरिका गये और आज सिलिकॉन वैली की हर आईटी कंपनी का या तो प्रेसिडेंट इंडियन है या चेयरमैन इंडियन है या वाइस चेयरमैन इंडियन है या सेक्रेटरी इंडियन है। क्यों? क्योंकि ब्राह्मण अपनी ट्रेनिंग से अव्यक्त चीजों को हैंडल करना बेहतर जानता है। क्योंकि वह ब्रह्म से संवाद कर रहा है। तो जो वायवीय चीजें होती हैं, जो स्थूल, सामने शारीरिक रूप में नहीं खड़ी हैं, जो अमूर्तन में काम करते हैं, जो आकाश में काम करते हैं, यानी चीजों को इमेजीन करके काम करते हैं। सामने जो उपस्थित है, वो नहीं करते। ब्राह्मणों की बचपन से ट्रेनिंग वही है, इसलिए वो अव्यक्त चीजों को, अभीतिक चीजों को, अयथार्थ चीजों को यथार्थ करने की कुव्वत रखते हैं, कौशल रखते हैं। इसलिए आईटी वहाँ इतना सफल, हुआ। आईटी में वो इतने सफल हुए… अपने समाज में अलग-अलग कौशल के अलग-अलग लोग हैं। अपन ने ये माना कि राजकाज में राजपूत अच्छा राज चलाते है। क्यों माना हमने? एक तो वो परंपरा से राज चलाते आ रहे हैं, दूसरा चीजों के लिए समझौते करना, सब को खुश रखना, इसकी जो समझदारी है, कौशल जो होता है, वो आपको राज चलाते चलाते आता है… मान लीजिए कि सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली खेल रहे है। अगर सचिन आउट हो जाए तो कोई यह नहीं मानेगा कि कांबली मैच को ले जाएगा। क्योकि कांबली का खेल, कांवली का चरित्र, कांबली का एटीट्यूड चीजों को बना कर रखने और लेकर जाने का नहीं है। वो कुछ करके दिखा देने का है। जिताने के लिए आप को ऐसा आदमी चाहिए, जो लंगर डाल कर खड़ा हो जाए और आखिर तक उसको ले जा सके यानी धारण शक्ति वाला। अब धारण शक्ति उन लोगों में होती है, जो शुरू से धारण करने की प्रवृत्ति के कारण आगे बढ़ते हैं।
अब आप देखो अपने समाज में, अपनी राजनीति में। अपने यहाँ सबसे अच्छे राजनेता कौन हैं? आप देखोगे जवाहरलाल नेहरू ब्राह्मण, इंदिरा गाँधी ब्राह्मण, अटल बिहारी वाजपेयी ब्राह्मण, नरसिंह राव ब्राह्मण, राजीव गाँधी ब्राह्मण क्यों? क्योंकि सब चीजों को सँभाल कर चलाना है इसलिए ये समझौता, वो समझौता वो सब कर सकते हैं… ये मैं जातिवादिता के नाते नहीं कह रहा हूँ। एक समाज में स्किल का लेवल होता है, कौशल का एक लेवल होता है, जो वो काम करते-करते प्राप्त करता है। उस कौशल का आप अपने क्षेत्र में कैसा इस्तेमाल करते हैं, उस पर निर्भर करता है… क्रिकेट में भी आप देखेंगे, सभी क्रिकेटरों का एनालिसिस करके देखेंगे तो आप पाएँगे कि सबसे ज्यादा सस्टेन करने वाले सबसे ज्यादा टिके रहने वाले कौन खिलाड़ी हैं? सुनील गावस्कर सारस्वत ब्राह्मण, सचिन तेंदुलकर सारस्वत ब्राह्मण।

‘जनसत्ता’ में हर महीने आठ-दस लेख इस तरह के आते रहे जिनमें अंधविश्वासों, धर्म के नाम पर चल रही मूर्खताओं और निहायत अवैज्ञानिक सोच पर टिकी मान्यताओं को प्रचार दिया जाता था। इसी अखबार में नंबर दो की हैसियत रखने वाले पत्रकार बनवारी वर्ण व्यवस्था के घोर समर्थक थे और अपने लेखों में जाहिर कर चुके थे कि इस भू-खंड में रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू है। उनकी सोच थी कि हिंदू कहे जाने पर सबको गर्व का एहसास होना चाहिए। इन उद्धरणों को देने का मकसद यह बताना है कि आज हम जिन कट्टरपंथी और हिंदुत्ववादी प्रवृत्तियों को मीडिया में एक घातक रूप लेते हुए देख रहे हैं उनके बीज 1980 के दशक में ही पड़ चुके थे लेकिन उन बीजों के विकसित होने के लिए जिस आबोहवा की जरूरत थी उसका अभाव था। नरेंद्र मोदी की मौजूदा सरकार ने वह आबोहवा मुहैया करा दी और वे बीज जो अंकुरित होने के लिए बेचैन थे अचानक प्रस्फुटित हो गये।

पिछले दो दशकों के दौरान मीडिया संस्थानों में संपादक के पद का लगभग लोप हो गया। अखबारों के मालिकों ने ही संपादक का पद सँभाल लिया। इस प्रवृत्ति की शुरुआत दिल्ली के बाहर से निकलने वाले क्षेत्रीय अखबारों से हुई जो बढ़ती ही चली गयी। वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र माथुर ने काफी पहले अपने एक लेख में इस पर चिंता जाहिर करते हुए कहा था कि “पहली पीढ़ी में तो पत्रकारिता को थोड़ा बहुत समझने वाला उद्यमी व्यक्ति किंचित मिशनरी भाव से अखबार निकालता है, लेकिन जब उसकी दूसरी पीढ़ी के भाई-भतीजे राज्यभर में पत्रकारिता का मुकुट पहन कर मटकना चाहते हैं, तब हुनरमंद पत्रकारों के सामने यह सवाल खड़ा होता है कि उनके वश और मान का रास्ता आनुवंशिक बाधाएँ कब तक रोकती रहेंगी?”

अब ऐसे में मालिक को अखबार की उत्कृष्टता की चिंता नहीं होती। फिर क्या जरूरत है अच्छे पैसे देकर किसी योग्य पत्रकार को संपादक बनाने की? लेखक पत्रकार पंकज बिष्ट का भी यही मानना है कि मालिकों की प्रतिबद्धता बस पत्रकारिता को एक अलंकरण के रूप में इस्तेमाल करने के प्रति होती है-“जब तक अखबार पैसा कमा रहा है, मालिक अखबार में किसी भी तरह के सुधार के लिए चिंतातुर नजर नहीं आता।

अखबार अगर आर्थिक रूप से सफल नहीं है तो मालिक उसका अन्य तरह के हित साधने के लिए इस्तेमाल कर अपनी आर्थिक क्षति को पूरा करने में लगे रहते हैं। पर एक संपादक के लिए आर्थिक और राजनीतिक समझौते करना इतना आसान नहीं है। उसके लिए तात्कालिक आर्थिक हित ही नहीं, अखबार और समाज को लेकर दूरगामी चिंताएँ ज्यादा महत्त्वपूर्ण होती हैं। मालिक संपादक बन जाते हैं भले ही उनके पास न तो पत्रकारिता का कोई अनुभव होता है और न लेखन का और ऐसी स्थिति को वरिष्ठ कथाकार और पत्रकार कमलेश्वर ने एक ‘बेहूदी स्थिति’ कहा था। उनका मानना था कि पत्रकारिता और संपादकत्व ‘फुल टाइम जॉब’ है। यह नहीं कि आप किसी फर्टिलाइजर कंपनी के भी मालिक हैं, सीमेंट कंपनी के भी मालिक हैं और दूसरी ओर अखबार के संपादक भी हैं।”

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Mazdoor Morcha
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