डॉ. रामवीर
पता नहीं यह नेताओं की कैसी है मजबूरी, दुष्टों से इनकी है निकटता भद्र जनों से दूरी।
जब जब आता है चुनाव तब तब राम रहीम, छूट जाता है पैरोल पर सोचो क्या है स्कीम।
कार्ल माक्र्स ने जिसे बताया आम जनों की अफीम, उस अफीम का थोक सप्लायर गुरमीत राम रहीम।
हाई कोर्ट कहता है पैरोल दी है नियमानुसार, चुनाव आयोग के भी पाओगे कुछ ऐसे ही विचार।।
इस ढोंगी ने बहुत जनों के मन में दिया बिठा, जनक तुम्हारा कोई भी हो मैं ही तुम्हारा पिता।
बन के पिताजी यह करता है भक्तों से मनमर्जी, भोले भगत समझ नहीं पाते इसकी छिपी खुदगर्जी।
नेता और जनता के बीच में बाबा बने दलाल, कवि चिन्तित है आखिर कैसा है यह अमृतकाल।
किसी को रक्खा पे-रोल पर किसी को दी पैरोल, छद्म देशभक्ति का बजाते जोर जोर से ढोल।