मनीष आजाद 1770 का दशक है। बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा है। गाँव खाली पड़े हैं, लाशें बिछी हैं। अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी और उनके साथ खड़े बंगाल के मुस्लिम नवाब-जमींदार मिलकर जनता का खून चूस रहे हैं। इसी बीच जमींदार महेन्द्र अपनी पत्नी कल्याणी और छोटी बेटी के साथ जंगल के रास्ते निकला है।अचानक डाकू टूट पड़ते हैं। लूटपाट होती है। बचने की भाग-दौड़ में पति-पत्नी बिछड़ जाते हैं।
इसी जंगल में छिपा है “संतान” नाम का संगठन। ये हथियारबंद वैष्णव संन्यासी दल है। इनका एकमात्र लक्ष्य- हरि बोलो, यवन संहार करो, मातृभूमि को मुक्त करो। इनका युद्धघोष- “वन्दे मातरम् ! मठ का नाम है आनंदमठ। माँ भवानी की मूर्ति के सामने भारत-माता का नक्शा रखा है। सभी संन्यासी योद्धा उसे माँ कहकर पूजते हैं। इसी की पूजा होती है। सब गा रहे हैं मातृभूमि-तुझे नमस्कार मातृभूमि-तुझे नमस्कार जो जल से समृद्ध है, फलों-फसलों से भरपूर है, मलय पर्वत की ठंडी हवा से शीतल है, जो हरी-भरी फसलों से काली-हरी दिखती है जिसकी रातें शुभ्र चाँदनी से पुलकित होती हैं, जिनके वृक्षों की डालियाँ खिले फूलों से सुशोभित हैं, जो हँसती-बोलती है, जिसकी भाषा बहुत मधुर है, जो सुख देने वाली और वरदान देने वाली है ऐसी मातृभूमि-तुझे नमस्कार मातृभूमि-तुझे नमस्कार करोड़ों-करोड़ों गलों से निकला कल-कल ध्वनि करने वाला करोड़ों-करोड़ों हाथों में नंगे खड्ग लिए हुए हे माँ! तू अबला होकर भी इतनी बलशाली कैसे? असीम बल धारण करने वाली, संसार से तारने वाली, शत्रु-सेना को रोकने वाली ऐसी मातृभूमि-तुझे नमस्कार मातृभूमि-तुझे नमस्कार तू ही विद्या, तू ही धर्म, तू ही हृदय, तू ही मर्म तू ही इस शरीर में प्राण, माँ! तू मेरे बाजुओं की शक्ति है, मेरे हृदय की भक्ति है, तेरी मूर्ति हर मन्दिर में गढ़ी है तू माता है, तू पिता, तू बन्धु और सखा है। तू विद्या है, तू ही धन है, हे देवों के देव! तू ही मेरे लिए सब कुछ है। मातृभूमि-तुझे नमस्कार मातृभूमि-तुझे नमस्कार
महेन्द्र इसी आनंदमठ पहुँचता है। यहाँ संगठन प्रमुख सत्यानंद समझाते हैं- यवन इस देश को 700 साल से लूट रहे हैं। ये विदेशी हैं, इनका मजहब यही है कि काफिरों को मारो, औरतें उठाओ, मंदिर तोड़ो। इनसे दया नहीं, इनका पूर्ण संहार ही हमारा धर्म है। महेन्द्र डरता है, पर जब उसकी पत्नी-बेटी भी मठ में मिल जाती है तो वह भी संगठन से जुड़ जाता है। पत्नी तो आत्महत्या करने की कोशिश करती है ताकि पति की देश-सेवा में बाधा न बने बहरहाल संगठन नवाबी-मुस्लिम फौजों पर हमला करता है। अंग्रेजों के लिए जा रहा खजाना लूटता है। मारकाट के दृश्य को एक पात्र दूसरे को बताता है- “संतान तलवारें लिए दौड़े और यवन सिपाहियों, उनकी औरतों-बच्चों तक को काट डाला।” अंग्रेज और उनके यवन.. अर्थात मुस्लिम सहयोगी भाग खड़े होते हैं। संतान जीत जाते हैं,
यह आनंदमठ है। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था। बंकिम बाबू कलकत्ता में बनी भारत की पहली यूनिवर्सिटी के 1856 बैच के ग्रेजुएट थे। पहली बैच के पहले 3 ग्रेजुएट में से एक, और 1858 में ही सरकारी नौकरी लग गई। वे 1892 तक अंग्रेजी सेवा में रहे। ब्रिटिश सरकार में डिप्टी मजिस्ट्रेट थे – यानी आज का डिप्टी कलेक्टर या स्ष्ठरू भारतीयों को उपलब्ध यह उस ज़माने में सबसे ऊँचा प्रशासनिक पद था। पर अपनी साहित्यिक अभिरुचि की वजह से, 1882 में उन्होंने यह उपन्यास लिख तो दिया, मगर ब्रिटिश सरकार का भयंकर दबाव झेलना पड़ा। दूसरे संस्करण में उन्होंने भूल सुधार किया। तो जहाँ पहला संस्करण मुस्लिम और ब्रिटिश शासकों दोनों के प्रति एक-समान क्रोध दिखाता था। लेकिन दूसरे संस्करण में अचानक एक दिव्य पुरुष प्रकट हो जाता है।
नये संस्करण में जब संतान जीत जाते हैं, और अंग्रेज और उनके यवन, अर्थात मुस्लिम साथी भाग खड़े होते हैं। ठीक उसी रात एक चमकते वस्त्र वाला रहस्यमय “दिव्य पुरुष”, बाबा सत्यानंद के सामने प्रकट होता है। कहता है-“तुमने यवनों (मुसलमानों) को तो भगा दिया, किंतु अंग्रेजों का विरोध मत करो। क्योंकि हिन्दू समाज अभी अज्ञानी, कमजोर और फूट से भरा है। यदि आज अंग्रेज चले गए तो फिर मुसलमान या कोई और विदेशी आ धमकेगा। वह स्पष्ट कहता है-अंग्रेजी राज्य से अंग्रेजी शिक्षा आएगी, ज्ञान-विज्ञान आएगा। जब हिन्दू फिर से शक्तिशाली और एकजुट हो जाएगा, तभी सच्चा स्वराज्य लाना। अभी आनंदमठ भंग कर दो। ये दिव्य वाणी सुनकर सत्यानंद रो पड़ते हैं। लेकिन आज्ञा मान लेते हैं। अगले दिन सभी संन्यासी हथियार डालकर गृहस्थ जीवन में लौट जाते हैं। आनंदमठ हमेशा के लिए भंग हो जाता है।
नावेल, निश्चित रूप से भारतीय साहित्य रचना का एक सोपान है। मगर इसका टोन सांप्रदायिक है। 1857 जो हिंदू मुसलमान दोनों ने मिलकर अंग्रेजों से लड़ी, उसकी गन अंग्रेजों से हटाकर यवन, याने मुसलमानों की तरफ घुमाती है। जो हिंदू मुस्लिम एकता को तोडऩे, उसमें सांप्रदायिक बीज बोने की कोशिश अंग्रेज सरकार करती रही, उसमें यह उपन्यास एक सांस्कृतिक समिधा देता है। इसमें शामिल गीत वन्देमातरम् पर 8 दिसंबर 2025 को भारत की संसद में बहस होनी है।जहाँ भारतीय न्याय संहिता जैसे कानून एक तिहाई संसद को सस्पेंड कर बिना बहस पारित हो गए… वहाँ वन्दे मातरम् की बहस पर पूरे 10 घण्टे का समय दिया गया है। अगले दो दिन टीवी, सोशल मीडिया अखबारों में इस विषय की निरर्थक बहस उसी तरह खप जाएँगी, जैसे पिछले लगभग 4800 दिन याने लगभग 12 साल एक-एक करके बेमतलब बहसों की बलि चढ़ चुके हैं।
एक नॉवेल, जिसकी भाषा बंगला है, पर एक गीत संस्कृत में है। उस किताब में मुस्लिमों के लिए गाढ़ी नफरत, और अंग्रेजों के शासन के लिए आज्ञाकारी बनने का संदेश है। जो हमारी पूरी साझा सांस्कृतिक विरासत और आजादी के आंदोलन को नकारने वाला दस्तावेज है, जो एक कालातीत हो चुका टाइम कैप्सूल है — मौजूदा राजनीति का बाइबल बनाने की कोशिश हो रही है।
संसद आनंदित मठ तो बन ही गयी है। उसके पटल पर आज, आपके सामने चमकते वस्त्र वाला रहस्यमय “दिव्य पुरुष” वैसे ही प्रकट होगा, जैसे उस नॉवेल में बाबा सत्यानंद के सामने प्रकट होता है। कहेगा-“तुमने मेरी सरकार तो बना दी, पर अब हमारी किसी बात का विरोध मत करो। क्योंकि हिन्दू समाज अभी अज्ञानी, कमजोर और फूट से भरा है। यदि हम गए तो फिर मुसलमान आ धमकेंगे। वन्दे मातरम् !!