डॉ. रामवीर
पहले मैं कविता लिखता था मित्र पढा करते थे कभी कभी औदार्यपूर्वक श्लाघा भी करते थे।
अब माहौल और है जैसे हवा ही गई बदल कविता क्या कवि ही लोगों को लगने लगे हैं खल।
कवि अपने मन की कहता है करता नहीं परवाह नेताओं के स्तुतिगान की देते लोग सलाह।
स्तुतियां ही गानी थीं तो पहले ही गा लेते अब तक तो हम राज्यसभा में नामांकन पा लेते।
पर क्या करें विवश हैं हम भी अपनी ही आदत से लाभ हानि की बिना विचारे सच कहने की लत से।
अब हम हैं व हमारा सच है दोनों निपट अकेले हमने सच कहने के बदले केवल कष्ट ही झेले।
लेकिन कोई गिला नहीं है ऐसा ही होता है झूठ का राजतिलक होता औ सत्य पडा रोता है।
पर यह पूरा खेल नहीं है यह तो है मध्यान्तर ‘सत्यमेव जयतेÓ घोषित है उपनिषदों के अन्दर।