पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। बुधवार (23 अप्रैल) शाम को विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने कहा, ‘1960 की सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जा रहा है, जब तक कि पाकिस्तान आतंकवाद के समर्थन को पूरी तरह और भरोसे के साथ नहीं छोड़ देता। 22 अप्रैल के आतंकी हमले में 26 पर्यटकों की हत्या के बाद यह भारत की ओर से पाकिस्तान के खिलाफ उठाए गए कई कूटनीतिक कदमों में से एक है। इसके अलावा भारत ने अटारी बॉर्डर पोस्ट को बंद करने, वीजा रद्द करने और कई पाकिस्तानी अधिकारियों को भारत से निष्कासित करने का भी फैसला लिया है।
भारत सिंधु जल संधि के निलंबन को कैसे लागू करेगा? भारत दो काम कर सकता है। पहला, भारत सरकार पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम और चिनाब) के नियंत्रित जल प्रवाह को रोक सकती है यानी इन नदियों पर बने बांधों और जलविद्युत परियोजनाओं से पानी छोडऩा बंद कर सकती है। हालांकि इन नदियों का प्राकृतिक प्रवाह जारी रहेगा, लेकिन नियंत्रित प्रवाह (जो पाकिस्तान की सिंचाई और पीने के पानी के लिए जरूरी है) को रोका जा सकता है। उदाहरण के लिए, चिनाब नदी पर बना बगलीहार बांध पानी रोक सकता है, जिससे पाकिस्तान को मिलने वाला जल प्रवाह कम हो सकता है।
दूसरा, भारत पश्चिमी नदियों पर जल भंडारण परियोजनाओं जैसे चिनाब पर पकल डुल (1000 मेगावाट) और सावलकोट (1856 मेगावाट) को तेजी से पूरा करने की दिशा में काम कर सकता है। इससे भारत भविष्य में चिनाब के जल प्रवाह पर अधिक नियंत्रण प्राप्त कर सकेगा। इसके अलावा सिंधु जल संधि के तहत होने वाली तकनीकी बैठकों, डेटा साझा करने और विवाद निपटाने की प्रक्रियाओं को भी स्थगित किया जा सकता है। भारत को अब पाकिस्तान को जल प्रवाह में बदलाव या परियोजनाओं के डिज़ाइन की जानकारी देने की जरूरत नहीं रहेगी।
प्राकृतिक प्रवाह और नियंत्रित प्रवाह में क्या अंतर है? सिंधु जल संधि के संदर्भ में प्राकृतिक प्रवाह और नियंत्रित प्रवाह में फर्क यह है कि पानी प्रवाह प्राकृतिक रूप से बह रहा है या उसे मानव हस्तक्षेप से नियंत्रित किया गया है? प्राकृतिक प्रवाह उस जल की मात्रा को कहते हैं जो किसी नदी से किसी तय समय में तब गुजरती है जब मानव निर्मित बांध, जलाशय या अवरोध न हों। इसमें वर्षा, ग्लेशियर पिघलने और भूमिगत जल स्रोतों से आने वाला पानी शामिल होता है।
नियंत्रित प्रवाह का मतलब होता है मानव द्वारा बनाए गए बांधों, जलाशयों, दरवाजों आदि से पानी के प्रवाह को तय करना। इसमें पानी को रोकना, समय अनुसार छोडऩा, या उसे कम-ज्यादा करना शामिल है। सिंधु जल संधि भारत को पश्चिमी नदियों पर ‘रन-ऑफ-द-रिवर जल विद्युत परियोजनाएं बनाने की अनुमति देता है – यानी वो पानी को अस्थायी रूप से मोड़ सकता है, लेकिन उसकी कुल मात्रा में कोई बड़ा बदलाव नहीं कर सकता।
सिंधु जल संधि के तहत पाकिस्तान को कितना पानी मिलता है? सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों से हर साल औसतन 135 एमएएफ (औसत वार्षिक प्रवाह या सालाना औसत जल प्रवाह) पानी पाकिस्तान को मिलता है। भारत इन नदियों पर जितनी चाहे उतनी रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाएं बना सकता है, जैसे बगलीहार डैम, 7.01 लाख एकड़ क्षेत्र की सिंचाई कर सकता है, और अधिकतम 3.6 एमएएफ तक पानी भंडारित कर सकता है।
संधि के तहत भारत को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में 13.4 लाख एकड़ में सिंचाई की अनुमति है, लेकिन अभी तक सिर्फ 6.42 लाख एकड़ में ही सिंचाई हो रही है। साथ ही भारत को पूर्वी नदियों से 33 एमएएफ पानी मिलता है जिसमें र्से 90 प्रतिशत ही इस्तेमाल हो रहा है। रावी से 2 एमएएफ और सतलुज/ब्यास से 5.5 एमएएफ का पानी पाकिस्तान की ओर चला जाता है क्योंकि भारत में इसके लिए संरचनाएं पूरी नहीं है।
संधि निलंबित करने से क्या प्रभावित होगा? इन नदियों का औसतन 135 एमएएफ ग्लेशियरों के पिघलने और मानसून से आता है, जो संधि निलंबन से प्रभावित नहीं होगा। लेकिन भारत की ओर से नियंत्रित प्रवाह – जो लगभग 3.6 एमएएफ के जलाशयों के जरिए होता है – उसे रोका जा सकता है। फिलहाल जम्मू-कश्मीर में भारत के पास बहुत कम भंडारण क्षमता है, इसलिए अधिक पानी रोकना संभव नहीं है। बगलीहार बांध में केवल 1.5 एमएएफ तक ही भंडारण संभव है। भारत केवल उतना ही पानी रोक सकता है जितना उसके पास विकसित संरचनाओं में स्टोर करने की क्षमता हो। इसके बाद उस पानी को छोडऩा ही पड़ेगा।
अगर भारत 3.6 एमएएफ की पूरी क्षमता विकसित कर ले, तो वह पाकिस्तान को मिलने वाले पानी को अस्थायी रूप से नियंत्रित कर सकता है, खासकर खेती के सीजन में। लेकिन वह इस पानी को स्थायी रूप से रोक या खुद इस्तेमाल नहीं कर सकता।
पाकिस्तान को नुकसान हो सकता है? पश्चिमी नदियों का 60-70 प्रतिशत पानी ग्लेशियरों से और 30-40 प्रतिशत मानसून से आता है, जिस पर भारत का कोई नियंत्रण नहीं है। इसलिए सिंधु जल संधि को निलंबित करने के बावजूद हर साल 131.4 सिंधु जल संधि पानी पाकिस्तान को मिलता रहेगा। मानसून (जुलाई-सितंबर) में इन नदियों में जल प्रवाह 5,800 घन मीटर प्रति सेकेंड से अधिक होता है, जिससे भारत की कृत्रिम रोक असफल हो सकती है। इसलिए इसका तात्कालिक असर स्पष्ट नहीं है। लेकिन 2025 की गर्मियों में, जब फसलें बोई जाती हैं, तब इसका असर देखने को मिल सकता है।
लंबे समय में अगर भारत ने बड़ी परियोजनाएं पूरी कीं और पाकिस्तान लचीलापन नहीं दिखा पाया तो इससे पाकिस्तान पर जल संकट गहरा सकता है। तो इन सबका क्या मतलब है? भारत के लिए पाकिस्तान को पानी से वंचित करना प्राकृतिक भूगोल, अधूरी संरचनाओं और संधि की शर्तों के कारण मुश्किल है। सिंधु प्रणाली का अधिकांश पानी पाकिस्तान को मिलता रहेगा। भारत नियंत्रित प्रवाह (3.6 एमएएफ) को कुछ हद तक रोक सकता है, लेकिन 131.4 एमएएफ प्राकृतिक प्रवाह भारत के नियंत्रण से बाहर है। इस जल प्रवाह को पूरी तरह रोकना भारत के लिए संभव नहीं जब तक वह भारी बुनियादी ढांचा न खड़ा कर। साभार : द वायर