ईएसआईसी का कारनामा: 2 डीन सहित आठ कर्मचारी निलम्बित, आरोप का अता-पता नहीं

ईएसआईसी का कारनामा: 2 डीन सहित आठ कर्मचारी निलम्बित, आरोप का अता-पता नहीं
August 24 04:54 2025

फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) पहली अगस्त को सायं चार बजे हड़कते-भड़कते केन्द्रीय मंत्री मांडविया ने अपनी छापामार टीम के साथ एनएच तीन स्थित मेडिकल कॉलेज अस्पताल में छापा मारा। छापे की यह कार्रवाई अभी खबर लिखे जाने तक जारी बताई जा रही है। छापे की कार्रवाई शनिवार तथा रविवार को भी चलती रही। जानकार बताते हैं कि विजिलेंस नाम की यह तीन सदस्यीय टीम प्रति दिन देर शाम मुख्यालय में जाकर अपने काम की रिपोर्ट पेश करती रही है। पहले छ: दिन में भी जब टीम के हाथ कुछ न लगा तो, बताते हैं कि डीजी ने इन्हें हड़काते हुए कहा कि कल जरूर कुछ न कुछ लेकर आओ। अगले दिन यह टीम देर रात तक रिकॉर्ड खंगालती रही और रात के 12 बजे तक मुख्यालय में बैठे डीजी को जो कुछ मिला वह बता दिया।

इस टीम को क्या मिला यह तो आज तक मंत्री व डीजी के अलावा किसी को मालूम नहीं, लेकिन इसके आधार पर मेडिकल कॉलेज अलवर के डीन डॉ. असीमदास, स्थानीय डीन डॉ. अनिल कुमार पांडे, मेडिसिन के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. निखिल व पांच फार्मासिस्टों को आठ तारीख की रात 12 बजे तुरंत प्रभाव से निलम्बित कर दिया गया। मजे की बात यह है कि चार्जशीट यानी आरोप पत्र आज तक भी डीजी का मुख्यालय बना नहीं पाया। नौकरी की नियमावली के अनुसार पहले जवाब-तलबी की जाती है, जवाब संतोष जनक न होने तथा आरोप गम्भीर होने पर निलम्बन जैसी कार्रवाई की जाती है। लेकिन यहां आरोपों का तो किसी को पता ही नहीं।

अलवर मेडिकल कॉलेज से छन-छन कर आने वाली खबरों से पता चलता है कि मंत्री मांडविया जी का कोई दल्ला पिछले दिनों डॉ. असीमदास के पास पहुंचा था। उसने डॉक्टर दास से मंत्री जी के नाम पर कुछ मांगें रखी थीं जिन्हें डॉक्टर दास ने ठुकरा दिया। इस पर वह दल्ला जब थोड़ा गर्म होने लगा तो डॉक्टर दास ने भी उसे हड़काते हुए अपने दफ्तर से निकल जाने को कहा। गुस्साए दल्ले ने डॉक्टर दास को धमकी देते हुए कहा था कि वह तो जा रहा है लेकिन तुम भी यहां बहुत दिनों तक नहीं टिक पाओगे। इस घटना के मात्र दो-तीन सप्ताह बाद ही छापेमारी का यह बेहूदा खेल हो गया। किसी दल्लेे की ऐसी ही मांग स्थानीय डीन डॉ. पांडे केे सामने रखे जाने की संभावनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

यद्यपि नौकरी के भय से कोई भी अधिकारी कर्मचारी मुंह खोलने को तैयार नहीं लेकिन हालात एवं चर्चाओं से पता चल रहा है कि निशाने पर तो डॉक्टर दास ही थे। अन्य लोगों को तो केवल इसलिए लपेटा गया है कि उन्होंने डॉक्टर दास के विरुद्ध कुछ भी सामग्री छापामार टीम को उपलब्ध नहीं कराई। कभी स्टोर से सम्बन्धित रही एक महिला डॉक्टर से डॉक्टर दास के विरुद्ध बयान लेने के लिए इतना हड़काया कि वह रो तो बेशक पड़ी लेकिन उनका मनचाहा बयान नहीं दिया। इसी तरह का बयान उस वक्त के उस फार्मासिस्ट से भी लेना चाहा था जो उपकरणों आदि की खरीदारी से सम्बन्धित रहा था। चार अन्य फार्मासिस्टों से भी कुछ ऐसे ही बयान लेने के प्रयास विजिलेंस टीम द्वारा किए गए थे। लेकिन इन सबके तथाकथित असहयोग के चलते इन्हें भी न केवल निलम्बित कर दिया गया बल्कि किसी को लखनऊ तो किसी को बिहार तो किसी को लुधियाना, बद्दी आदि स्टेशनों पर हाजिरी देने को कहा गया। गुस्से में बौखलाए डीजी व उसके धूर्त अफसरों ने यह भी नहीं सोचा कि नियमानुसार फार्मासिस्टों के हाजिरी स्थान इतनी दूर नहीं रखे जा सकते। ‘कैटÓ (केन्द्रीय प्रशासनिक ट्रिब्युनल) की लताड़ खाकर डीजी ने अपना थूका हुआ चाट कर तमाम फार्मासिस्टों को उन्हीं के सेवा स्थलों पर हाजरी देने को कहा। जहां डॉक्टर दास अपनी मस्ती में मस्त अपने हाजिरी स्थल गुलबर्गा पहुंच गए वहीं डॉक्टर पांडे कैट की शरण में पहुंचे। उपलब्ध जानकारी के अनुसार कैट ने कॉर्पोरेशन से पूछा कि जिस व्यक्ति की इन्क्वायरी अभी करनी है उसे गुवाहाटी भेजने का क्या अर्थ है? क्या वह इंक्वायरी के लिए रोज-रोज दिल्ली आएंगे? कैट का इशारा स्पष्ट दिखता है कि डॉक्टर पांडे को गुवाहाटी भेजने का कोई औचित्य नहीं है। डॉक्टर पांडे से नाराजगी का कारण यह समझा जा रहा है कि वे डॉक्टर दास के चेले होने के नाते उनके विरुद्ध कुछ भी सामग्री सामने नहीं आने दे रहे। संस्थान में उपलब्ध तमाम दस्तावेजों में से जब कुछ भी नहंी मिला तो ‘खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचेÓ की तर्ज पर डीजी व मंत्री अपनी बौखलाहट का खुला प्रदर्शन करने को मजबूर हैं।

मुख्यालय के खोखले एवं निकम्मेपन को इसी बात से समझा जा सकता है कि आठ तारीख को उक्त निलंबन आदेशों को जारी करने के बाद 18 अगस्त तक मुख्यालय से किसी भी प्रकार का कोई आदेश जारी नहीं किया जा सका। विदित है कि मुख्यालय से रोजाना विभिन्न प्रकार के कोई न कोई आदेश निकलते रहते हैं, किसी का डिपार्टमेंट बदल रहे हैं तो किसी के 62 वर्ष पूरे हो रहे हैं तो किसी का कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू होना है, आदि-आदि लेकिन छापेमारी के इस खेल में मुख्यालय अपनी सुध बुध दस दिन तक इस कदर खोए रहा कि कोई भी आदेश जारी न कर सका।

नवनियुक्त डीन के प्रयास सफल होने पर संदेह
बेशक नौ अगस्त को मेडिकल कॉलेज अस्पताल का कार्यभार सम्भालने वाले डीन डॉ.चव्हाण कालिदास दत्ताराय पूरी ईमानदारी व मेहनत के साथ संस्थान को चला कर मरीजों को बेहतरीन सेवा देने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन खबर लिखे जाने तक चिकित्सा सेवाओं में किसी प्रकार का कोई सुधार देखने को नहीं मिला। हां, सुरक्षाकर्मी व सफाईकर्मी अवश्य मुस्तैदी के साथ काम करते नज़र आए।
प्रात: आठ बजे रजिस्ट्रेशन काऊंटर खुलने तथा फार्मेसी काऊंटरों के समय परिर्वतन के बावजूद मरीजों को लम्बी लाइनों से राहत नहीं मिल पाई। सुनने में अच्छा लगा था जब डॉक्टर कालिदास ने कहा था कि चार मिनट से ज्यादा किसी को भी लाइन में नहीं रहना पड़े। लेकिन हकीकत आज भी ज्यों की त्यों लम्बी लाइनों के रूप में देखी जा सकती है। नेफ्रोलॉजी में डॉ. आशीष मल्होत्रा करीब 10 बजे आते हैं और केवल 25 मरीज ही देखकर उठ जाते हैं। दरअसल इसमें उनका कोई दोष नहीं है क्योंकि उन्हें यहां के बाद ओखला स्थित ईएसआई अस्पताल भी जाना होता है और उसके बाद मेट्रो अस्पताल, जहां वे स्थायी रूप से नौकरी करते हैं। यानी कि उन्हें पार्ट टाइम सेवा के लिए रखा गया है जबकि जरूरत फुल टाइमर की है। डॉक्टरों की कमी के चलते डायलिसिस करा रहे मरीजों को देखने तक के लिए भी कोई डॉक्टर मौजूद नहीं रहता।

कॉर्डियोलॉजी (हृदय रोग विभाग) में जहां बड़ी धूमधाम से कैथ लैब का उद्घाटन पूर्व केन्द्रीय श्रममंत्री भूपेन्द्र सिंह यादव ने किया था, बड़ी संख्या में एंजियोग्रा$फी, एंजियोप्लास्टी आदि के साथ-साथ हृदय के वॉल्व बदलने व पेस मेकर लगाने का काम होता था, वह सब अब ठप्प हो गया है। यहां के विशेषज्ञ डॉ. अरविंद को कॉर्पोरेशन के बसई दारापुर स्थित मेडिकल कॉलेज भेज दिया गया है। मजे की बात तो यह है कि वहांं कैथलैब तो क्या टीएमटी मशीन तक नहीं है। ऐसे में क्या डॉ. अरविंद वहां रहकर भाड़ झोंकेंगे? चर्चा है कि वे जल्द ही नौकरी भी छोड़ सकते हैं क्योंकि यदि वे काम ही नहीं करेंगे तो अपनी दक्षता एवं कार्यकुशलता से ही वंचित हो सकते हैं। डॉक्टर अरविंद के अलावा एक और डॉक्टर बिनय पांडेय को भी कॉपोरेशन ने विदा कर दिया है। इन दो विशेषज्ञ डॉक्टरों के जाने से जहां मरीज चिकित्सा से वंचित रहेंगे वहीं चार पोस्ट पीजी छात्रों का भी सत्यानाश करने की कारपोरेशन ने ठान ली है, लगता है कारपोरेशन नहीं चाहता कि देश में ऐसे विशेषज्ञ पैदा हों।
इसी विभाग में वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. राकेश वर्मा ने तो मानो कसम खा रखी है कि वे और उनकी पत्नी डॉ. सीके दुर्गा कभी भी 12 बजे से पहले आएंगे नहीं और ढाई बजे के बाद रुकेंगे नहीं। डीन के किसी भी फरमान का उन पर कोई असर नहीं होता क्योंकि मुख्यालय उन पर अति मेहरबान रहता है।

आपातकालीन विभाग का नक्शा ऐसा बनाया गया था कि एक मिनट में डीन अपने कार्यालय से यहां और अगले एक मिनट में ओपीडी तक पहुंच सके। लेकिन अब दोनों ओर को जाने वाले दरवाजों को बंद कर दिया गया है। इससे किसको क्या लाभ होने वाला है, समझ से परे है? रेडियोलॉजी विभाग में एमआरआई, सीटी-स्कैन व अल्ट्रासाउंड आदि के लिए आज भी दिसम्बर-जनवरी की तारीखें दी जा रहीं हंै। जाहिर है कि इतने समय तक कोई भी मरीज इंतजार करने की अपेक्षा अपना पैसा खर्च करके काम बाहर से ही करवाएगा। डॉ. कालिदास चाह कर भी इस दिशा में कोई सुधार कर पाने की स्थिति में नहीं हो सकते क्योंकि मुख्यालय की हरामखोरी के चलते बसई दारापुर, ओखला, नोएडा, गुडग़ांव व मानेसर तक के मरीजों को यहां धकेल दिया जाता है। मरीजों की संख्या को देखते हुए उक्त सभी अस्पतालों में इस तरह की जांच का पुख्ता प्रबन्ध किया जाना आवश्यक है। जिस के लिए मुख्यालय पैसा खर्च करना नहीं चाहता, करे भी क्यों जब खर्च किए बिना ही काम चल रहा है, मरीज़ धक्के खाते फिर रहे हैं तो फिरते रहें।

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Mazdoor Morcha
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