फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) बीते करीब 50 सालों से जल तथा वायु प्रदूषण लगतार बढ़ता जा रहा है। इसे रोकने के लिए बनाए गए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल आदि लूट कमाई के धंधे बन चुके हैं। इस दौरान ध्वनि प्रदूषण की ओर किसी ने भी ध्यान देने की कोई जरूरत नहीं समझी। विदित है कि ध्वनि प्रदूषण उक्त दोनों संस्थानों के दायरे में नहीं आता। यह सीधे-सीधे जिला प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में आता है।
ध्वनि प्रदूषण जो आज एक बड़ी समस्या बन चुका है, बिना किसी संयंत्र के भी महसूस किया जा सकता है, उसे नापने के लिए अब सरकार द्वारा एक नई नौटंकी शुरू की गई है। इसके लिए माह जनवरी में तीन स्थानों आईएमटी औद्योगिक क्षेत्र, हूडा के सेक्टर 16 ए आवासीय क्षेत्र तथा ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज पर ध्वनि मापक संयंत्र लगाए गए हैं।
70 डेसिबल तक का शोर कुछ हद तक सहनीय माना गया है जबकि वास्तव में इसका भी हमारे कानों एवं मस्तिष्क पर दुष्प्रभाव पड़ता है लेकिन वास्तव में शहर के लगभग हर गली-कूचे में 100-200 डेसिबल तक का शोर कभी भी सुना जा सकता है। डीजे की ध्वनि ने तो और भी कमाल कर रखा है। इसकी ध्वनि से घरों के दरवाजे-खिड़कियां थर्राने लगते हैं, कई बार तो खिड़कियों के शीशे तक भी टूट जाते हैं। इस शोर से हृदय की धड़कन तक भी बुरी तरह से प्रभावित होती है, लेकिन कोई पूछने वाला नहीं। सबसे अधिक ध्वनि प्रदूषण आज कल धर्म के नाम पर किया जा रहा है। मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे में रहने वाले भगवान की पूजा आरती तब-तक अधूरी समझी जाती है जब तक की ऊंची से ऊंची आवाज में लाउड-स्पीकर न बजाया जाए। इसके लिए कोई समय भी निर्धारित नहीं रह गया है। रात हो या दिन जब चाहे ये धार्मिक लाउड-स्पीकर चिंघाडऩे लगते हैं, प्रात: मुंह अंधेरे शोर मचाना तो ये अपना परम कर्तव्य समझते हैं। यदि भगवान को लाउड-स्पीकर इतना ही प्रिय है तो उसे छत पर लगाने की बजाय मूर्ति अथवा पूजा स्थल पर ही क्यों नहीं लगाया जाता है?
इतना ही नहीं कमोबेश लगभग प्रत्येक धार्मिक उत्सव सड़कों पर जुलुस के बगैर अधूरा माना जाता है। इस जुलूस में न केवल लाउड-स्पीकर का पूरा दुरुपयोग होता है बल्कि यातायात भी जाम कर दिया जाता है। अब तो आग में घी डालने का काम करते हुए डीजे भी अपना पूरा रौद्र रूप दिखाता है। मानो इतना शोर काफी नहीं होता तो जमकर पटाखे फोड़े जाते हैं और आतिशबाजी की जाती है, यानी ध्वनि प्रदूषण के साथ वायु प्रदूषण भी किया जाता है।
पहले से चले आ रहे इस तरह के जुलूस शायद कम पड़ रहे थे इसलिए अब कांवड़ यात्री भी इस दिशा में अपना पूरा योगदान कर रहे हैं। वे जाते समय तथा कांवड़ लेकर आते समय भी पूरी सड़कों को घेर कर डीजे बजाते हुए ध्वनि प्रदूषण का रिकॉर्ड तोड़ते हैं। इस वर्ष से तो शायद पहली बार नवरात्रों की भी शोभा यात्रा कांवडिय़ों की तर्ज पर निकलने लगी है। शादी-बारातों में बैंड, डीजे, ढोल और आतिशबाजी भी वातावरण में शोर और दमघोंटू धुआं फैलाने मेें पीछे नहीं रहते।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को एक ध्वनि तीव्रता मापक यंत्र नए नए बने हाइवे से सटे सेक्टरों के घरों के पास लगाना चाहिए। हाइवे पर वाहनों का शोर और जगह जगह बनाए गए छोटे-छोटे स्पीड ब्रेकर से गुजरने वाले भारी वाहनों की तेज खडख़ड़ाहट इन घरों में रहने वालों के दिन रात का सुकून छीन रही है। जब लाउड-स्पीकर का इतना खुला दुरुपयोग हो रहा हो तो फिर शहर की गलियों में सौदा बेचने वाले यहां तक कि भिखारी भी इस तकनीक का पूरा लाभ उठाने में क्यों पीछे रहें।
विवाह जैसे उत्सवों में भी संगीत के नाम पर जिस तरह से डीजे बजाया जाता है, वह संगीत न रह कर इस कदर शोर का रूप ले लेता है कि वहां बैठना तक भारी पड़ जाता है। आयोजक आस-पड़ोस में रहने वालों तक की भी कोई चिन्ता नहीं करते। जिस पुलिस को इसका स्वत: संज्ञान लेना चाहिए, वह केवल शिकायत करने पर ही मौके पर पहुंचती है और अपनी बेबसी जाहिर करते हुए शिकायतकर्ता का नाम भी आयोजक को बता देती है। इसके परिणामस्वरूप कई बार अच्छे-खासे झगड़े भी हो जाते हैं। कानून के मुताबिक कोई भी व्यक्ति, बिना प्रशासनिक स्वीकृति के लाउड-स्पीकर का इस्तेमाल नहीं कर सकता। इसकी अवहेलना करने वालों को पकडऩे व लाउड-स्पीकर जब्त करने का अधिकार पुलिस को प्राप्त है। परन्तु राजनीतिक एवं प्रशासनिक शिथिलता के चलते इस कानून की धज्जियां लगातार उड़ाई जा रही हैं। अब देखना यह है कि शहर में लगाए गए उक्त तीन संयंत्र कैसे इस जनता को ध्वनि प्रदूषण से निजात दिलाएंगे?