फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) 14 वर्ष आयु तक के हर बच्चे को अनिवार्य शिक्षा दिए जाने के लिए बनाया गया शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) शहर के निजी स्कूल संचालकों के ठेंगे पर है। डीएवी, मानव रचना, एमवीएन सहित शहर के 27 बड़े स्कूलों ने आरटीई के तहत आरक्षित दस फीसदी सीटों पर या तो एडिमशन लिए ही नहीं या नाम मात्र के दाखिले किए। नतीजा यह हुआ कि निजी स्कूलोंं में आरटीई के तहत आरक्षित 887 सीटों में आधी से अधिक सीटें खाली हैं। ये भी अधिकतर छोटे निजी स्कूलों में हुए हैं, नामवर स्कूल वालों ने आवेदनों पर तरह तरह की आपत्तियां लगाकर अभिभावकों को चलता कर दिया। हर साल की तरह जिला शिक्षा अधिकारी ने इस साल भी इन स्कूलों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। सत्ता के लिए बसें, रैली प्रबंधन, राजनेताओं के कार्यक्रम कराने वाले इन निजी स्कूल प्रबंधनों के खिलाफ पहले भी कुछ नहीं हुआ तो अब क्या होगा।
शिक्षा विभाग सूत्रों के अनुसार शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए आरटीई के तहत जिले में 887 सीटें आरक्षित श्रेणी में रखी गई थीं। केवल फरीदाबाद खंड के निजी स्कूलों में आरक्षित 332 सीटों में महज 171 सीटों पर ही एडमिशन दिया गया। बड़े निजी स्कूलों ने 151 आवेदन खारिज कर दिए। दाखिला ठुकराए जाने की वजह दस्तावेजों में कमी, आवेदन समय पर नहीं जमा करना, पात्रता मानदंड पूरे न होना आदि बताई गई। दरअसल, निजी स्कूल इन बच्चों का दाखिला लेने से इसलिए हिचकते हैं कि इनसे कोई कमाई की गुंजाइश नहीं रहती, सरकार बंधी हुई फीस और यूनिफार्म, किताब, स्टेशनरी के लिए एक निश्चित रकम ही चुकाती है। निजी स्कूल पढ़ाई के अलावा प्रतियोगिता, समारोह, आउटिंग, एजुकेशनल टूर, एक्टिविटी आदि के नाम पर अभिभावकों से फीस के अतिरिक्त अच्छी खासी वसूली करते हैं, इन छात्रों से यह वसूली नहीं की जा सकती।
यानी यदि सभी दस फीसदी सीटें भर ली गईं तो कमाई में दस से बीस प्रतिशत का नुकसान। एक निजी स्कूल की शिक्षिका ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि आरटीई के तहत भरती किए जाने वाले बच्चों पर ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, निजी स्कूलों में पढ़ाई और सिलेबस सरकारी स्कूलों से काफी अलग होता है और इंग्लिश पर ज्यादा जोर दिया जाता है। अधिकतर बच्चों के अभिभावक भी कम पढ़े लिखे होते हैं जो पढ़ाई में बच्चे की मदद नहीं कर पाते। ऐसे में स्कूल का रिजल्ट गिरने के डर से एडमिशन लेने से बचा जाता है।
निजी स्कूलों में आरटीई के तहत आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को भरती किए जाने का प्रावधान है। विभाग ने आरटीई के तहत दस प्रतिशत सीटें भरने के लिए निजी स्कूलों को सर्कुलर तो जारी कर दिया लेकिन दाखिले होने के वक्त नजर नहीं रखी कि स्कूल कितना पालन कर रहे हैं। दाखिले समाप्त होने के बाद भी शिक्षा विभाग ने स्कूलों से रिकॉर्ड तलब नहीं किया। बताया जा रहा है कि अक्तूबर में कक्षा चार से आठ तक के बच्चों की अर्धवार्षिक परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं, ऐसे में डेढ़ सौ से अधिक अभिभावक जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के चक्कर काट कर आरटीई के तहत दाखिला दिलाने की मांग कर रहे हैं। अभिभावकों के दबाव के बाद नींद से जागे विभाग ने स्कूलों को नोटिस जारी कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली है। सवाल यह है कि शिक्षा से वंचित डेढ़ सौ से अधिक इन बच्चों के शिक्षा के मौलिक अधिकार की रक्षा कैसे होगी, यदि इन बच्चों को किसी सरकारी स्कूल मेें दाखिला दिला भी दिया गया तो जो कोर्स पिछड़ गया है वह कैसे पूरा कराया जाएगा। यदि शिक्षा विभाग दाखिला प्रक्रिया के दौरान ही मुस्तैदी से काम करता तो निजी स्कूल इतने बच्चों के आवेदन नहीं ठुकरा पाते।
शिक्षा विभाग के सूत्र बताते हैं कि अधिकतर बड़े स्कूल वाले आरटीई का पालन नहीं करते। करें भी क्यों, उन्हें मालूम है कि सरकार उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेगी। इनके मालिक मंत्री-विधायक और सत्तापक्ष के नेताओं के साथ गलबहियां करते घूमते हैं। रैलियों के लिए बसें भेज कर भीड़ इक_ा करते हैं, मोटा चंदा देते हैं। सुप्रीम कोर्ट के जज, राज्यपाल, राष्ट्रपति जैसी बड़ी हस्तियों के कार्यक्रम कराते हैं। अब किस अधिकारी की हिम्मत होगी कि वह इनके मालिकों पर आरटीई लागू करने का दबाव डाल सके। हां, बेचारा अपनी नौकरी सुरक्षित रखने के लिए कागजी कार्रवाई पूरी करने का दिखावा करते हुए कारण बताओ नोटिस जारी कर देता है।
स्कूलों की तरफ से दिए गए जवाब को अहसान मानते हुए फाइल में लगा कर रख दिया जाता है कि कोई सवाल न कर सके। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकारों में शामिल कराया था। उनका मानना था कि शिक्षित नागरिक ही बेहतर देश का निर्माण कर सकता है। कुल मिलाकर आरटीई झुनझुना ही साबित हुआ और इसके जवाब में तत्कालीन शिक्षामंत्री कपिल सिब्बल ने इसे लागू कराने के लिए लागू कराने की सलाह दी थी। मोदी-सैनी सरकारें भी स्वास्थ्य की तरह ही शिक्षा जैसी आधारभूत सेवाओं से अपनो हाथ खींच रही हैं। संभवत: इसीलिए मर्जर के नाम पर सरकारी स्कूलों की संख्या घटाई जा रही है, स्कूल कम हो रहे हैं तो टीचरों की भी भरती बंद सी है। आंकड़ों के अनुसार पूर्व सीएम खट्टर के कार्यकाल में प्रदेश में शिक्षकों के करीब पैंतालीस हजार पद खाली थे।
वर्तमान में भी तीस हजार से अधिक पद खाली हैं, जानकार कहते हैं कि सरकार अतिरिक्त बता कर शिक्षकों के बहुत से पद समाप्त ही करने की तैयारी में है। जाहिर है कि आधारभूत सुविधाओं और टीचरों की कमी के कारण सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं हो पाती। ऐसे में सरकार मुनाफाखोरी के लिए खोली गई शिक्षा की दुकानों पर आरटीई का बोझ डालना चाह रही है, इसे परवान चढ़ाने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है जो मुनाफाखोरों से लाभ उठाने वाली सरकार में नहीं हो सकती। ऐसे मेें आरटीई का यही हाल होना है और गरीब बच्चे शिक्षा के मौलिक अधिकारों से वंचित ही रहेंगे।