फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) निगम क्षेत्र में होने वाले तमाम अवैध कब्जे व निर्माण, सड़कों पर घूमते आवारा पशु तथा जगह-जगह खुली मीट की दुकानों के लिए पुलिस को जिम्मेदार ठहरा दिया है। निगम अधिकारियों का कहना है कि उन्हें जरूरत के समय पुलिस बल नहीं मिलता, इसलिए वे उक्त अवैध कामों को रोक पाने में असमर्थ हैं। जब भी वे कोई तोडफ़ोड़ करने अथवा अवैध कब्जे हटाने का कार्यक्रम बनाते हैं तो पुलिस बल के उपलब्ध न होने के कारण उनका अभियान बाधित हो जाता है। इसलिए अब पुलिस पर निर्भरता समाप्त करके निगम 100 होमगार्ड भर्ती करने जा रहा है। इनको 30 लाख रुपये मासिक बतौर वेतन के अलावा आवास व अन्य सुविधाएं अलग से दी जाएंगी।
बड़ा प्रश्न यह पैदा होता है कि अवैध कब्जे अथवा निर्माण की जब पहली ईंट लगती है तो निगम अधिकारी कहां सो रहे होते हैं? यह किसी से छिपा नहीं है जब भी कोई अवैध कब्जा अथवा निर्माण करता है तो तुरन्त ही निगमकर्मी मौके पर पहुंच कर सौदेबाजी करता है। सारा लेनदेन नीचे से ऊपर तक के अफसरों में बंट जाता है। खुद ही अवैध निर्माण करवाने के बाद जब निगम अधिकारी पुलिस को लेकर तोडफ़ोड़ करने निकलते हैं तो कुछ निर्माणों को तोड़ते हैं और अधिकांश को भयभीत करके मौके पर ही सौदेबाजी करके निकल लेते हैं, यह सारा काम पुलिस वालों के सामने ही होता है। ऐसे में भला निगम अधिकारी पुलिस से क्या अपेक्षा कर सकते हैं? अनेकों बार तो यह भी देखा गया है कि भारी संख्या में पुलिस तो पहुंच जाती है लेकिन निगम वाले ही नहीं पहुंचते।
निगम को प्राप्त शक्तियों के अनुसार वह अवैध कब्जों एवं निर्माणों के बाकायदा चालान करके भारी-भरकम जुर्माने लगा सकता है। अभी तक देश का कानून एवं न्याय व्यवस्था इतनी दुर्बल भी नहंी हुई है कि ऐसे जुर्मानों की वसूली न कर सके। यदि कानून की पालना करने के लिए होमगार्डों से ही काम चल जाए तो फिर पुलिस की कोई जरूरत रह नहीं जाती। सवाल यह भी पैदा होता है कि 100 होमगार्डों की फौज, आखिर पूरा दिन, पूरा महीना, पूरा साल क्या करेगी? कोई बड़ी बात नहीं कि ये नए ‘फौजी’ खुद ही साठगांठ में शामिल होने लगें। जब निगम का पूरा अमला ही भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हो तो ये बेचारे कैसे बच पाएंगे?
दूसरा बड़ा सवाल ये समझ में नहीं आ रहा कि आवारा पशुओं को सड़कों से हटाने में, नगर निगम पुलिस से क्या चाहता है? क्या आवारा पशुओं को भी खदेडऩे का काम भी पुलिस वालों से ही निगम कराना चाहता है? वैसे बरसात के मौसम में सड़कों पर खड़े पानी से वाहनों को धकेलने-निकालने व सड़कों के गड्ढों में मलबा भरने का जो काम निगम को करना चाहिए, उसे पुलिस वालों को करते देखा गया है। शायद आवारा पशुओं को खदेडऩे के लिए भी इन्हें पुलिस की ही जरूरत महसूस होती है। अब देखना यह है कि होमगार्डों की ये फौज कितने पशु खदेड़ पाती है और कितने अवैध कब्जे व निर्माण हटा पाते हैं?
राजनीतिक जानकारों का मानना हैकि होमगार्डस की भरती के नाम पर बेरोजगार संघियों को भर्ती करा सरकारी खजाने से उनका वेतन बांधने का खेल किया जा रहा है। निगमायुक्त की इतनी क्षमता नहीं है कि वह बिना सरकारी अनुमति के होमगाडर््स की भर्ती कर सके। सच्चाई ये है कि यह सारा खेल ट्रिपल इंजन सरकारों द्वारा किया जा रहा है। जनता को यह बता कर बेवकूफ बनाया जा रहा है कि अवैध निर्माण में तोडफ़ोड़ करने के लिए होमगाडर््स तैनात किए जा रहे हैं, यह सच्चाई किसी से नहीं छिपी है कि होमगाडर््स के पास पुलिस जितने वैधानिक अधिकार नहीं होते, न ही वे पुलिस बल की तरह आधुनिक हथियारों से लैस होते हैं, कुल मिलाकर ये पुलिस बल के सहयोगी के रूप में तो काम कर सकते हैं लेकिन एक एन्फोर्समेंट एजेंसी के तौर पर इनके अधिकार सहायक के होते हैं। दरअसल, साम-दाम-दंड-भेद के जरिए भाजपा को सत्ता में बैठाने वाले जमीनी स्तर के संघी-भाजपाई कार्यकर्ताओं की आय पक्की करने के लिए सरकार ने यह कदम उठाया है, जल्द ही सामने आएगा कि होमगाडर्् की भर्ती में सत्ता के इन्हीं चाटुकारों को लगाया जाएगा, ये अभी तक अवैतनिक कार्यकर्ता थे अब कार्यकर्ता के साथ वैतनिक सरकारी कर्मचारी की तरह भी सत्ता के लिए काम करेंगे। विदित है कि जितने भी होमगाडर््स आज के दिन रोल पर हैं उनमें से मात्र आधों को ही काम पर रखा जाता है, अगर इनकी नीयत संघियों को भरती करने की नहीं होती तो ये नई भर्ती करने के बजाय जो पहले से ही हैं उन्हीं में से तैनात कर सकते थे।
सवाल और भी हैं विदित है कि होमगाडर््स का न तो पद स्थायी होता न ही इनकी तैनाती, यानी ये आज इस महकमे में हैं तो कल किसी दूसरे में। सारे होमगाडर््स को पूरे महीने की ड्यूटी भी नहीं मिलती, किसी को दस दिन तो किसी को बीस दिन। लगता है कि नगर निगम यह व्यवस्था भी खत्म कर होमगाडर््स को स्थायी रूप से भर्ती करने जा रहा है, अगर ऐसा है तो नियमों की ऐसी तैसी करने का यह खेल निश्चित ही सत्ता बहादुर की मंशा से खेला जा रहा है।