फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) जिला स्तरीय संगठन नहीं बनाने और नए कार्यकर्ता नहीं जोड़े जाने के दुष्परिणाम कांग्रेस के सामने आने लगे हैं। पार्टी को नगर निगम चुनाव लडऩे के लिए उम्मीदवारों की तलाश करनी पड़ रही है। दूसरी ओर भाजपा में उम्मीदवार बनने वालों की तांता उमड़ रहा है, एक दशक पहले ही अस्तित्व में आई आम आदमी पार्टी भी इस मामले में कांग्रेस से आगे नजर आ रही है।
2014 में सत्ता जाने के बाद हूडा, तंवर आदि की गुटबाजी के चलते वर्चस्व की लड़ाई में कांग्रेस ने प्रदेश के जिला स्तरीय संगठन का चुनाव टालना शुरू कर दिया। कार्यकारिणी का पुनर्गठन नही हुआ तो पार्टी में नए कार्यकर्ता जोडऩे वाले भी नहीं रहे, आला कमान ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया। इसका खामियाजा यह हुआ कि नेतृत्व और गाइडेंस के अभाव में कार्यकर्ता धीरे धीरे पार्टी से छिटकते चले गए। गुटबाजी के चलते ही 2017 के नगर निकाय चुनावों में कांग्रेस ने टिकट नहीं बांटे ओर बाहर से प्रत्याशियों का समर्थन किया, जिसका नुकसान भी दिखाई दिया।
करीब दो दशक तक नगर निगम पर कब्जा किए रहने वाली कांग्रेस के चुनाव से हटने के कारण भाजपा ने तीस से अधिक सीटों पर जीत हासिल की। निगम चुनाव सिंबल पर नहीं लड़ाने के आला कमान के इस निर्णय से दूरगामी परिणाम देखने को मिले। कार्यकर्ता, पार्षद के अभाव में पार्टी जनता से और फिर उसके मुद्दों से दूर होती चली गई।
दस साल में पार्टी की हालत यह हो चुकी है कि प्रत्याशियों की मिन्नत चिरौरी करनी पड़ रही है। पार्टी के भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि वरिष्ठ कांग्रेसीजन चुनाव लडऩे के इच्छुक व्यक्ति के घर जाकर फार्म भरवा कर लाने तक को तैयार हैं। एक वरिष्ठ कांग्रेसी ने तो अपने वाट्सएप स्टेटस पर मैसेज डाला है कि ‘सम्मानीय साथियों, विनम्र आग्रह है कि जो भी आदरणीय साथी चुनाव लडऩा चाह रहा है, (उससे) केवल यह आग्रह करें कि ऊपर दिया गया फार्म और एक बायोडाटा वेदपाल दायमा जी के कार्यालय पर पहुंचाएं। चुनाव लडऩे वाले साथियों (उससे?) बात करो कि अगर वह कहीं बिजी है चुनाव संबंधी फार्मेलिटी में और हृदय से हमारी पार्टी (कांग्रेस) से चुनाव लडऩा चाहता है तो हम साथी उसके यहां से बायोडाटा और भरा हुआ फार्म कलेक्ट कर लेंगे।
राजनीति के जानकार कहते हैं कि यह खुला हुआ सत्य है कि स्थानीय निकाय चुनाव हमेशा सत्ता के ही होते हैं लेकिन कांग्रेस ने पार्टी सिंबल बांट कर पार्टी के हित में सकारात्मक कदम उठाया है। स्थानीय चुनाव में वोट पाने और जीतने वाले प्रत्याशियों से जनता के रुख का अंदाजा हो जाएगा, जिसके मद्देनजर आगे आने वाले चुनाव की रणनीति बनाने में और जनता के बीच पहुंच बनाने में मदद मिलेगी।
हालांकि, सत्ता के रथ पर सवार होने के कारण भाजपा में उम्मीदवारों का जमावड़ा लगा हुआ है, सबको लगता है कि सत्ता का साथ होगा तो उसकी जीत सुनिश्चित है, इसलिए दावेदारों की संख्या बहुत ज्यादा है। उम्मीदवारों की संख्या ज्यादा होना अलग बात है और जनता का समर्थन हासिल होना दूसरी बात। यदि जनता का समर्थन प्राप्त होता तो भाजपा को निकाय चुनाव तीन साल तक टालने नहीं पड़ते। स्थानीय निकाय चुनाव 2022 में ही हो जाने चाहिए थे लेकिन तब जनता का रोष देखते हुए भाजपाई चुनाव कराने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।
2024 में हुए लोकसभा और विधानसभा चुनाव में जनता के भारी विरोध के बावजूद केंद्र और राज्य में अप्रत्याशित रूप से तीसरी बार भाजपा ने सरकार बना ली। सत्ता हासिल होने के बाद ही अब निकाय चुनाव की घोषणा की गई है। फिर भी, भाजपा के लिए यह चुनाव आसान होने वाला नहीं है, कारण 2017 में उनके सामने कांग्रेस नहीं थी इसलिए मामला एक तरफा रहा था लेकिन इस चुनाव में कमल का सीधा मुकाबला पंजे से होने वाला है इसलिए टक्कर कांटे की मानी जा रही है। भाजपा टिकट पाने की होड़ इसलिए भी बढ़ गई है कि मतदाता भले ही वोट न दे, ईवीएम तो उनकी है, दो मार्च से 12 तक जो ईवीएम रखी जा रही है वो इसीलिए तो रखी जा रही है, दस दिन के इस वक्फे में भाजपा सरकार उनकी जीत का उचित प्रबंध कर ही देगी, ऐसा उनका विश्वास है।
जब अदलखा जैसे अपराधी, भ्रष्टाचारी के लिए भाजपा सरकार अपनी मशीनों द्वारा जीत सुनिश्चित कर सकती है तो पार्टी टिकट पर लडऩे वाले उम्मीदवारों को जिताएगी ही। रही बात आम आदमी पार्टी की तो हाल ही में दिल्ली की सत्ता खोने के बाद पार्टी कार्यकर्ता के कंधे झुके हुए हैं और निकाय चुनाव के मुद्दे भी अलग होने के कारण अधिकतर मामलों में इसके प्रत्याशी वोट कटवा ही साबित होने वाले हैं।