स्वच्छता के नाम पर शहर में 350 करोड़ रुपये का एक और अभियान

स्वच्छता के नाम पर शहर में 350 करोड़ रुपये का एक और अभियान
November 02 17:11 2025

फरीदाबाद (मजदूर मोर्चा) किसी भी नगर निगम अथवा स्थानीय स्वाशासन का पहला दायित्व नगर की सफाई होता है। इसमें सीवर से लेकर गली-मोहल्लों के कचरे को उपयुक्त ढंग से ठिकाने लगाना होता है। यहां का निगम भी इसी काम को करने का पाखण्ड बीते बीसियों वर्ष से करता आ रहा है। आज के वैज्ञानिक युग में जहाँ दुनिया भर में इस कूड़े-कचरे से बायो गैस, बिजली व जैविक खाद आदि बनाकर अच्छी-खासी कमाई की जा रही है वहीँ इस शहर में इस कचरे के निस्तारण पर सेकड़ों करोड़ वार्षिक खर्च किया जा रहा है इसके बाबजूद शहर में जगह-जगह कचरे के ढेर देखे जा सकते हैं।
बीते करीब सात-आठ साल में “स्मार्ट सिटी” प्रोजेक्ट के नाम पर पांच हजार करोड़ से अधिक डकारे जाने के बावजूद भी शहर की दुर्दशा में कोई परिवर्तन नजऱ नहीं आया। स्मार्ट सिटी के साथ-साथ स्नरूष्ठ्र को भी हजारों करोड़ का बजट देकर इस काम पर लगाया गया, लेकिन स्थ्रिति ज्यों कि त्यों ही नजर आई। स्वच्छता के नाम पर शौचालयों का प्रोजेक्ट काफी आकर्षक रहा है, इसेक तहत अनेको भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर स्थाई शौचालय के साथ साथ पोर्टेबल शौचालय भी खड़े किये गए थे।

वैसे शौचालय बनाना कोई नया काम नहीं होना चाहिए मनुष्य की ज़रूरतों को देखते हुए पर्याप्त संख्या में इन्हें बिना किसी विशेष अभियान के स्थापित किया जाना चाहिए। स्थापित करने के बाद उनकी नियमित देखभाल एवं सफाई आदि का दायित्व भी नगर निगम का ही होता है परन्तु यहाँ तो विशेष अभियानों के तहत शौचालय बनाने तथा पोर्टेवल शौचालय खड़े करने के ठेकों से मोटी लूट कमाई होती रही है। बीते आठ-दस वर्षों में कितने शौचालय बनाये व खरीदे गए इनका कोई ब्यौरा देने को नगर निगम तैयार नहीं है। इन ठेकों को लेकर पूर्व विधायक सीमा त्रिखा के भाई का भी खूब चर्चा रहा है उनके द्वारा खरीदे गए करोड़ो रूपये के शौचालय आज कहाँ लापता हो गये, कोई नहीं जानता।

एक और गजब की बात ये है की शौचालय बनाने के बाद उनकी नियमित देखभाल एवं सफाई के बदले उन पर ताला लगाकर निगम अपने दायित्व की इतिश्री कर लेता है। लेकिन जनता कौन-सी इन तालों से रुकने वाली है। वे ताले तो क्या दरवाजे भी तोड़ देते हैं शौचालयों का हुलिया बिगाड़ कर उसे सड़ांध घर बना देते हैं। इतना सब अनुभव होने के बाबजूद अब नगर निगम फिर से शौचालयों का प्रोजेक्ट लेकर उपस्थित हुआ है। नई बात यह बताई जा रही है कि इस बार जनता की भागीदारी से सब काम किया जाएगा। तो क्या इससे पहले सारे काम जनता की भागीदारी के बिना ही होते थे? क्या जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले पार्षद, विधायक तथा सांसद व उनके लगुए-भगुए इस धंधे में शामिल नहीं होते थे? खूब होते थे, सक्रिय रूप से होते थे, ठेकेदारी व दलाली करके मोटी मलाई खाते थे।

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Mazdoor Morcha
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