मोदी सरकार ढाई साल कुंडली मारे रही ईएसआईसी अस्पताल के विस्तार पर

मोदी सरकार ढाई साल कुंडली मारे रही ईएसआईसी अस्पताल के विस्तार पर
November 04 06:11 2024

फरीदाबाद (मज़दूर मेर्चा) मज़दूरों के वेतन से नियमित वसूली के चलते धन की कोई कमी न होने के बावजूद स्थानीय मेडिकल कॉलेज अस्पताल का विस्तार करीब ढाई साल तक रुका रहा। चिकित्सा की बढ़ती जरूरतों के मद्देनज़र 2020 में ही अस्पताल विस्तार की जरूरत महसूस होने लगी थी। इसका संज्ञान लेकर 2021 में नई बिल्डिंग बनाने का फैसला हो गया था। मज़दूर विरोधी सोच रखने वाले कॉर्पोरेशन मुख्यालय ने इसे लेकर तरह-तरह के अड़ंगे लगाने शुरू कर दिए थे। तत्कालीन केन्द्रीय श्रममंत्री भूपेन्द्र सिंह यादव गुडग़ांव के मूल निवासी होने के बावजूद मुख्यालय के हरामखोरों से निपटने में पूरी तरह विफल रहे।

मज़दूरों के सौभाग्य से जून 2024 में मनसुख मांडविया जैसे डायनमिक नेता ने केन्द्रीय श्रममंत्री का पद भार सम्भाला। लगभग इसी दौरान अशोक सिंह जैसे कर्मठ आईएएस अधिकारी डीजी के रूप में कॉर्पोरेशन में तैनात हो गए। इन्होंने मुख्यालय में मस्ती काट रहे कामचोर अधिकारियों के नट-बोल्ट टाइट करते हुए चिकित्सा सेवा के काम को अच्छी खासी गति प्रदान की। इसी के फलस्वरूप 29 अक्टूबर को अस्पताल की नई बिल्डिंग का निर्माण कार्य आरम्भ होने की घोषणा मोदी के मुखारबिंदु से करा दी। क्योंकि इस देश में चाहे किसी रेलगाड़ी को झंडी दिखानी हो या किसी पाखाने का शिलान्यास करना हो, इसका एकाधिकार केवल मोदी के पास है, हालांकि ऐसे किसी भी काम को करने के लिए किसी भी नेता की कहीं कोई जरूरत नहीं होती।

देश की जनता को मोदी का यह नाटक दिखाने के लिए इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेदा, दिल्ली में मुख्य मंच सजाया गया था। वहीं से उन्होंने बटन दबाकर देश भर के आठ स्थानों पर विभिन्न छोटे-बड़े अस्पतालों आदि का शिलान्यास कर दिया। ऐसे मौके पर अपनी आदत के मुताबिक मोदी ने जम कर झूठ बोल कर जनता के मन में अपनी पैठ जमाने का प्रयास किया। दिल्ली इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेदा के मुख्य मंच के साथ-साथ हर उस जगह पर भी मंच सजाए गए थे जहां-जहां शिलान्यास होने थे। इसी कड़ी में $फरीदाबाद के मेडिकल कॉलेज और फतेहपुर बिल्लौच में एक ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र के नाम पर बल्लबगढ़ के अस्पताल में भी मंच सजाया गया था।

पृथला विधानसभा क्षेत्र के गांव फतहपुर बिल्लौच में दिल्ली के एम्स ने करीब सात एकड़ ज़मीन ग्राम पंचायत से 16 वर्ष पूर्व अपने नाम करा कर कब्ज़ा कर लिया था। घोषणा यह की गई थी कि एम्स यहां पर ग्रामीण स्वास्थ केन्द्र चलाएगा। जिसमें 15 बिस्तरों की सुविधा तथा आवश्यक डॉक्टर व अन्य स्टा$फ आदि एम्स की ओर से उपलब्ध कराए जाएंगे। बीते 16 वर्ष तक क्षेत्र के किसी विधायक, सांसद व मंत्री आदि ने इसको शुरू कराने के लिए कोई हाथ-पैर हिलाने की जरूरत नहीं समझी। इत्तेफाक़ से एम्स के डायरेक्टर डॉ. एम श्रीनिवास करीब छ: माह पूर्व जब बल्लबगढ़ के एम्स सेंटर को देखने आए थे तो उन्हें फतेहपुर बिल्लौच वाली ज़मीन के बारे में बताया गया। उन्होंने जगह का मुआयना किया और तत्काल उस पर कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार मोदी की इस नाटकबाज़ी से पूर्व ही वहां काम शुरू हो चुका था।

संदर्भवश जिस तरह से एम्स को अपने ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्र खोलने अनिवार्य होते हैं उसी तरह से ईएसआई मेडिकल कॉलेज को भी अपना एक ग्रामीण स्वास्थ केन्द्र खोलना अनिवार्य है। इस केन्द्र के लिए ततारपुर गांव वासियों ने तीन एकड़ ज़मीन मुफ्त में कॉर्पोरेशन को देनी चाही थी। परन्तु कॉर्पोरेशन मुख्यालय के जन विरोधी एवं कामचोर अधिकारियों ने इस ऑफर को नज़र अंदाज कर दिया। खानापूर्ति के लिए पाली गांव में एक टेंपरेरी सी जगह किराए पर लेकर स्वास्थ्य केन्द्र चलाने का नाटक शुरू कर दिया। जाहिर है कि जिस काम को करने की नीयत ही न हो तो उसके परिणाम भी निल बटा सन्नाटा ही होते हैं। भारी भरकम खर्चे के बावजूद गांव पाली में यही सब कुछ चल रहा है। डीजी अशोक सिंह व मंत्री मांडविया से अपेक्षा की जाती है कि वे मुख्यालय के कामचोरों से इस बाबत तहकीकात करेंगे।

अवसर का लाभ उठाते हुए मोदी ने अपनी राजनीतिक भड़ास निकालते हुए दिल्ली की केजरीवाल सरकार व बंगाल की ममता सरकार को भी कोसा। लगभग रोते हुए उन्होंने इन दोनों राज्यों के बुजुर्गों से माफी मांगते हुए कहा कि उन्हें ये दोनों सरकारें उनकी सेवा का मौका नहीं दे रही है, मानो यूपी, एमपी, हरियाणा, राजस्थान व गुजरात आदि में तो उन्होंने बुजुर्गों के वारे-न्यारे कर रखे हों। ये दोनों राज्य आयुष्मान योजना को अपने यहां लागू नहीं होने दे रहे। सर्वविदित है कि दिल्ली से बेहतरीन चिकित्सा सेवा किसी भी राज्य में सरकार द्वारा उपलब्ध नहीं कराई जा रही। बंगाल में भी तमाम भाजपा शासित राज्यों से बेहतर चिकित्सा सेवा उपलब्ध है।

मोदी की इस बात का केजरीवाल ने तुरन्त जवाब दिया कि दिल्ली में बुजुर्गो के इलाज की कोई सीमा निर्धारित ही नहीं है। किसी भी मरीज का पूर्ण इलाज मुफ्त किया जायेगा। बताते चले कि आयुष्मान में कहने को तो 5 लाख रुपये तक मुफ्त इलाज है लेकिन हर बीमारी का अधिकतम खर्च तय है, जैसे कैंसर के इलाज के लिए अधिकतम 90 हजार ही एक साल में खर्च होगा। दिल्ली में यह इलाज बिल्कुल मुफ्त होगा।

दरअसल आयुष्मान के नाम पर मोदी चिकित्सा सेवा नही बल्कि अपना प्रोपेगंडा चलाना चाहते हैं। इसके लिए योजना का 60 प्रतिशत केन्द्र व 40 प्रतिशत राज्य सरकार खर्च करते है। इसके तहत बनने वाले केन्द्रों पर आरोग्य मंदिर का फट्टा व मोदी के चित्र लगाना अनिवार्य होता है जिसका ये सरकारें विरोध करती हैं। आयुष्मान के नाम पर होने वाले अनंत घोटालों की एक बानगी पिछले दिनों ‘कैगÓ ने भी देश के सामने रखी थी। इसी कड़ी में हरियाणा का एक डाक्टर भी पांच लाख रुपये की रिश्वत लेता रंगे हाथों पकड़ा गया था।

मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भी मोदी का मंच सजाया गया
मंच पर फरीदाबाद के विधायक एवं कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल, पलवल के विधायक व राज्य मंत्री गौरव गौतम, स्थानीय विधायक धनेश अधलखा, सतीश फागना, बीमा आयुक्त रत्नेश गौतम तथा क्षेत्रीय निदेशक मुरलीधरन मौजूद थे। मंच पर इनकी मौजूदगी को तो किसी हद तक समझा जा सकता है, परन्तु भाजपा जि़लाध्यक्ष राजकुमार वोहरा तथा पूर्व मेयर सुमनबाला को मंच पर बैठाने का औचित्य समझ से बाहर है।

ध्यान रहे कि यह कोई भाजपा का कार्यक्रम नहीं था, यह विशुद्ध रूप से मज़दूरों के पैसों से चलने वाले कॉर्पोरेशन का कार्यक्रम था। बीमाकृत मज़दूरों के नाम पर अस्पताल के कुछ कर्मचारी बेशक इस कार्यक्रम में उपस्थित रहे होंगे वरना कहीं से भी बीमाकृत मज़दूरों को आमंत्रित नहीं किया गया था। मज़दूरों की बात तो छोडि़ए ट्रेड यूनियन नेताओं तक को भी आमंत्रित करने की कोई ज़रूरत नहीं समझी गई।

मज़दूर नेताओं के नाम पर केवल सदस्य केंद्रीय श्रमिक शिक्षा सलाहकार बोर्ड के कामरेड बेचू गिरि तथा हिन्द मज़दूर सभा के प्रांतीय अध्यक्ष एसडी त्यागी जरूर नज़र आए। इनके अतिरिक्त न तो कोई ट्रेड यूनियन नेता और न ही रीजनल बोर्ड के अन्य सदस्य नजर आए। हाल ही में बोर्ड के सदस्य बने वजीर सिंह डागर (एस्कॉर्ट यूनियन के पूर्व प्रधान) ने उन्हें आमंत्रित नहीं किए जाने का कड़ा नोटिस लेते हुए इसकी शिकायत श्रममंत्री को करने की बात कही है।

गौरतलब है कि कॉर्पोरेशन मुख्यालय की ओर से मेडिकल कमिश्नरों की फौज में से किसी को भी इस लायक नहीं समझा गया कि वे इस कार्यक्रम में कॉर्पोरेशन का प्रतिनिधित्व करें। समझा जा सकता है कि डीजी के साथ-साथ मंत्री ने भी इन खोटे सिक्कों को पहचान कर एक कोने में डाले रखना बेहतर समझा है। कार्यक्रम में दूसरी बड़ी अनुपस्थिति स्थानीय सांसद एवं केन्द्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर की समझी जा रही है। इससे पहले कभी ऐसा देखने में नहीं आया कि शहर में इतना बड़ा सरकारी कार्यक्रम हो और उसमें कृष्णपाल न पहुंचे। विदित है कि 12 फरवरी 2019 को इसी संस्थान में हुए ऐसे ही एक कार्यक्रम में कृष्णपाल और विपुल गोयल की उपस्थिति ने जि़ला प्रशासन की धड़कनें बढ़ा दी थीं। जिला उपायुक्त पूरे कार्यक्रम में चिंतित रहे कि न जाने कब ये दोनों मंत्री भिड़ जाएं।

मंच पर सजने के लिए तो उक्त तमाम नेतागण इस मौके पर भी आ धमके व पहले भी धमकते रहे हैं। लेकिन कभी भी किसी स्थानीय सत्तारूढ़ नेता ने संस्थान की समस्याओं को समझने व सुलझाने का कोई प्रयास नहीं किया। आज संस्थान को सबसे बड़ी आवश्यकता अतिरिक्त ज़मीन की है। जिस तरह से संस्थान की चिकित्सा सेवाओं के साथ-साथ मेडिकल शिक्षा का विस्तार हो रहा है, उसे देखते हुए इसे कम से कम 20 एकड़ अतिरिक्त ज़मीन की आवश्यकता है। आस-पास खाली पड़ी ज़मीन पर ये नेतागण झुग्गियां तो बसा सकते हैं लेकिन इस संस्थान को नहीं दे सकते। और तो और साथ लगते बीके अस्पताल को संस्थान से जोडऩे में कोई लम्बी चौड़ी दिक्कत न होने के बावजूद भी इसको जोड़ा नहीं जा रहा। इसके चलते संस्थान के छात्रों व डॉक्टरों को ढाई किलोमीटर का चक्कर काट कर बीके अस्पताल जाना पड़ता है।

नगर निगम संस्थान का नक्शा पास करने एवं एनओसी आदि देने के नाम पर पांच करोड़ तो वसूल चुका है और कई करोड़ की देनदारी इस पर निकाले बैठा है। इसके बदले एक बूंद पानी तक की सप्लाई निगम नहीं कर रहा। और तो और अपनी सीवर व्यवस्था भी संस्थान स्वत: ही मैनेज कर रहा है। यानी कि नगर निगम के पास इसे देने को तो कुछ है नहीं परन्तु लूटने के लिए नाखून पैनाए खड़ा है।

छात्रों के पाठ्यक्रम में पोस्टमार्टम भी एक विषय होता है जिसके लिए छात्रों को कई वर्षों तक बीके अस्पताल के चक्कर लगाने पड़े। बार-बार हरियाणा सरकार को समझाने के बाद अब कहीं जाकर इस संस्थान में कुछ शव पोस्टमार्टम के लिए आने लगे हैं। बीके अस्पताल में शव रखने की पर्याप्त जगह तक नहीं है, वहां 40-50 तक शव ठूंस दिए जाते हैं। कुछ समय पश्चात लावारिस शवों का सरकारी खर्च पर क्रियाकर्म आदि कराया जाता है। इसके विपरीत संस्थान को अध्ययन के लिए कलकत्ता तक से भी शव खरीद कर लाने पड़ते हैं क्योंकि देह दान से पर्याप्त शरीर नहीं मिल पाते।

हां, संस्थान पर फटीग लादने में कोई भी नेता पीछे रहना नहीं चाहता। शायद ही कोई दिन जाता होगा जब किसी नेता का सिफारशी फोन किसी को नौकरी लगवाने या अनाधिकृत रूप से इलाज करवाने या प्राइवेट अस्पताल में रेफर करवाने के लिये न आता हो। कोरोना के दौरान दो वर्ष तक तो इन नेताओं व जिला प्रशासन ने इस अस्पताल पर जम कर बवाल काटा था। बीमाकृत मज़दूरों को सेवाओं से पूरी तरह वंचित करते हुए पूरे अस्पताल पर कब्जा कर लिया था। इस दौरान प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से अस्पताल के बेड बेचने का धंधा पूरे जोर से चलाया गया था।

डीन डॉ. एके पाण्डे ने संस्थान की प्रगति रिपोर्ट पेश की
संस्थान के डीन डॉ. अनिल कुमार पाण्डे ने बीते नौ साल का इतिहास बताते हुए संस्थान की प्रगति रिपोर्ट पेश की। दरअसल यह रिपोर्ट आंशिक थी क्योंकि इसका इतिहास 2012 से उस वक्त शुरू हो जाता है जब डॉ. असीम दास को यहां बतौर डीन नियुक्त किया गया था।

केन्द्रीय श्रम मंत्री मांडविया की तर्ज पर डॉ. दास ने भरसक प्रयास किया था कि 2013 में मेडिकल कॉलेज का पहला बैच दाखिला ले ले। लेकिन मुख्यालय में बैठे कामचोर निकम्मे जनविरोधी अफसरों ने 2013 तो क्या 2014 में भी कॉलेज को शुरू नहीं होने दिया। और तो और 2015 में भी दाखिला रोके रखने का भरसक प्रयास करते हुए एमसीआई (मेडिकल कॉउंसिल ऑफ इंडिया) को बैरंग लौटा दिया। मामला केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के हाथ से भी निकल चुकने के बावजूद भी डॉ. असीम दास ने घुटने नहीं टेके। उन्होंने तत्कालीन केन्द्रीय श्रममंत्री बंडारू दत्तात्रेय से मुलाकात करके उन्हें स्थिति से अवगत कराया। खुशकिस्मती से उस समय दीपक कुमार अतिरिक्त सचिव थे जो कुछ समय पश्चात ही कॉर्पोरेशन के डीजी नियुक्त हो गए। मंत्री दत्तात्रेय तथा डीजी ने डॉ. दास की बात को गम्भीरता से लेते हुए मुख्यालय के हरामखोरों से पूछा कि जब डीन कॉलेज चलाने में सक्षम हैं तो तुम्हें क्या तकली$फ है? इसका उनके पास कोई जवाब नहीं था। मामला क्योंकि स्वास्थ मंत्रालय के हाथों से भी निकल चुका था इसलिए डीजी को सुप्रीम कोर्ट जाकर कॉलेज चलाने की स्वीकृति लेनी पड़ी, तब कहीं जाकर 2015 में पहले बैच का दाखिला शुरू हो पाया।

गौरतलब है कि इस दौरान मुख्यालय ने इस बने-बनाए संस्थान को कॉर्पोरेट के हाथों बेचने, यहां तक कि हरियाणा सरकार को मुफ्त में दान देने तक की कोशिश की थी। सभी प्रयास विफल होने पर, मजबूरन यह संस्थान मुख्यालय को चलाना पड़ा।

डॉ. दास यहीं रुकने वाले नहीं थे। वे अस्पताल को नई बुलंदियों की ओर ले जाने में जुटे रहे। उनके पैरों में बेडिय़ां डाले रखने के लिए मुख्यालय ने तमाम वित्तीय शक्तियां एमएस (चिकित्सा अधीक्षक) को दे रखी थी और इस पद पर अपने वफादार जीडीएमओ को नियुक्त करता था। एमसीआई नियमों के अनुसार किसी भी मेडिकल कॉलेज का एमएस जीडीएमओ की बजाय प्रोफेसर स्तर का होना चाहिए। संस्थान पर अपना कब्जा जमाए रखने के लिए मुख्यालय कई वर्षों तक इस नियम की भी उल्लंघना करता रहा।

वित्तीय शक्तियों के अभाव में डीन संस्थान के लिए कोई भी जरूरी उपकरण एवं अन्य सामग्रियां आदि खरीद पाने में असमर्थ थे। लेकिन कुछ समय बाद तत्कालीन मंत्री दत्तात्रेय व डीजी दीपक कुमार को यह समस्या समझ में आ गई तो वित्तीय शक्तियां एमएस की बजाय डीन को दे दी गईं। इसके बाद चिकित्सा सेवा में का$फी सुधार होने लगा।

अस्पताल की सेवाओं को संकुचित एवं बर्बाद करने के लिए डीन के विरोध के बावजूद मुख्यालय ने 30 बेड का आईसीयू तथा डॉयलिसिस का काम ठेके पर दे दिया। समझा जा सकता है कि कोई भी ठेकेदार केवल मुनाफे के लिए ही काम करता है और इसके लिए उसे तय मानकों का उल्लंघन करना जरूरी होता है। लेकिन जब डॉ. दास ने मानकों के अनुसार काम चाहा तो दोनों ठेकेदार काम छोड़कर भाग गए। मुख्याल में बैठे नालायक तो पूरा रेडियोलॉली विभाग भी ठेके पर ही देना चाहते थे, लेकिन इसके लिए जब कोई ठेकेदार नहीं मिला तो मजबूरन रो-पीट कर 2018 में एमआरआई, सीटी स्कैन व अन्य कई उपकरण खरीदने की मंज़ूरी मुख्यालय से मिल पाई थी। आज स्थिति यह है कि मानेसर-गुडग़ांव की तो बात ही क्या, दिल्ली के बसई दारापुर स्थित मेडिकल कॉलेज व दिल्ली के अन्य अस्पतालों तथा नोएडा तक के अस्पतालों से मरीजों को यहां भेजा जा रहा है। इसके चलते मरीज़ों को कई-कई महीनों की तारीख दी जा रही है।

मुख्यालय जहां एक ओर रे$फरल घटाने की बात करता है वहीं संस्थान को आवश्यक सुविधाएं देने से भी बचता है। इस संस्थान में प्रतिदिन 70-80 डायलिसिस होने के बावजूद एक भी टेक्नीशियन कई वर्षों तक नहीं दिया गया। हृदय रोगियों का रे$फरल रोकने के लिए डॉ. दास की कैथ लैब की मांग अनसुनी कर दी गई तो डॉक्टर दास ने बड़ी मुश्किल से इसका जुगाड़ कर सके, लेकिन एक भी टेक्नीशियन मुख्यालय ने नहीं दिया। इसी तरह (बीएमटी) बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन के लिए भी मुख्यालय ने अतिरिक्त आवश्यक स्टा$फ देने से भी मना कर दिया। कुल मिला कर मुख्यालय की बेरुखी तथा काम में रोड़े अटकाने की नीति के बावजूद यहां किडनी ट्रांसप्लांट, हृदय के वॉल्व बदलने तथा बड़ी संख्या में एंजियोप्लास्टी, आंख का कॉर्निया लगाने जैसे अनेकों सुपर स्पेशलिटी ट्रीटमेंट यहां होने लगे।

मात्र 510 बिस्तरों के लिए बने इस अस्पताल में कभी-कभी तो 1000 तक भी मरीज़ दाखिल रह जाते हैं, 800-900 मरीज़ दाखिल रहना तो आम बात है। जाहिर है जब काम इतना बढ़ रहा हो तो काम करने वाले स्टा$फ की कमी तो खलेगी ही। जब भी मुख्यालय से काम के अनुरूप स्टाफ की मांग की जाती तो हमेशा थोथे आश्वासन ही मिलते रहे। यह तो भला हो कि केन्द्रीय श्रम मंत्री मांडविया का जो उन्होंने कार्यभार सम्भालते ही इस संस्थान का औचक दौरा कर डाला। ओपीडी में प्रतिदिन आने वाले 4000 मरीजों की भीड़ तथा दवा वितरण काउंटरों सहित हर विभाग में भारी भीड़ को देख कर वे हत्प्रभ रह गए। उन्होंने तुरन्त ही नवनियुक्त डीजी अशोक सिंह को भी संस्थान की समस्याओं को देखने व समझने के लिए भेजा। उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि संस्थान बीते दो-तीन साल से अतिरिक्त स्टा$फ की मांग कर रहा है जिस पर मुख्यालय कुंडली मारे बैठा है।

डीजी के हड़काने पर मुख्यालय ने कैथलैब, डॉयलिसिस, बीएमटी तथा हर तरह के ऑपरेशन थियेटर टेक्नीशियनों के पद स्वीकृत कर दिए। इनके अतिरिक्त 200 नर्सिंग स्टा$फ तथा 100 नर्सिंग अर्दली के पद भी स्वीकृत कर दिए गए। इनके अतिरिक्त अभी बड़ी संख्या में अन्य पैरामेडिकल स्टा$फ व डॉक्टरों के पद भी स्वीकृत होने की राह पर है।

संस्थान के विकास एवं बेहतर चिकित्सा सेवा देने के लिए डॉ. दास ने पीजी यानी एमबीबीएस के बाद की पढ़ाई का कार्यक्रम शुरू कराया। इसके चलते आज संस्थान में सभी 18 विषयों में हर साल 85 छात्र दाखिला लेते हैं वर्तमान में 170 छात्र पीजी कर रहे हैं। बेशक ये पीजी के छात्र तो होते हैं लेकिन डॉक्टरी भी पूरी करते हैं। इन्हें एक प्रकार से अस्पताल की रीढ़ समझा जाता है। पीजी छात्रों की भर्ती के अनुपात में नियमानुसार एक विशेष संख्या में प्रोफेसरों व एसोसिएट प्रोफेसरों का होना अनिवार्य होता है। इस अनिवार्यता को पूरा करने में मुख्यालय ने हमेशा रोड़े अटकाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। पीजी के बाद सुपरस्पेशलिटी के लिए डीएम और एमसीएच कोर्स शुरू करने का प्रस्ताव डॉ. दास ने मुख्यालय को भेजा तो उसमें भी अड़ंगेबाज़ी की गई। इन कोर्सों के लिए हर विषय मेें एक प्रोफेसर, एक एसोसिएट प्रोफेसर तथा असिस्टेंट प्रोफेसर का होना जरूरी होता है।

यह तीनों मिलकर अधिक से अधिक पांच छात्रों को ले सकते हैं। यह एनएमसी की अनिवार्य शर्त है लेकिन मुख्यालय में बैठे मूर्ख कहते थे कि फिलहाल एक असिस्टेंट प्रोफेसर से काम शुरू कर लो बाकी फिर देख लेंगे। कुल मिलाकर डीन का अधिकतर समय इन मूर्खों को ट्यूशन पढ़ाने में ही व्यर्थ हो जाता था, उसके बाद भी चिकने घड़े पर कोई असर नहीं होता था। इन हालात में जैसे-तैसे श्रममंत्री, श्रम सचिव तथा डीजी की सहायता से ये शर्तें पूरी करा कर उक्त कोर्स शुरू कराए गए। आज यहां तीन विषयों में डीएम व तीन विषयों में एमसीएच के कोर्स जारी हैं।

इतने छोटे समय में इतनी बड़ी उपलब्धियां हासिल करने वाला हरियाणा का यह इकलौता संस्थान है। बीजेपी सरकार द्वारा चलाए जा रहे मेवात, खानपुर व करनाल में चलाए के मेडिकल कॉलेजों में अभी तक क्लीनिकल विषयों पीजी शुरू नहीं हो पाई है। एमबीबीएस कोर्स के परिणाम भी सबसे श्रेष्ठ इसी संस्थान के होते हैं। इसके चलते हर मेडिकल छात्र की पहली पसंद यह संस्थान बना हुआ है। कार्यकुशलता एवं दक्षता में हरियाणा का सबसे पुराना व बड़ा मेडिकल कॉलज भी इसके सामने कहीं नहीं ठहरता।

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Mazdoor Morcha
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