मज़दूर मोर्चा ब्यूरो जुमलेबाज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दस साल पहले शुरू किया गया स्किल इंडिया मिशन पूरे देश में बुरी तरह फ्लॉप हो गया। इसकी पुष्टि हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा देश भर के औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) में 4 लाख 49 हजार सीटों की संबंद्धता समाप्त किए जाने के फैसले होती है। ये सीटें 2018 से खाली थीं, यानी मोदी के स्किल इंडिया मिशन के खूब ढिंढोरा पीटे जाने के बाद भी युवा पीढ़ी आईटीआई में कदम नहीं रख रही है। हरियाणा में भी आईटीआई की 705 सीटें समाप्त कर दी गई हैं। यह तो होना ही था क्योंकि कौशल विकास का ढिंढोरा तो खूब पीटा गया लेकिन आईटीआई में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम समय और उद्योग की जरूरत के हिसाब से अपग्रेड नहीं किए गए। जहां उद्योगों में अधिकतर तकनीकी काम हाथ की जगह मशीनों से होने लगे हैं, वहीं आईटीआई में आज तक हाथ से काम करने की पुरानी तकनीकों का ही प्रशिक्षण दिया जा रहा है। उदाहरण के लिए उसे लेथ मशीन, टूल मशीनें चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है लेकिन उद्योगों में लेथ मशीनों की जगह सीएनसी (कंप्यूटर न्यूमेरिकल कंट्रोल) मशीनें इस्तेमाल होने लगी हैंं, आईटीआई में इन मशीनों का प्रशिक्षण कम से कम हरियाणा में तो नहीं दिया जाता और देश में कहीं इक्का दुक्का जगह होगा वह नाकाफी है। क्योंकि इस तरह का प्रशिक्षण देने वाले ट्रेनर तो भरती क्या करने थे, सेवानिवृत्ति के बाद खाली पद भी नहीं भरे गए। ऐसे में कोई इन संस्थानों में दाखिला लेकर करे भी तो क्या। यही हालत अन्य ट्रेडों की भी है।
केवल पाठ्यक्रम को ही नही अपडेट किया गया, बदलती तकनीक और उद्योगों की जरूरत के आधार पर नए ट्रेड भी पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किए गए। एआई और रोबोटिक्स के युग में पुराने कोर्स से छात्रों को रोजगार मिलने से रहे, तो युवाओं ने भी प्रवेश लेना छोड़ दिया। दरअसल, सिर्फ ढिंढोरा पीटने से रोजगार के अवसर पैदा नहीं होते, इसके लिए उद्योगों की मांग के अनुरूप कौशल विकास के कार्यक्रम विकसित किए जाते हैं जिस पर मोदी-खट्टर-सैनी सरकारों ने कभी कोई ध्यान नहीं दिया। जिसके परिणामस्वरूप उद्योग कुशल कामगारों से वंचित रह गए और अकुशल युवा रोजगार से वंचित रह गया। इधर मोदी के नेतृत्व में डबल इंजन सरकारें कौशल विकास का राग अलापती रहीं, उधर देश में बेरोजगारों की संख्या लगातार बढ़ती चली गई।
बीते लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बेरोजगारी के मुद्दे ने मोदी और भाजपाइयों को हलकान किया था। चुनाव जीतने के बाद निश्चिंत मोदी-सैनी सरकारों ने रोजगार के नाम पर एक बार फिर युवाओं को मूर्ख बनाने की तरकीबों पर काम शुरू कर दिया है। पूर्व सीएम खट्टर ने दो साल पहले राज्य में गुरु-शिष्य कौशल सम्मान योजना शुरू करने का पाखंड किया था। गोदी मीडिया ने भी इसकी खूब तारीफें की लेकिन यह योजना घोषणा तक ही सीमित रही। अब सैनी सरकार इसे फिर से झाड़ पोंछ कर बाहर लाने का नाटक कर रही है। बताया जा रहा है कि इस योजना के तहत 75 हजार युवाओं को कुशल बनाया जाएगा। नाटक इसलिए कि एक तो सरकार ने अभी तक इसके लिए कोई बजट ही निर्धारित नहीं किया है, दो सौ करोड़ रुपये खर्च किए जाने का हवा-हवाई दावा ही किया जा रहा है, दूसरे प्रदेश के सभी आईटीआई में 705 सीटें समाप्त कर दी गई हैं, जो सीटें बची हैं वह इतनी नहीं हैं कि 75 हजार युवाओं को प्रशिक्षण दिया जा सकेगा। पलवल के दुधौला में 2016 में स्थापित देश के पहले कौशल विश्वविद्यालय का क्या हाल है देखा, समझा जा सकता है। सरकार कह रही है कि कौशल विश्वविद्यालय के साथ मिलकर 75 हजार युवाओं को कुशल बनाया जाएगा।
विश्वविद्यालय को बने नौ साल हो चुके हैं इस दौरान उसे नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क नाम की किसी संस्था ने स्किल यूनिवर्सिटी कैटेगरी में देश में दूसरा स्थान भी दे दिया लेकिन आज तक इस विश्वविद्यालय के प्रबंधन द्वारा अपनी उपलब्धियां नहीं बताई गईं कि बीते नौ साल में उसने कितनों को कौशल प्रशिक्षण दिया और उनमें से कितने रोजगार पाने में सफल रहे। जानकारों की मानें तो इस विश्वविद्यालय की उपलब्धि केवल संघ भाजपा के चहेतों को शिक्षक और प्रबंधन में रोजगार देने से ज्यादा कुछ नहीं है। यदि सैनी सरकार दो सौ करोड़ खर्च करने का दावा कर रही है तो युवाओं मे कौशल विकास और प्रशिक्षण के नाम पर इस धन की संघी-भाजपाइयों के बीच बंदरबांट होने वाली है। युवा तो जिस तरह बीते दस साल से कौशल विकास के नाम पर रोजगार को भटक रहा है आगे भी भटकता रहेगा।
संदर्भवश सुधी पाठकों को बताते चले कि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सुशील कुमार तोमर संघ-भाजपा के करीबी हैं और संघ का अनुषांगिक संगठन कहे जाने वाले विज्ञान भारती से जुड़े होने का उन्हें यह ईनाम मिला है, इससे पहले उन्हें वाईएमसीए यूनिवर्सिटी फरीदाबाद का कुलपति भी बनाया जा चुका है। विश्वविद्यालय की कुलसचिव प्रो. ज्योति राणा, अकादमिक अधिष्ठाता आर एस राठौड़, डीन प्रो. आशीष श्रीवास्तव, प्रो. सुरेश कुमार, प्रो. एक के वाटल, प्रो. कुलवंत सिंह और प्रो. ऊषा बत्रा को भी संघी-भाजपा सरकार प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से लेकर आई है।
विश्वविद्यालय शुरू तो 2016 में हुआ था, इस आधार पर यदि स्नातक प्रशिक्षण भी माना जाए तो 2019-20 में पहला सफल बैच बाहर आ जाना चाहिए लेकिन विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर न तो किसी बैच की सफलता का जिक्र है न ही कहीं यह दर्शाया गया है कि प्रशिक्षण पाने वाले कितने लोगों की अच्छी नौकरी लगी या उन्होंने कहीं कोई सफल स्व रोजगार शुरू किया है। न्यूज एंड इवेंट सेक्शन में भी 2023 से पहले की कोई जानकारी नहीं है। इनमें भी जो जानकारी है उसमें किसी भी प्लेसमेंट कार्निवाल या ऑन कैंपस सिलेक्शन इवेंट का कोई जिक्र नहीं है, इससे समझा जा सकता है कि मोदी की स्किल यूनिवर्सिटी का रोजगार दिलाने में अभी तक क्या योगदान रहा है। युवाओं को प्रशिक्षण भले ही नहीं दिया जा रहा है लेकिन यहां पीएचडी ही कराई जा रही है, इस पीएचडी का उद्योगों में कितना इस्तेमाल होगा यह भी नहीं बताया जा सकता। बहरहाल संघियों को बढिय़ा रोजी रोजगार देने का यह एक उत्तम स्थान बन चुका है।