मोदी की कामयाबी के लिए कांग्रेस भी कम दोषी नहीं है

मोदी की कामयाबी के लिए कांग्रेस भी कम दोषी नहीं है
November 10 17:53 2025

वर्ष 1947 में देश की जनता ने भारी-भरकम बहुमत के साथ कांग्रेस को सत्ता सौंपी थी। उस वक्त भारतीय जनता पार्टी अथवा जनसंघ नाम की कोई चिडिय़ा देश में उपस्थित नहीं थी। हां, इनकी पितृ संगठन आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ)जरूर उस वक्त 22 वर्ष का हो चुकने के बावजूद देश भर में अछूत समझा जाता था। इसे हेय दृष्टि से देखा जाता था क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इनकी भूमिका तमाम जन आंंदोलनों के विरुद्ध तथा अंग्रेज सरकार के समर्थन में रहती थी। अंग्रेज सरकार कभी नहीं चाहती थी कि देश के हिन्दू-मुस्लिम, सिख-ईसाई, सब एकताबद्ध होकर उनके खिलाफ संघर्ष करें। जाहिर है इसके लिए धार्मिक फूट डालना जरूरी था। इसी उद्देश्य से आरएसएस ने हिन्दू राष्ट्र स्थापित करने का लक्ष्य रखते हुए मुसलमानों को अपना शत्रु घोषित कर रखा था।

सत्तारूढ़ होने के बाद कांग्रेस के नेता लगातार पतन की ओर बढऩे लगे। चुनावी धांधलियां राजनीतिक भ्रष्टाचार व हर तरह की लूट में पारंगत हो चुके कांग्रेसी नेतृत्व लगातार जनता की निगाहों से दूर होने लगा। दूसरी ओर आरएसएस व उसके द्वारा खड़ी की गई जनसंघ जो बाद में भाजपा बनी। लगातार कांग्रेस की खामियों का लाभ उठाने की योजना बनाते रहे। इसके लिए इन लोगों ने धरातल पर जाकर शाखाएं लगाना, सरस्वती शिशु मंदिर जैसे स्कूलों की स्थापना करना तथा दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों में प्रचार का काम पूरे जोर-शोर से जारी रखा। हर तरह का प्रोपेगेेंडा करने, अफवाह फैलाने व झूठ को सच साबित करने में माहिर संघियों ने अपने पैठ काफी गहरे तक जमा ली। वर्तमान में संघ एक सौ मुंहे सांप जैसे अवैध संगठन का रूप ले चुका है जिसका एक मुंह कांग्रेस में भी खुलता है। उधर कांग्रेसी, संघ के बढ़ते जनाधार तथा कुटिल रणनीतिक चालों से बेखबर सत्ता की मदहोशी में अपनी लूट-मार का कार्यक्रम चलाते रहे।

अंतत: बार-बार उतार-चढ़ाव देखने के बावजूद कांग्रेस अपने चरित्र में कोई मौलिक सुधार नहीं कर पाई क्योंकि पूंजीवादी व्यवस्था में यह सम्भव भी नहीं था। परिणामस्वरूप 2014 में भाजपा पूरी ताकत के साथ सत्तारूढ़ हो गई। कांग्रेस के तमाम किले एक के बाद एक धराशाही होने लगे। इसके बावजूद भी इनकी कार्यशैली में कोई सुधार होता नजर नहीं आया। अपने कमजोर संगठन के चलते, कांग्रेस चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की उस प्रक्रिया का वांछित विरोध भी नहीं कर सकी जो पूरी तरह मोदी सरकार ने हथिया लिया था। विरोध के नाम पर कांग्रेस केवल उस सुप्रीम कोर्ट में गिड़गिड़ा कर रह गई जो पहले से ही मोदी के चरणों में लमलेट थी। यदि उस समय कांग्रेस में दम होता और अन्य विपक्षी दलों को जोड़ कर सड़कों पर उतर आते तो आज के चुनाव आयोग का यह रूप न होता। इतना भुगतने के बाद अब लगता है कि कांग्रेस को कुछ समझ आई है जो उसने न्यायपालिका के सामने गिड़गिड़ाने की बजाय ‘सार्वजनिक भांडा फोड़’ का रुख किया है।

जन आंदोलनों के लिए जो संगठन होना चाहिए उसका कांग्रेस में नितांत अभाव है। बीते करीब 10 वर्षों से हरियाणा कांग्रेस बिना संगठन के ही घिसटती रही। जब भी संगठन खड़ा करने का प्रयास किया गया तभी नेताओं के बीच आपसी जूतम-पैजार खुल कर नजर आने लगी जो आज भी मौजूद है। लगभग सभी नेता उस बिल्ली की तरह ताक रहे हैं जो छंींका टूटने के इंतजार में बैठी है। कोई भी नेता धरातल पर उतर कर जनता के लिए कोई ठोस काम करने की नहीं सोच रहा। उनकी नजर तो सत्ता से उपजने वाली मलाई की ओर है।

कांग्रेसी नेताओं को यह भी मुगालता है कि भाजपाई कुशासन एवं लूट-मार से दुखी जनता स्वत: कांग्रेसियों को सत्तारूढ़ कर देगी। यह ठीक है कि जनता भाजपाई राज से त्रस्त तो है, इसके लिए वह कांग्रेसियों को वोट तो दे सकती है लेकिन उनके लिए सड़कों पर उतर कर भाजपा सरकार से लडऩे का जज्बा नहीं रखती। दुखी जनता यह भी कहने से गुरेज नहीं करती कि वे कौनसे इनसे भले होंगे। एक पुरानी कहावत भी है कि कोउ नृप होई हमहि का हानि। यानी कोई राजा हो जाए हमें तो लुटना ही है, भेड़ के ऊपर से हरेक ने ऊन ही उतारनी है।

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Mazdoor Morcha
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