मौजूदा मेडिकल कॉलेज अस्पताल को मात्र 510 बिस्तरों का बनाया गया था। संख्या का यह आधार पुराने अस्पताल के 200 बिस्तरों को देख कर तय किया गया था। चिकित्सा सेवाओं के अभाव में इन 200 बिस्तरों में से भी आधे खाली ही रहते थे। इसके विपरीत नई ईमारत में बेहतर सेवाओं के चलते 510 बेड भी कम पडऩे लगे। नियमों को ताक पर रखते हुए अतिरिक्त बेड लगा-लगा कर 900 और कभी-कभी तो यह संख्या 1000 तक भी पहुंच जाती है। ओपीडी में प्रतिदिन 1500 मरीज़ों के आने का अनुमान लगाया गया था, इसके विपरीत यह संख्या 4000-4500 तक पहुंच चुकी है।
जाहिर है कि इसके पीछे संस्थान द्वारा दी जा रही बेहतर सेवायें ही है। आरम्भ में किसी ने कल्पना तक नहीं की थी कि यहां पर हृदय रोगों का ईलाज एम्स के स्तर पर भी हो सकेगा। ऐसे ही बोनमेरो ट्रांसप्लांटेशन, किडनी ट्रांसप्लांटेशन, आंख का कॉर्निया तक भी यहां बदला जा सकेगा। ऐसे ही अनेकों सुपर स्पेशलिटी सेवायें इस संस्थान द्वारा मज़दूरों को दी जा रही हैं। न केवल पूरे हरियाणा बल्कि दिल्ली व नोएडा तक के मरीजों को भेज कर कॉर्पोरेशन द्वारा भीड़ तो यहां बढ़ाई जा रही है लेकिन इस भीड़ को निपटाने यानी कि बेहतर सेवायें देने के लिये आवश्यक स्टाफ, मुख्यालय द्वारा उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है।
बीते करीब तीन-चार सालों से संस्थान द्वारा लगातार अतिरिक्त स्टाफ की मांग की जा रही है। लेकिन मुख्यालय में बैठे मज़दूर विरोधी कमिश्नरों की पलटन द्वारा नित नये-नये बहाने बनाकर इसे टाला जा रहा है। उन्हें इस बात से कोई आश्चर्य नहीं होता कि मात्र नौ पैरा मेडिकल स्टाफ द्वारा प्रति दिन 70-80 डायलिसिस करने के साथ-साथ आईसीयू के मरीज़ों को भी सम्भाला जाता है। कैथलैब व बोनमेरो ट्रांसप्लांटेशन बिना टेक्निशियनों के कैसे चल रहे हैं?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार 800 नर्सिंग स्टाफ की जगह मात्र 400 तथा 600 अन्य पैरामेडिकल स्टाफ की जगह मात्र 200 से ही काम चलाया जा रहा है। 50 क्लर्कों का काम भी उन हाउस कीपिंग व अन्य हास्पिटल स्टाफ से लिया जा रहा है जो मरीज़ों की सेवा के लिये रखा गया है। इसके अलावा 53 डॉक्टरों की भी कमी बताई गई है। बीते करीब छ: माह से लगातार उक्त मांगों के लिये मुख्यालय से पत्राचार चल रहा है। अब एक मजेदार बात यह सुनने में आई है कि अभी तक इस कमी के बावजूद जब अस्पताल चल रहा है तो इस पर 250 करोड़ अतिरिक्त खर्च करने की क्या आवश्यकता है? इस तरह का बेहूदा प्रश्न उठाने वाली उस मेडिकल कमिश्नर (वित्त) को कोई यह समझाए कि 600 करोड़ वार्षिक खर्च उठाने वाला यह मेडिकल कॉलेज अस्पताल नहीं बना था तब भी तो लोग जैसे-तैसे काम चला ही रहे थे न। मज़दूरों की बढ़ती संख्या से अरबों रुपयों की वसूली करना तो इन्हें बहुत भाता है लेकिन उन पर खर्च करते वक्त इनकी जान निकलती है। उक्त बेहूदा प्रश्न खड़ा करने वाली उस मूर्ख आयुक्त को किसी दिन स्वयं आकर अस्पताल में मरीजों की हो रही दुर्गति देखनी चाहिये। लम्बी-लम्बी लाइनें, घंटों का इंतजार तथा एक दिन में हो सकने वाले काम के लिये मरीजों को कई-कई चक्कर लगाने पड़ते हैं। कोढ़ में खाज का काम मुख्यालय द्वारा थोपा गया ऑनलाइन सिस्टम कर रहा है। डॉक्टर द्वारा लिखी जाने वाली दवाई को ऑनलाइन किया जाता है। इसके लिये पर्याप्त स्टाफ न होने के चलते लम्बी-लम्बी लाइनें लगी रहती हैं। इस काम के लिये बैठाये गये डाटा ऑपरेटर पूर्ण शिक्षित न होने के चलते कई गलतियां कर बैठते हैं। इसके बाद दवा लेने के लिये मरीज़ को फार्मेसी काउंटर पर जाना होता है। भारी भीड़ के चलते घंटों बाद जब वह फार्मासिस्ट तक पहुंचता है तो उसे बताया जाता है कि कुछ दवाइयां तो ऑनलाइन हुई ही नहीं हैं। इसके लिये उसे फिर से डाटा ऑपरेटर की लाइन में लगना पड़ता है। गजब तो तब होता है जब ऑनलाइन सिस्टम ठप्प हो जाता है। कई बार तो यह समस्या कई-कई घंटों के लिये हो जाती है। ऐसे में डाटा ऑपरेटर व फार्मासिस्ट दोनों के काम ठप्प हो जाते हैं और मरीजों की भीड़ हंगामे पर उतारू हो जाती है। हंगामा होता है तो भुगतना डीन और मेडिकल सुपरिंटेंडेंट एमएस को पड़ता है। इससे बचने का उपाय ऑफ लाइन है तो सही, लेकिन इस पर मुख्यालय ने सख्ती से रोक लगा रखी है। यानी कि मरीज़ हंगामा करते हैं तो करें, मुख्यालय की बला से।
संदर्भवश देश भर में कॉपोरेशन द्वारा चलाये जा रहे अस्पतालों में केवल 38 प्रतिशत बिस्तरों पर ही मरीज़ होते हैं, शेष 62 प्रतिशत खाली ही रहते हैं। दिल्ली के बसई दारापुर स्थित मेडिकल कॉलेज में 1000 बिस्तरों की जगह है। इनमें से 400 को तो स्थायी रूप से बंद कर रखा है तथा जो 600 बेड चालू हैं उनमें से भी केवल आधे ही भरे रहते हैं। इससे यह नहीं समझ लेना चाहिये कि लोग बीमार नहीं होते, उन्हें बिस्तरों की जरूरत नहीं हैं। हकीकत यह है कि इन अस्पतालों में आने वाले मरीजों को उचित एवं पर्याप्त इलाज उपलब्ध कराने की बजाय उन्हें इधर-उधर दौड़ाया जाता है। थक हार कर मज़दूर अपना इलाज अपने खर्चे पर प्राइवेट डॉक्टरों से ही करा लेते हैं।
गुडग़ांव, दिल्ली व नोएडा से सैंकडों मरीजों को फरीदाबाद केवल इसलिये धकेल दिया जाता है कि वहां आवश्यक उपकरण व अन्य साज़ो-सामान नहीं होते। क्यों नहीं होते? क्योंकि इन पर होने वाले खर्च को बचाया जाता है और वह बच भी रहा है। मुख्यालय एक ओर तो रेफरल घटाने की बात करता है और दूसरी ओर आवश्यक दवाओं व साजो-सामान की आपूर्ति भी अस्पतालों को नहीं करता। यहां रेफरल से अभिप्राय मरीजों को निजी अस्पतालों को रे$फर करना है जिस पर कॉर्पोरेशन सैंकड़ों करोड़ प्रति वर्ष खर्च करता है। उस खर्च को बचाने के लिये मुख्यालय चाहता है कि मरीजों को सरकारी अस्पतालों में रेफर किया जाय। समझने वाली बात यह है कि सरकारी अस्पतालों में तो कोई भी आदमी बिना ईएसआई द्वारा भी जा सकता है। मज़दूर अपने वेतन से अंशदान सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने को नहीं देता। कॉर्पोरेशन द्वारा अंशदान वसूलने के बाद उसका दायित्व बन जाता है कि वह उसका उचित एवं पूरा इलाज कराए। अस्पताल में दवाओं व अन्य सामान का संकट इसलिये भी बना रहता है कि मुख्यालय द्वारा रेट कॉन्टेक्ट (आरसी) द्वारा की जाने वाली खरीदारी के भरोसे अस्पताल नहीं चलाया जा सकता। इसके लिये सदैव लोकल परचेज़ का सहारा लिया जाता है। इस माध्यम से की जाने वाली खरीदारी के रेट भी पहले से ही मंजूरशुदा होते हैं। इसके बावजूद भी मुख्यालय ने यहां की लोकल परचेज़ पर सख्त पाबंदी लगा रखी है। इसका अत्यधिक दुष्प्रभाव कैंसर व ऐसी ही अन्य बीमारियों के मरीज़ों पर पड़ता है। इनकी दवाएं बहुत महंगी होने के कारण कॉर्पोरेशन चाहता है कि इन मरीज़ों को आंय-बांय-शांय करके टरका दिया जाए।
फैकल्टी का संकट किसी भी मेडिकल संस्थान को ऊंचाइयों पर ले जाने में वहां कार्यरत फैकल्टी (पढ़ाने व सिखाने) वाले प्रोफेसरों की भूमिका अति महत्वपूर्ण होती है। इसलिये हर संस्थान बेहतर से बेहतरीन फैकल्टी अपने यहां रखना चाहता है। इसके लिये फैकल्टी को इतनी बेहतरीन सुविधाएं व वेतनमान दिये जाते हैं कि वे संस्थान को छोड़कर अन्यत्र कहीं जाने की न सोचें। परन्तु यह सब तो वे लोग सोच सकते हैं जिन्होंने कभी मेडिकल कॉलेजों में काम किया हो। डिस्पेंसरी स्तर के डॉक्टर भला ये कैसे समझ सकते हैं? दुर्भाग्य से मुख्यालय में बैठे तमाम कमिश्नर डिस्पेंसरी स्तर के होने के बावजूद देश भर के 10-12 मेडिकल कॉलेजों को चलाने के नाम पर बर्बाद कर रहे हैं।
पढऩे व पढ़ाने वाले डॉक्टर (प्रोफेसर) आमतौर पर संस्थान बदलते नहीं हैं। सरकार इनके तबादले भी नहीं करती है। इन्हें भर्ती करते समय ही पूछ लिया जाता है कि वे कहां काम करना चाहते हैं; उसी के अनुसार उन्हें भर्ती करके तैनाती की जाती है। कॉर्पोरेशन में भर्ती व पदोन्नति के जो कायदे कानून हैं वे केंद्र सरकार के नियमों से इस कदर हट कर हैं कि लंबे समय तक एडिय़ां रगडऩे के बाद भी उचित पदोन्नति नहीं मिलती। इसके विपरीत यहां तैनात फैकल्टी वालों को अन्य संस्थानों की तरह बेहतरीन सुविधाएं व वेतनमान देना तो दूर, तबादलेबाजी का खेल उनके साथ खेला जाता है। इसके चलते यहां तैनात फैकल्टी के लोग केवल तब तक ही यहां रहते हैं जब तक उन्हें कोई बेहतर तैनाती न मिल जाये।
काम चलाने के लिये योग्य डॉक्टरों को ठेके पर भर्ती कर लिया जाता है। समय आने पर साक्षात्कार एवं योग्यता के आधार पर उन्हें अस्स्टिेंट प्रोफेसर की नियुक्ति दी जाती है। ऐसे ही दो डॉक्टरों को आंखें वाले विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के लिये सेलेक्ट कर लिया गया था। लेकिन उन्हें यहीं पर तैनाती देने की अपेक्षा हैदराबाद व अलवर में तैनाती के आदेश दे दिये गये। मजे की बात तो यह है कि उनके रिक्त स्थानों पर किसी को नियुक्त नहीं किया गया। बताया जाता है कि जिन्हें यहां के लिये सेलेक्ट किया गया है, उन्होंने यहां आने से इनकार कर दिया है। अब सवाल यह पैदा होता है कि यदि ये दोनों डॉक्टर हैदराबाद व अलवर चले जाएं तो उनकी जगह मरीजों को र्काैन देखेगा? कोई देखो या न देखो, इसके मुख्यालय की कोई रुचि नहीं है। उनकी ओर से तो बेशक सारे डॉक्टर छोड़ कर चले जाएं तो उनकी सेहत पर कोई असर नहीं।
जानकारों का कहना है कि कैट (सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्युनल) ने मुख्यालय को आदेश दिया है कि वह अपनी तबादला नीति पर पुनर्विचार करें। इसके बावजूद भी मुख्यालय में बैठी कमिश्नर डॉ. कमलेश हरीश तबादले करने से बाज नहीं आ रही। डिस्पेंसरी स्तर की इस डॉक्टर के दरवाजे पर जब वरिष्ठ फैकल्टी के लोग आकर मत्था रगड़ते हैं तो उनके अहम को काफी संतुष्टि मिलती है। फैकल्टी के लोग तो यहां तक बताते हैं कि कई बार तो वह मिलने तक से भी इनकार कर देती है। जैसे कि वही सबसे बड़ी लाट साहब है। हकीकत में इसका परिणाम यह होता है कि बढिय़ा-बढिय़ा डॉक्टर कॉर्पोरेशन की नौकरी छोड़ कर अन्यत्र कहीं और नौकरी कर लेते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि यहां नौकरी कर रहे तमाम फैकल्टी वालों की मार्केट वैल्यू यहां मिलने वाले वेतन से कहीं अधिक है।