मज़दूरों की जुर्रत को ललकारने वाले, हारे हैं; हारेंगे!!

मज़दूरों की जुर्रत को ललकारने वाले, हारे हैं; हारेंगे!!
October 07 07:55 2024

मारुति आंदोलन : ग्राउंड रिपोर्ट
क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा
मारुति-सुजुकी के साहसी मज़दूर, पिछले 13 सालों से अनवरत अपनी रोज़ी-रोटी, इंसाफ़ और मज़दूरों के सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं। 2012 में एक गंभीर षडयंत्र के तहत नोकरी से बर्खास्त किए गए मज़दूरों ने, जिन्हें अदालत ने बा-इज्ज़त बरी किया, लेकिन उसके बाद भी कंपनी ने वापस काम पर नहीं लिया, 30 सितंबर को एक शानदार सभा का आयोजन किया। पीडि़त मज़दूरों के परिवारों ने बहुत गहरी मुसीबतें झेली हैं। दिल्ली राजधानी क्षेत्र में कार्यरत अनेक मज़दूर संगठनों के कार्यकर्ताओं तथा मज़दूर वर्ग से प्रतिबद्धता रखने वाले प्रतिष्ठित नागरिकों ने बहुत उत्साह सभा में भाग लिया। जनसरोकार के मीडिया ने मज़दूरों की इस तहरीक को कवर किया। ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा’ की 4 सदस्यीय टीम, अपने साथियों की इंसाफ की लड़ाई में हिस्सेदारी करते हुए, मानेसर सभा में भाग लिया।

पाठक जानते ही हैं कि मारुति मानेसर प्लांट के पीडि़त मज़दूर, 18 सितंबर 2024 से मानेसर तहसील पर धरने पर बैठे हैं। अपने संघर्ष को व्यापक बनाते हुए, बहरे और निकम्मे प्रशासन के कानों तक अपनी पीड़ा पहुँचाने के लिए, 30 सितंबर को धरना स्थल पर एक ‘मजदूर सभा’ का आयोजन हुआ। इस सभा की एक ख़ासियत ने गुडग़ांव-मानेसर के लोगों तथा मीडिया को आकर्षित किया। हरियाणा तथा आस-पास के विभिन्न हिस्सों से आए, 300 बर्खास्त कर्मचारियों के परिवार वाले भी सभा में शामिल हुए। दिल्ली-एनसीआर और हरियाणा के विभिन्न श्रमिक संगठन और यूनियन, संघर्षरत मारुति श्रमिकों के साथ एकजुटता रेखांकित करते हुए शामिल हुए।

कॉम। ख़ुशीराम और कॉम। सतीश ने कार्य बहाली और न्याय के लिए वर्तमान संघर्ष का नेतृत्व करने वाली ‘मारुति मज़दूर स्ट्रगल कमेटी’ तथा ‘मारुति सुजुकी वर्कर्स यूनियन’ की ओर से बैठक का संचालन किया। कॉम। कटार सिंह ने संघर्ष समिति की ओर से चल रहे संघर्ष के घटनाक्रम को विस्तार से रखा। 2012 की षडयंत्रकारी घटना के बाद, अपने जीवन के 5 साल जेल में बिताने वाले, अमित नैन ने संघर्ष के अपने अनुभव साझा किए। ‘डाइकिन यूनियन’ से कॉम मनमोहन और ‘बेलसोनिका यूनियन’ के कॉम अजीत ने संघर्षरत मारुति श्रमिकों के साथ एकजुटता व्यक्त की। ‘क्रांतिकारी मजदूर मोर्चा, फऱीदाबाद’ से कॉम। सत्यवीर सिंह, टीयूसीआई से कॉम। विमल, ‘आईएफटीयू सर्वहारा’ से कॉम। सिद्धांत, ‘आईएमके’ से कॉम। राजू, ‘मजदूर सहयोग केंद्र’ से कॉम। सुभाषिनी, ‘श्रमिक संग्राम समिति’ से कॉम। शुभाशीष, ‘पीएसवाईए’ से कॉम। मंदिरा, ‘मजदूर समाचार’ से कॉम। नरेश, ‘कलेक्टिव’ से कॉम। शौर्य व अन्य वक्तायों ने सभा को संबोधित किया। मारुति श्रमिकों के परिवार के सदस्यों में से, परवेश और रेनू ने बैठक को संबोधित किया। बैठक में ‘मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान’ (मासा), ‘एआईसीडब्ल्यूयू’, ‘एआईयूटीयूसी’ के प्रतिनिधि भी शामिल हुए।

‘क्रांतिकारी नौजवान सभा से कॉम। आदित्य और कॉम रोहतास, ‘पीएसवाईए’ के कॉम गौरव और ‘जेएनयू’ के छात्र साथियों ने विरोध स्थल पर जोशीले क्रांतिकारी गीत प्रस्तुत किए। आंदोलनकारी मज़दूर वक्ताओं ने 2011 से मारुति श्रमिकों के निरंतर संघर्ष, हरियाणा चुनाव के बीच मानेसर में चल रहे धरने और मारुति सुजुकी की तीन यूनियनों और कंपनी प्रबंधन के बीच चल रही समझौता प्रक्रिया के बीच वर्तमान संघर्ष के महत्व और चुनौतियों और आगे के कार्यों के बारे में विस्तार से बताया।

स्थायी-ठेका-ट्रेनी मजदूरों के जुझारू संघर्ष का आगाज़ 2011 में हुआ। लगातार 3 क़ामयाब हड़तालों के बाद, प्रबंधन को ‘श्रमिक संघ’ को मान्यता देने के लिए मजबूर होना पड़ा। यूनियन बन जाने के बाद, मजदूरों ने अन्य मांगों के साथ, मज़दूरों की गुलामी की प्रतीक, ठेका प्रथा को ख़त्म करने की भी मांग की। यूनियन को खत्म करने की प्रबंधन की साजिश के परिणामस्वरूप, 18 जुलाई 2018 को मारुति मानेसर प्लांट के अंदर, प्रबंधन द्वारा किराए पर लाए गए गुंडों ने श्रमिकों पर हमला किया, जिसका मज़दूरों ने साहसिक जवाब दिया। प्लांट में आग लगी, जिसमें एक एचआर मैनेजर की दुर्भाग्यपूर्ण मौत हुई। मज़दूरों ने नहीं, बल्कि मारुति सुजुकी के तत्कालीन चेयरमैन आर सी भार्गव ने इस घटना को “वर्ग-युद्ध” बताया था। उसी के अनुरूप राज्य मशीनरी, पुलिस- प्रशासन-न्यायपालिका-दरबारी मीडिया और कंपनी प्रबंधन ने मालिक वर्ग के प्रतिनिधियों की तरह काम करते हुए, अभूतपूर्व दमन चक्र चलाया और पीडि़त मज़दूरों को ही अपराधी हत्यारा घोषित करते हुए 546 स्थायी तथा 2500 से अधिक अस्थाई कर्मियों को बिना किसी जांच के नौकरी से बाहर कर दिया। 148 मजदूरों को जेल में डाल दिया गया।

सभा में वक्ताओं के विचारों का सार इस तरह है। मारुति श्रमिकों का ऐतिहासिक संघर्ष, देश के मज़दूर आंदोलन में एक ख़ास मुक़ाम रखता है। इस तारीखी तहरीक़ ने भारत ही नहीं दुनिया भर के श्रमिकों को भी प्रेरणा देने का काम किया है। साथ ही, पूरे देश से समर्थन हांसिल किया है।

18 जुलाई, 2012 की उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को पूरे 12 साल बीत गए हैं। सच्चाई इतने दिनों तक दबी नहीं रहती। एसआईटी, पीयूडीआर जाँच रिपोर्ट तथा नंदिता हक्सर तथा अंजली देशपांडे की शोधपूर्ण पुस्तक, ‘जापानी मैनेजमेंट, इंडियन रेजिस्टेंस’ से हकीक़त, निखर कर बाहर आ चुकी है। मारुति मज़दूरों पर समूचे मालिक वर्ग का यह हमला, पूंजीवादी दमन-उत्पीडऩ-शोषण की व्यवस्था को चलाने का एक क्लासिकल उदहारण है। जो हम कि़ताबों में पढ़ते हैं, वह सामने घटित हुआ। यह हमला, दरअसल, मालिक और मज़दूर के बीच ज़ारी, उस ऐतिहासिक लड़ाई को सामने लाता है, जिसमें मज़दूर, शोषण के विरुद्ध संगठित होकर अपनी आवाज़ बुलंद करते हैं, जिससे थर्राकर, मालिक उन्हें, उनकी इस ‘जुर्रत’ पर सबक़ सिखाते हैं!!

‘देशी-जापानी पूंजी गठजोड़’ के सभी ताबेदार; नेता, प्रशासन, पुलिस, न्यायव्यवस्था और दरबारी मीडिया ने मिलकर मज़दूरों की जुर्रत को ललकारा था। ‘इन मज़दूरों इस जुर्रत को यहीं नहीं मसला गया, तो कल दूसरे कारखानों के मज़दूर भी उठ खड़े होंगे, यूनियन बनाएंगे, ठेका मज़दूरों को भी इंसान समझते हुए, सस्ते श्रम की मालिकों की सबसे लोकप्रिय व्यवस्था, ठेका प्रथा को ख़त्म करने की मांग उठाएंगे, अपना खून चुसवाने में अड़ंगे लगाएँगे, इन्हें ऐसा सबक़ सिखाया जाए कि इनका हौसला मिटटी में मिल जाए’, इस परियोजना को अमल में लाने के मालिकों के दुस्साहस का नाम है, मारुति आंदोलन।

यह अकेले मारुति मज़दूरों की लड़ाई नहीं, बल्कि हर मज़दूर की लड़ाई है। मज़दूर इसे जीतेंगे तब भी और हारेंगे तब भी, ये बात बहुत दूर तलक जाने वाली है। मज़दूरों की जुर्रत को मालिकों द्वारा ललकारे जाने के इतिहास की यह पहली घटना नहीं है। पेरिस कम्यून में यही हुआ, 1 मई 1886 को यही हुआ, और सबसे अहम 1917 की रूस की महान बोल्शेविक क्रांति में बिलकुल यही हुआ। भले आज दुनिया भर में पूंजी के जमूरों को मिरगी के दौर पड़ रहे हैं; ‘कम्युनिज्म फेल हो गया!!’, ‘पूंजीवाद ही आखऱी मंजिल है!!’ लेकिन मज़दूरों की जुर्रत को कुचला नहीं जा सकेगा। ये आगे भी होगा। शोषण-दमन, ज़ोर-ओ-ज़बर होगा तो विद्रोह भी लाजि़मी होगा। मज़दूरों की जुर्रत को मिटाने वाले ही मिट जाने वाले हैं। वे पहले भी हारे हैं, आगे भी हारेंगे। पाब्लो नरूदा के शब्दों में; ‘तुम हर फूल को मसल सकते हो, लेकिन तुम बसंत को आने से नहीं रोक सकते। मारुति मज़दूरों को पिछले 12 सालों के पूरे हिसाब के साथ काम पर लेना ही पड़ेगा।

‘हमने क्या-क्या नहीं झेला है? शुरू में हमें भी लगता था, हमारे बच्चे ही शायद बहक गए होंगे। इन्होंने ही मेनेजर को मारा होगा। अब लेकिन सब समझ आ गया। हमारे बच्चे बेक़सूर हैं। इन्हें फंसाया गया है। इस लड़ाई में, अब हम इनके साथ हैं’। मज़दूरों के वृद्ध माँ-बाप के ये उद्गार दिल को छू गए। ‘मारुति के लोगों के बच्चे ‘इंटरनेशनल’ स्कूलों में पढ़ते हैं, हमारे बच्चे सरकारी स्कूलों में भी नहीं पढ़ पा रहे। फ़ीस भरने, स्कूल से निकाल डालने के नोटिस आते रहते हैं, दो वक़्त की रोटी की चिंता खाए जा रही है’, परिवार की महिलाओं के उद्गार आंखें नम कर गए।

4 बजे, तहसीलदार को ज्ञापन दिया गया, जिसमें मज़दूरों ने, अपनी नोकरी बहाली की मांग के साथ, यह मांग भी रखी कि 18 जुलाई 2012 की घटना की फिर से जांच कराई जाए। असली क़सूरवारों का पर्दाफ़ाश हो। सारी दुनिया को पता चले, असली क़ातिल कौन है? साथ ही एक और पीड़ादायक बात भी तहसीलदार के नोटिस में लाई गई। तहसील कार्यालय के अधिकारियों की संवेदनहीनता और मज़दूरों से खुन्नस का ये आलम है कि ग्राउंड फ्लोर के शौचालय में ताला ठोक दिया गया है, जिससे कोई शौचालय का इस्तेमाल ना कर पाए। आंदोलन में कई महिलाऐं भी हैं, लेकिन उससे इन्हें क्या!! तहसीलदार ने तत्काल प्रभाव से शौचालय का ताला खोलने के निर्देश ज़ारी किए।
सभा में, उस वक़्त, वातावरण बहुत भावुक और आक्रोशपूर्ण हो गया, जब मारुति कंपनी में काम कर रहे मज़दूरों को ले जा रही बसें वहां से गुजरीं। अपने साथियों को देखकर मज़दूर खड़े होकर बुलंद आवाज़ में नारे लगाने लगे। काम पर जाते मज़दूर भी खिडकियों से बाहर झांकते रहे, लेकिन नोकरी खोने का डर ऐसा गाफि़ल है कि सड़क पर इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे अपने कामरेडों के समर्थन में कुछ भी बोलने की उनकी हिम्मत नहीं हुई।

मारुति मानेसर के श्रमिकों के वर्तमान संघर्ष ने श्रम विभाग और सरकार को बातचीत शुरू करने और त्रिपक्षीय बैठक बुलाने के लिए मजबूर किया है। 30 सितंबर को ही, चंडीगढ़ में श्रम आयुक्त ने बैठक बुलाई थी, लेकिन मारुति प्रबंधन के अडिय़ल रवैये के कारण वह बेनतीजा रही। मजदूरों ने आंदोलन तेज करने का ऐलान किया है, जिसके तहत 10 अक्टूबर से, धरना स्थल पर भूख हड़ताल शुरू होगी। सभी साथियों द्वारा दोनों हाथ उठाकर न्याय मिलने तक संघर्ष जारी रखने के अहद के साथ सभा संपन्न हुई।

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Mazdoor Morcha
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