मजदूर मोर्चा ब्यूरो किसी भी मरने वाले को नरकवासी होते नहीं सुना गया। राजा चाहे कितना ही अत्याचारी एवं जनविरोधी रहा हो सदा ही स्वर्गवासी बताया गया है। इसी शृंखला में हरियाणा के पांच बार मुख्यमंत्री रह चुके ओमप्रकाश चौटाला का 20 दिसम्बर को स्वर्गवास हो गया। इस अवसर पर विभिन्न लोगों द्वारा दी गई श्रद्धांजलियों में उनके सद्गुणों का बखान किया गया। यानी अच्छाइयों के प्रकाशित होने के लिए मरना जरूरी है।
श्रद्धांजलि देने वालों ने उनके रचे महम कांड, शिक्षक भर्ती कांड व ऐसे ही अनेकों जनविरोधी कारनामों पर चुप रहना ही बेहतर समझा है। फरवरी 1990 में हुए महम कांड को कवर करते हुए इस संवाददाता ने जो आतंकित कर देने वाले दृष्य देखे थे वे भुलाए नहीं भूलते। महम विधानसभा के लगभग सभी गांवों को पुलिस छावनी में बदल दिया गया था। प्रत्येक गांव में एक डीएसपी के नेतृत्व में भारी पुलिस बल तैनात किया गया था। इनके ऊपर करीब 10 जि़लों व शस्त्र पुलिस के एसपी तथा चार डीआईजी तैनात किए गए थे। मसला ये था कि करीब आठ-दस गांवों में हुई चुनावी धांधली को लेकर चुनाव आयोग ने उन गांवों में पुनर्मतदान की घोषणा कर दी थी। इन तमाम बड़े-बड़े गांवों में चौटाला को एक भी वोट मिलने वाली नहीं थी। इसलिए चौटाला पुलिस एवं गुंडों के बल पर सारे वोट अपने हक में डलवाना चाहते थे। महम क्षेत्र की जनता ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए डट कर पुलिस का मुकाबला किया जिसमें अनेकों ग्रामीण शहीद हुए और चौटाला के पुत्र अभय की जान बचाने के चक्कर में एक पुलिसकर्मी भी मारा गया था। अपनी सुनिश्चत हार को देखते हुए चौटाला ने अमीर सिंह नामक उस निर्दलीय उम्मीदवार की भी हत्या करवा दी थी जिसे उन्होंने खुद खड़ा करवाया था। इस हत्या के चलत ही चुनाव भी रद्द हुआ।
इस हत्या का आरोप चौटाला ने अपने प्रतिद्वंद्वी आनंद सिंह डांगी पर लगाते हुए उनके घर पर पुलिस चढ़ाई करा दी। पुलिस गोलियां बरसाते हुए डांगी के घर पहुंची। लेकिन ग्रामीणों के सहयोग से डांगी सुरक्षित निकल भागने में सफल हुए। बाद में हुआ चुनाव उन्होंने जीत लिया। गौरतलब है कि ओमप्रकाश चौटाला विधायक न होते हुए भी मुख्यमंत्री बन गए थे और छ: महीने के भीतर विधायक बनने की शर्त पूरी करने के लिए यह चुनाव लड़ा गया था। वैसे विधायक तो वे कुरूक्षेत्र से भी बन सकते थे परन्तु उनको मरोड़ तो उस आनंद सिंह डांगी की निकालनी थी जिसने अपने बलबूते देवी लाल को अपने इस हल्के से विधायक चुनवाया था। इसी खुंदकबाजी में चौटालाजी ने इतना बड़ा खून-खराबा करा दिया था।
सत्तारूढ़ होने के बाद जैसे कि अपेक्षा थी चौटाला ने सत्ता का पूरा दुरुपयोग करते हुए खुला खेल फरूखाबादी खेला था। कानून वह होता था जो चौटाला जी के मुंह से निकलता था। इस दौरान उन्होंने चुन-चुन कर लोगों से बदले लिए। शायद ही कोई उद्योगपति एवं धनाढ्य बचा होगा जिसकी जेब में इन्होंने हाथ न डाला हो। गन्नौर (सोनीपत) की एक बड़ी स्टील फैक्टरी जिसमें हजारों लोग काम करते थे, को इतना लूटा कि मालिक को फैक्टरी बंद करके जाना ही लाभकारी लगा।
फरीदाबाद की आयशर कम्पनी को भी इन्हीं के चक्कर में भागना पड़ा। आयशर ट्रैक्टर के हजारों मज़दूरों का बकाया हिसाब तक न मिल पाने के पीछे भी इन्हीं का हाथ रहा था। ऐसी ही करनाल की एक जूता फैक्टरी द्वारा पर्याप्त चंदा कहें या फिरौती न देने पर उसके सामने खाई खुदवा दी गई थी। ये तो चंद उदाहरण हैं कथा बहुत लम्बी है। इस संवाददाता के बेखौफ एवं सच्चाई लेखन से दुखी चौटाला जी ने एक के बाद एक पांच आपराधिक मुकदमे, सन् 2001 से लेकर 2003 तक दर्ज कराए थे। इनमें से एक तो भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या का भी था। बेशक इन तमाम झूठे मुकदमों में मैं बरी तो हो गया परन्तु दो मुकदमों में जेल यात्रा तो करनी ही पड़ी। एक मुकदमे में तो जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा था। किसी भी व्यक्ति से बदला लेने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते थे। इन्हीं के कदमों पर चलते हुए इनके दोनों बेटे अभय व अजय भी खुलकर अच्छी-खासी गुंडागर्दी मचाते रहे हैं। उन्हीं बीते दिनों को फिर से लौटाने के लिए ये दोनों बेटे जनता को बहकाने में पूरी ताकत से जुटे हुए है।
ओमप्रकाश के अलावा देवीलाल के तीन पुत्र और भी थे लेकिन उनका अत्यधिक मोह इन्हीं के प्रति रहा था, शायद उनकी विकलांगता के चलते। इसी मोह का भरपूर फायदा उठाते हुए उन्होंने वेे सब काम किए जो उन्हें नहीं करने चाहिए थे। एक बार तो जब वे विदेश से भारी मात्रा में घडिय़ा लाने के जुर्म में हवाई अड्डे पर पकड़े गए थे तो देवी लाल को भारी मन से कहना पड़ा कि आज से यह मेरा बेटा नहीं है, परन्तु यह जुमला तो दिखावटी था। पुत्र मोह तो भीतर ही भीतर पूरे जोर से उफनता रहा और मौका पाते ही सत्ता हथिया ली। उसके बाद जो काले करनामे उन्होंने किए वे इतिहास में दर्ज रहेंगे।
जब गृहमंत्री को पुलिस ने पीटा था चौटाला की चुनावी गुंडागर्दी में सहयोग करने के लिए जहां भ्रष्ट, पालतू एवं चापलूस पुलिस अधिकारियों की फौज जुटी हुई थी वहीं राज्य के गृहमंत्री सम्पत सिंह अपने अनेक लगुओं-भगुओं सहित महम के रेस्ट हाउस में मौजूद थे। पुलिस बल के दुरुपयोग, एक सिपाही के मारे जाने तथा अनेकों के घायल हो जाने से पुलिस-कर्मियों का आक्रोश इतना बढ़ गया था कि उन्होंने रेस्ट हाउस में मौजूद गृहमंत्री संपत सिंह को घेर कर पीटना शुरू कर दिया। यह देखकर उनके साथ आए लगुए-भगुए एवं विधायक भागने लगे तो उन्हें भी अच्छा-खासा प्रसाद पुलिस वालों ने दिया। यदि तुरन्त बड़े पुलिस अधिकारी बीच-बचाव कराने नहीं आते तो स्थिति अत्यंत गंभीर हो सकती थी। यह एक प्रकार की पुलिस बगावत भी थी जिसे कुछ समझदार अधिकारियों ने समय रहते सम्भाल लिया था।
नौकरी घोटाला बेशक शिक्षक घोटाले में चौटाला को दोषी सिद्ध होने पर दस साल की कैद हो गई लेकिन उनके राज्यकाल मेें अनेकों ऐसे घोटाले हुए जो कभी सिद्ध न हो सके। सरकारी सेवा में जो नौकरियां योग्यता के आधार पर मिलनी चाहिए थीं वे पूरी तरह से अपने चहेतों, चापलूसों व रिश्तेदारों में बांट दी गईं। चौटाला समर्थक कह सकते हैं कि किसी को नौकरी देना कैसे जुर्म हो सकता है परंतु योग्य व्यक्ति को अवसर से वंचित करने का क्या औचित्य हो सकता है। यह तो वही बात हुई कि घास खोदने वाले अफसरी करें और योग्य व्यक्ति घास खोदेें। इस तरह का काम करने वाले चौटाला कोई पहले शासक नहीं हुए हैं, लगभग हर शासक ने यही कुछ किया है अंतर केवल इतना है कि अन्य शासक इस काम को अत्यधिक चतुराई व सावधानी से करते थे जबकि चौटाला यह काम न केेवल अत्यंत निरंकुश बल्कि मूर्खतापूर्ण ढंग से भी करते थे।