आज़ादी आंदोलन की भुला दी गईं वीरांगनाएं

आज़ादी आंदोलन की भुला दी गईं वीरांगनाएं
January 06 00:23 2025

‘दुर्गा भाभी महिला मोर्चा, पहला सम्मेलन (5 जनवरी) तैयारी कमेटी’

क्रांतिकारी मजदूर मोर्चा
‘दुर्गा भाभी महिला मोर्चा’, 5 जनवरी 2025 को होने वाले अपने पहले सम्मेलन के वक़्त, आज़ादी आंदोलन की उन वीरांगनाओं को बा-अदब सलाम करता है, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपनी जान की बाज़ी लगा दी, लेकिन जिन्हें भुला दिया गया। खास तौर से दलित और मुस्लिम समाज के क्रांतिकारियों के साथ ब्राह्मणवादी इतिहासकारों ने न्याय नहीं किया है। इतिहास की इस विकृति को दुरुस्त करना हम सब की जि़म्मेदारी है। अपनी गौरवशाली क्रांतिकारी विरासत को ना हम भूले हैं, ना भूलेंगे और ना भूलने/ भुलाने देंगे।

उदा देवी पासी (30.06.1830-16.11.1857)
1857 की पहली जंग-ए-आज़ादी की जांबाज़ योद्धा, उदा देवी पासी का जन्म 30 जून 1830 को लखनऊ से सटे गांव उजरिया में हुआ था. यह गांव, आज, लखनऊ का पॉश एरिया ‘गोमती नगर’ कहलाता है। उनकी शादी, क्षेत्र के प्रख्यात पहलवान रहे, मक्का पासी से हुई, जो अवध की सेना में सिपाही थे। इतने बड़े हमारे देश पर इंग्लैंड की अदना सी एक कंपनी ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ के मुट्ठीभर अंग्रेज़ राज़ कर रहे हैं, यह सोचकर उदा देवी का खून खौलता था। उदा देवी जान चुकी थीं कि देश में अंग्रेज़ों के खि़लाफ़ बग़ावत ज़रूर होगी और उस जंग में उनकी हिस्सेदारी भी ज़रूर होगी। आने वाली उसी जंग की तैयारी के मद्देनजऱ, उन्होंने पति की मदद से हथियार चलाना, निशाना लगाना सीख लिया था।

अवध के चौथे नवाब, वाजिद अली शाह की पत्नी बेगम हजरत महल भी जानती थीं कि अंग्रेज़, अवध पर भी ज़रूर हमला करेंगे। वे चाहती थीं कि उस जंग में हम महिलाओं की माकूल हिस्सेदारी हो। उदा देवी तो उनसे मिलकर कह ही चुकी थीं कि अंग्रेज़ों के साथ होने वाली जंग में वे ज़रूर हिस्सा लेंगी। बेगम हजऱत महल ने उदा देवी पासी को महिला फौजी ब्रिगेड गठित करने के लिए कहा। इस तरह अवध में फ़ौज की ‘महिला बटालियन’ वज़ूद में आइ। सितंबर 1857 में आखिऱ वह घड़ी आ गई, जिसका उदा देवी को इंतज़ार था। मई में मेरठ शुरू होकर, उस वक़्त तक मेरठ, कानपुर, झांसी और दिल्ली समेत अनेक स्थानों पर हिन्दुस्तानी फ़ौज और किसानों ने मिलकर अंग्रेज़ों के अपमानजनक ‘कंपनी राज़’ के विरुद्ध बगावत का झंडा बुलंद कर दिया था। अंग्रेज़ों को दौड़ाया जा रहा था, उन पर हिंसक हमले तेज़ होते जा रहे थे।

लखनऊ में गोमती नदी के किनारे 2200 सैनिकों की एक अंग्रेज़ फौज़ी छावनी थी जिसे विद्रोही सैनिकों ने घेर लिया था और वहां तक रसद पहुंचने नहीं दी जा रही थी। एक अतिरिक्त टुकड़ी विद्रोहियों की घेरेबंदी को तोडऩे और रसद सप्लाई सुनिश्चित करने वहां पहुंची लेकिन विद्रोहियों ने उसे भी घेर लिया। दो महीने तक तीखा सशस्त्र संघर्ष चलता रहा। उदा देवी तथा उनके पति मक्का पासी दोनों एक साथ उस जंग में लड़ रहे थे। अंग्रेज़ों ने पड़ोस के जि़लों से और फौज़ी मदद बुला ली और उनका पलड़ा भारी हो गया। उस जंग में उदा देवी के पति मक्का पासी शहीद हुए और अंग्रेज़ फ़ौज विद्रोही फ़ौज की घेराबंदी तोडऩे में क़ामयाब रही।

अपने पति की शहादत के बाद उदा देवी का खून खौल उठा। वे उस वक़्त तो गोमती किनारे वाले उस मोर्चे से पीछे हट गईं लेकिन उन्होंने बदला लेने की एक बहुत ही शानदार फ़ौजी योजना बनाई जिसने अंग्रेज़ों के होश उड़ा दिए। उस सैन्य योजना के तहत उनकी सैन्य टुकड़ी ने नवंबर 1857 मे लखनऊ के केंद्र स्थित सिकंदर बाग में अंग्रेजों की वफ़ादार फ़ौज को घेर लिया और ज़ख़्मी शेरनी की तरह उदा देवी अंग्रेज़ फ़ौज पर टूट पड़ी। अंग्रेज़ सैनिकों की लाशें बिछने लगीं। अंग्रेज़ सैन्य अधिकारी ने नोट किया कि मारे गए लगभग हर सैनिक को गोली सर में लगी है और दिलचस्प हक़ीक़त ये है कि गोली, सर में किसी साइड से लगने के बजाए, सीधे ऊपर से लगी है!! ऐसा क्यों हुआ? मतलब विद्रोहियों की कोई टुकड़ी कहीं ऊपर छिपी हुई है, और वहां से नीचे सैनिकों के सर पर निशाना लेकर गोलियां बरसा रही है। अफ़सर चिल्लाया, ऊपर देखो, हमलावर ऊपर छुपे हैं, उन्हें ढूंढ़ो वर्ना हम सब मारे जाएंगे। तब उन्होंने देखा कि हथियार लेकर, उदा देवी, ऊपर पेड़ पर छुपी हुई हैं और झुरमुट से दनादन गोलियां बरसा रही हैं।

अपनी सैन्य टुकड़ी को गोलियां चलाते रहने का हुक्म सुना कर, उदा देवी हथियार लेकर और अपनी चुन्नी में गोलियां भरकर वहां मौजूद एक घने पेड़ पर चढ़ गई थीं और ऊपर झुरमुट से अंग्रेज़ सेना की लाशें बिछा रही थीं। 16 नवंबर 1857 का दिन था जब, उनका निशाना लेकर चारों ओर से अनगिनत गोलियां बरसी। वीरांगना उदा देवी पासी शहीद हुइ और उनकी लाश ही पेड़ से नीचे आइ। ‘महान बग़ावत की यादें’ नाम की अपनी प्रख्यात पुस्तक में, अंग्रेज़ सैन्य अधिकारी विलियम फोब्र्स मिशेल लिखते हैं, “उदा देवी के पास दो पिस्तौल थे। एक हाथ में और दूसरा उनकी बेल्ट में। पेड़ों के झुरमुट में उन्होंने अपनी चुन्नी का थैला जैसा बनाया हुआ था जिसमें गोलियां भरी थीं। पेड़ पर उसी एक जगह से उन्होंने हमारे दजऱ्नों सैनिकों को मार डाला।” पहली जंग-ए-आज़ादी की महान वीरांगना अमर शहीद उदा देवी पासी को ‘दुर्गा भाभी महिला मोर्चा’ का सलाम।

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Mazdoor Morcha
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