ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज अस्पताल सुधार अभियान
फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) एक माह पूर्व डीन का पदभार सम्भालने वाले डॉ. चव्हाण कालिदास दत्ताराय मरीजों को अधिक से अधिक राहत एवं सुविधाएं देने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन समझने वाली बात केवल इतनी है कि डीन केवल उतना ही कर सकने में सक्षम हैं जितना कि मुख्यालय में बैठे धूर्त पदाधिकारी चाहते हैं। उनकी जन हितविरोधी इच्छाओं का उल्लंघन करने की सजा उनके पूर्ववर्र्ती डीन भुगत रहे हैं। मुख्यालय नहीं चाहता कि 510 बेड के इस अस्पताल में 900-1000 मरीजों को ठूंसा जाए। मुख्यालय नहीं चाहता कि यहां सुपर स्पेशलिटी ट्रीटमेंट (एसएसटी) द्वारा मरीजों के हृदय रोगों का इलाज किया जाए, वे नहीं चाहते कि यहां नेफ्रोलॉजी विभाग में किडनी प्रत्यारोपण हो सके, वे नहीं चाहते कि यहां बोनमैरो ट्रॉस्प्लांटेशन (बीएमटी) द्वारा कैंसर मरीजों का इलाज हो सके। वे नहीं चाहते कि यहां आंख का कॉर्निया प्लांटेशन हो सके; कुल मिलाकर मुख्यालय नहीं चाहता कि इस तरह के महंगे इलाजों पर धन ‘बर्बाद किया जाए।
मुख्यालय चाहता है कि सभी अस्पताल उनकी नाक के नीचे चलने वाले बसई दारापुर स्थित मेडिकल कॉलेज अस्पताल की तर्ज पर काम करें। विदित है कि 600 बेड के उस अस्पताल में कभी भी 300 से अधिक बेड भरे नहीं होते। इसका बड़ा सरल उपाय है कि अस्पताल में जरूरत के आवश्यक सामान को मंगाने की बजाय मरीजों को इधर-उधर भटका कर धन की ‘बर्बादी’ को रोका जाए। मज़दूरों से नियमित वसूली करने वाला कॉर्पोरेशन उन पर खर्च करने को बर्बादी के सिवाय कुछ नहीं मानता। इसी ‘बर्बादी’ को रोकने वाले यहां के एमएस (चिकित्सा अधीक्षकों) को बतौर इनाम मेडिकल कमिश्नर का उच्चतम पद मिलता रहा है। इसी पद पर बैठ कर ये लोग देश भर के तमाम अस्पतालों में धन की तथाकथित बर्बादी को रोकने का प्रयास करते रहते हैं। इसी उद्देश्य से इन धूर्त कमिश्नरों ने खर्च करने की शक्तियों को डीन के हाथों में देने की बजाय अपने गिरोह के एमएस लोगों के हाथों में ही रखने का यथासंभव प्रयास किया है।
डीन कालिदास ने यहां आते ही कहा था कि मरीज़ को तीन-चार मिनट से ज्यादा लाइन में नहीं खड़ा होना पड़ेगा। यानी कि उसको तुर्त-फुर्त फारिग कर दिया जाएगा। लेकिन एक माह बाद भी स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन नजर नहीं आ रहा। नेफ्रोलॉजी का उदाहरण तो बहुत ही भयंकर है, वहां क्योंकि 25 मरीज ही देखे जाने की व्यवस्था है इसलिए मरीज प्रात: पांच-सात बजे तक ही टोकन ले लेने आ जाते हैं। डॉक्टर आशीष मल्होत्रा साहब 10 बजे से 12 बजे तक इन्हें निपटा देते हैं। इसके बाद डॉ. आदित्य जोशी आकर डॉक्टर मल्होत्रा की लिखी दवाओं को ऑनलाइन करने के बाद तीन साढ़े तीन बजे तक मरीजों को पर्ची लौटाते हैं। इसके बाद मरीज जाकर दवा काऊंटर की लाइन में लगता है। घंटों बाद जब उसका नम्बर आता है तो कुछ दवाएं मिलती हैं तो कुछ पर एनए (नॉट एवलेबल) लिख दिया जाता है। यहां एक और दुखदायी बात यह भी है कि यह सारी कवायद मरीज को एक ही दिन करनी होती है, यदि मरीज अगले दिन आकर दवा लेना चाहे तो उसे दोबारा से ऑनलाइन के चक्कर में लगना पड़ता है।
डॉ. कालिदास को बहुत अधिक समय तक लम्बी लाइनों को छोटी करने की चिंता नहीं करनी पड़ेगी क्योंकि जिस तर्ज पर मुख्यालय के धूर्त एवं जनविरोधी अधिकारी अस्पताल को चलवाना चाहते हैं, जल्द ही यहां का अस्पताल भी बसई दारापुर के स्तर पर आ जाएगा; तब यहां न तो अधिक मरीज आएंगे और न ही लम्बी लाइनों की मुसीबत होगी। मुख्यालय के बताए रास्ते पर चलते हुए कॉर्डियोलॉजी विभाग बीते एक माह से ठप पड़ा है क्योंकि वहां से दो विशेषज्ञ डॉक्टरों को भगा दिया गया है। इसी तरह नेफ्रोलॉजी व न्यूरोलॉजी में जहां पहले ही डॉक्टरों की कमी थी वहां से भी एक-एक विशेषज्ञ को चलता कर दिया गया है। बीते एक माह में बीएमटी का भी कोई केस यहां पर नहीं किया गया है क्योंकि प्रत्येक केस पर दवाओं के नाम पर पांच से छ: लाख रुपये की ‘बर्बादी’ होती है। इसके अलावा कैंसर मरीजों की चिकित्सा के लिए जो विशेषज्ञ डॅाक्टर नियुक्त था उसे भी खारिज कर दिया गया है। क्योंकि उसके द्वारा लिखी जाने वाली दवाइयों पर कॉर्पोरेशन का काफी धन ‘बर्बाद’ हो रहा था। कुल मिलाकर मरीजों की जान बचे या न बचे कॉर्पोरेशन का धन तो बचा ही रहेगा।
दरअसल, कार्पाेेरेशन चाहता है कि पांच से छह लाख में मिलने वाले विशेषज्ञ डॉक्टर की जगह डेढ़ से दो लाख रुपये मासिक वाले ऐसे डॉक्टरों को बैठा दिया जाए जो केवल वही सस्ती सस्ती दवाएं लिखें जिन पर कार्पाेरेशन का अधिक धन बर्बाद न हो। कुल मिलाकर कार्पाेरेशन का उद्देश्य बड़ा स्पष्ट है कि मज़दूरों से पैसा तो जी भर के लिया जाए और खर्च मुट्ठी भींच कर किया जाए।
सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की सेवाएं लेने का प्रयास चार सितंबर को कॉर्पाेरशन की वेबसाइट पर फरीदाबाद मेडिकल कॉलेज, अस्पताल में मेडिकल ऑन्कोलॉजी, सर्जिकल ऑन्कोलॉजी, प्लास्टिक सर्जरी/बन्र्स, नेफ्रोलॉजी/ हीमोडायलिसिस, यूरोलॉजी, कार्डियोलॉजी, रिप्रोडक्टिव मेडिसिन, न्यूरोलॉजी, मेडिकल गैस्ट्रोइन्ट्रोलॉजी, सर्जिकल गैस्ट्रोइंट्रोलॉजी, एंडोक्राइनोलॉजी एवं डायबेटोलॉजी, पीडियाट्रिक सर्जरीर्, हयूमेटोलॉजी, न्यूरो सर्जरी, वैस्कुलर सर्जरी, कार्डियो वैस्कुलर सर्जरी, हेमेटोलॉजी, इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी और रेडियोलॉजिस्ट विभाग में सुपर स्पेशलिस्ट सेवाएं लेने के लिए डॉक्टरों से आवेदन मांगे गए हैं। यह कोई नियमित भर्ती नहीं होगी। इन्हें प्रति केस आधार पर भुगतान किया जाएगा। इन पर लागू शर्तों के अनुसार ओपीडी में प्रति केस 280 रुपये और प्रोजिसर (ऑपरेशन) सीजीएचएस रेट का चालीस प्रतिशत भुगतान किया जाएगा। इनके ऊपर नौ से चार की ड्यूटी का नियम भी लागू नहीं होगा, काम की आवश्यकता के अनुसार ही ये अस्पताल में आया करेंगे और काम निपटा कर चले जाया करेंगे। ओपीडी में एक दिन में बीस मरीज से अधिक का भुगतान नहीं मिलेगा, जाहिर है कि यदि इससे अधिक मरीज हुए तो वो इलाज से वंचित रह जाएंगे। चयनित होने पर इन सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों को चौबीस घंटे सातों दिन कॉल पर उपलब्ध होना होगा। अपने विशेषज्ञता क्षेत्र में इलाज के सभी मामलोंं की जिम्मेदारी उनकी होगी। अस्पताल में नियमित किए जाने का कोई दावा नहीं कर सकेंगे।
शर्तें लगाते वक्त कार्पोशन ने जिस तरह अफसरशाही का प्रदर्शन किया है, उसकी ये विशेषज्ञ कतई कोई परवाह नहीं करते। विदित है कि इस तरह के विशेषज्ञ डॉक्टर गलियों में बेरोजगार नहीं घूम रहे हैं। वे कहीं न कहीं अच्छे अस्पताल में पांच से दस लाख मासिक वेतन पर पहले से ही लगे हुए होते हैं। ये लोग मेडिकल कॉलेज से जुडऩे के नाम पर तथा अपना अनुभव और अधिक बढ़ाने के लिए इस तरह की पेशकश को स्वीकार करते हैं। ऐसे में अपनी सुविधाओं के साथ साथ कुछ आमदनी भी हो जाए तो इन्हें सुहाता है। ये लोग अफसरशाही के दबाव में काम करना पसंद नहीं करते। पूर्व डीन डॉ. असीम दास ऐसे विशेषज्ञ डॉक्टरों को प्यार से बहला फुसला कर कुछ बेहतर सुविधाओं का आश्वासन देकर इस अस्पताल में लाते रहे हैं। वे उन पर किसी प्रकार का अफसराना दबाव नहीं बनाया करते थे केवल उनसे बेहतर परिणाम लेने का प्रयास करते थे। उदाहरणार्थ कार्डियोलॉजी में डॉक्टर बिनय पांडेय नेफ्रो में डॉ. डेनिस न्यूरो में डॉ. मयंक आदि का इसी तरह यहां लाया गया था लेकिन अस्पताल के बाबू लोग इनको वेतन देते वक्त तरह तरह केे ड्रामे करते थे। वे इनके कार्य दिवस एवं कार्य समय को लेकर हर तरह की अड़ंगेबाजी लगाकर इनका वेतन रोक लिया करते थे, केवल डीन के धमकाने, सीधे एक्शन लेने के बाद ही इनके वेतन रिलीज हुआ करते थे। इनहीं चक्करों से तंग आकर ये लोग यहां की नौकरी छोड़ गए। अब देखना है कि नए डीन उन्हें कैसे ट्रीट करते हैं।
मेडिकल कॉलेज की घटती सेवाएं एटक जिला प्रधान बेचू गिरी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने बीते मंगलवार को ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के डीन डॉ. चव्हाण कालिदास दत्ताराय से मिल कर ज्ञापन उन्हें सौंपा। ज्ञापन में कहा गया है कि मरीजों को दवा और इलाज के लिए यहां सारा दिन लग जाता है। उसके बावजूद उसे पर्याप्त मात्रा में आवश्यक दवाएं उपलब्ध नहीं होती हैं। यह बहुत ही गम्भीर समस्या है। अति विशिष्ट चिकित्सा के विशेषज्ञों द्वारा नॉन आरसी की दवाइयां पहले स्थानीय खरीदारी कर मेडिकल कॉलेज द्वारा दो-तीन दिन में उपलब्ध करा दी जाती थी इसे अब बंद कर दिया गया है। इससे न्यूरोलॉजी, कार्डियोलॉजी या अन्य चिकित्सा विभाग के विशेषज्ञों द्वारा लिखी गई दवाइयां नहीं मिल पा रही हैं। मरीजों को राज्य सरकार द्वारा संचालित ईएसआई की डिस्पेंसरी में जाकर स्थानीय खरीदारी की पर्ची बनवाकर खुद खरीदनी पड़ रही है। राज्य सरकार भी मरीजों द्वारा की गई खरीदारी के बिल के भुगतान के लिए महीनों लगा देती है।
अस्पताल में सेकेंडरी केयर के अलावा कार्डियोलॉजी, न्यूरोलॉजी, नफ्रोलॉजी, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी आदि आदि अतिविशिष्ट चिकित्सा सुविधाओं में विशेषज्ञ नहीं हैं। यह पुरानी समस्या है। बार-बार भर्ती-इंटरव्यू के बावजूद इन विभागों में विशेषज्ञ बहुत थोड़े से मिल पाए। अब सुनने में आ रहा है कि कुछ डिपार्टमेंट से विशेषज्ञ छोड़कर चले गए हैं और वह विभाग पूरी तरह खाली हो गए हैं। इससे यह समस्या बहुत विकराल हो गई है। इससे पहले ऐसी स्थिति में संबंधित मरीजों को टाईअप अस्पतालों में सलाह के लिए और चिकित्सा तय करने के लिए भेजा जाता था । वह भी बंद है, इसलिए यह अनुरोध किया गया कि
1- आरसी पर लिखी दवाइयां मरीज को फौरी तौर पर उपलब्ध कराई जाएं तथा विशेषज्ञों द्वारा लिखी गई नॉन आरसी की दवाइयां 3 दिन के अंदर अंदर स्थानीय खरीदारी कर संबंधित मरीज को उपलब्ध करा दी जाएं। 2- पहले भी बार-बार विज्ञापन देने के बाद भी अति विशिष्ट चिकित्सा के विशेषज्ञ बहुत कम आते थे। इसलिए हर हालत में प्रयास किया जाना चाहिए कि ऐसे विशेषज्ञ आएं जिससे मरीज, छात्र और संस्थान का फायदा हो। 3- यहां के डॉक्टर साहब से लेकर सफाई कर्मचारी तक सभी को समझाने की जरूरत है कि यह अस्पताल सिर्फ और सिर्फ उन लोगों का है जो उद्योगों में काम करते हुए चिकित्सा आदि सुविधाओं के लिए पहले भुगतान करते हैं और तब यहां पर इलाज के लिए आते हैं। यह अस्पताल या योजना पहले भुगतान तब इलाज के सिद्धांत पर चलता है। यहां मरीजों को खैरात नहीं दिया जाता है।