काम नहीं नाम के लिए लड़ रहे कृष्णपाल गूजर – राजेश नागर फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) अपने नाम से कराए गए एक अदद विकास कार्य को तरस रहे केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर के राजनीतिक प्रतिद्वंदी मंत्री राजेश नागर ने उनके ही गढ़ में घुस कर 22 जून को 33 करोड़ के विकास कार्यों की सर्जिकल स्ट्राइक कर डाली। ग्रेटर फरीदाबाद को अपनी बपौती समझने वाले कृष्णपाल गूजर मंत्री राजेश नागर के इस वार से तिलमिला उठे लेकिन उनका कुछ बिगाडऩे की औकात उनमें नहीं रही। ऐसे में धोबिन से पार न पाई, धोबी अपने ही गधे के कान मरोड़े वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए कार्यक्रम में नहीं बुलाए जाने का ठीकरा एफएमएडीए के चीफ इंजीनियर रमेश बागड़ी पर फोड़ते हुए 24 जून को उसका तबादला करवा दिया। गूजर ने एफएमडीए के अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी से यह आदेश भी जारी करवा लिया कि अब प्राधिकरण की ओर से जो भी शिलान्यास या उद्घाटन कार्यक्रम कराया जाए उसका आयोजन केंद्रीय मंत्री गूजर से समय लेकर ही तय किया जाए।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार रमेश बागड़ी को एफएमडीए चीफ इंजीनियर बनाने मेें केंद्रीय मंत्री गूजर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पद मिलने के बाद बागड़ी भी मंत्री गूजर की जी हुजूरी करते नहीं थकता था। विपुल गोयल और राजेश नागर को मंत्री पद मिला तो बागड़ी पाला बदल कर इनके गुट में आ गया था। बागड़ी के इस व्यवहार से मंत्री गूजर पहले ही आहत थे, गूजर के करीबियों के अनुसार मंत्री जी अपने विरोधियों को सबक जरूर सिखाते हैं। इसका बहाना गूजर को 33 करोड़ के उद्घाटन कार्यक्रम में नहीं बुलाए जाने के रूप में मिल गया। समझने वाली बात यह है कि रमेश बागड़ी जैसे अदना से चीफ इंजीनियर की इतनी औकात नहीं कि वह केंद्रीय मंत्री को निमंत्रण पत्र न भेजे, जाहिर है कि उसने यह काम नए आका राजेश नागर के इशारे पर ही किया था। राजनीतिक जानकारों ने तब ही समझ लिया था कि दो मंत्रियों की लड़ाई में रमेश बागड़ी फुटबॉल बनने वाला है क्योंकि राजेश नागर को भी अपने मंत्री होने का अहंकार है। वह अपने चेले को दोबारा एफएमडीए बुलवाने के लिए पूरी ताकत झोंक देंगे। हुआ भी वही, मंत्री राजेश नागर ने बागड़ी के तबादले को अपना अपमान समझा और तीसरे दिन ही यानी 27 जून को एफएमडीए में उसकी दोबारा बहाली करवा दी। बागड़ी का तबादला रद्द करवा कर नागर ने गूजर भी मानो यह संदेश भिजवा दिया कि वह केंद्र की राजनीति करें शहर के कामों में दखल न दें, उसके लिए मैं हूं। इज्जत रखने के लिए शिलान्यास पट्ट पर आपका नाम लिखवा दिया गया था उतना काफी है। यदि उद्घाटन का इतना ही शौक है तो फिर केंद्र सरकार से कुछ लेकर आइए और शौक से कीजिए, बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बनने की जरूरत नहीं है, सड़कों की मरम्मत और गोल चौराहों का सौंदर्यीकरण राज्य सरकार के खर्चे पर हो रहा है इसलिए उद्घाटन करना मेरा हक है।
बताया जा रहा है कि बागड़ी की बहाली का अपमान केंद्रीय मंत्री गूजर सह नहीं पाए और अपने संघी साथियों के आगे रोना रो कर नाक बचाने को कहा। संघी ने भी गूजर की इज्जत बचाने के लिए जोर लगा डाला लेकिन राजेश नागर भी पीछे नहीं हट रहे थे। इसी उधेड़बुन में चार दिन निकल गए और गूजर रोते रहे। बताया जा रहा है कि सीएम सैनी ने भी राजेश नागर का मान रखते हुए कार्रवाई करने को कहा। रास्ता निकाला गया कि रमेश बागड़ी का कोई नुकसान न हो और केंद्रीय मंत्री की इज्जत भी बच जाए। इसके तहत 2 जुलाई को बागड़ी को उनके मूल विभाग पीडब्ल्यूडी में चीफ इंजीनियर पद पर वापस भेज दिया गया।
समझने वाली बात यह है मंत्री गूजर को इस बात की खुशी नहीं थी कि उनके इलाके में काम हो रहे हैं बल्कि इसका दुख था कि कार्यक्रम में नहीं बुलाए जाने से फोटो खिंचवाने और प्रेस में चमकने का मौका हाथ से निकल गया, यानी जनहित के बजाय छवि हित चाहिए। चर्चा यह भी है कि गूजर ने 33 करोड़ के विकास कार्यों में उनकी हिस्सापत्ती मनमाफिक नहीं होने के कारण भी काम बिगाड़ा है। चर्चाओं में कितनी सच्चाई है यह तो जांच का विषय है लेकिन सुधी पाठकों को याद दिला दें कि अपने पहले कार्यकाल में मंत्री गूजर पर दिल्ली-आगरा हाईवे बनाने वाली ठेका कंपनी से दस प्रतिशत यानी साठ करोड़ रुपये कमीशन मांगने का आरोप लगा था।
इसी कारण गडकरी ने उनसे सड़क महकमा छिनाव दिया था। समझा जा सकता है कि मंत्री भी दूध के धुले नहीं हैं, रही रमेश बागड़ी की बात तो उसे एफएमडीए चीफ इंजीनियर पद पर लाया ही इसलिए गया था कि वह खुद भी लूटे और मंत्री-संतरियों को भी खिलाए। जानकार कहते हैं कि यदि बागड़ी के कार्यकाल में कराए गए विकास कार्यों की गुणवत्ता और खर्च की जांच कराई जाए तो सैकड़ों करोड़ के घोटाले सामने आएंगे। मोदी-सैनी की ट्रिपल इंजन सरकारों में इस तरह की कोई जांच होगी लगता नहीं है क्योंकि सारा भ्रष्टाचार ही सत्ता के इशारे पर नेता-अधिकारियों की मिलीभगत से हो रहा है। जहां तक सवाल 33 करोड़ के विकास कार्यों का है वह अपने आप में किसी छलावे से कम नहीं है। जहां एमसीएफ, हुडा, स्मार्ट सिटी में विकास के नाम पर सैकड़ों करोड़ के घोटालों का पता नहीं चल रहा वहां एफएमडीए के इस 33 करोड़ की तो औकात ही क्या है। इस रकम से दो चार गोल चौराहों की लीपापोती कर दी जाएगी, दो चार सड़को को चलताऊ बना दिया जाएगा, बाकी रकम सब मिलकर डकार जाएंगे।