फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) गतांक में ”सत्ता बल पर भूमाफिया के खेल में उतरे मंत्री राजेश नागर भी’ शीर्षक से प्रकाशित समाचार से बौखलाए तिगांव के विधायक एवं हरियाणा सरकार के राज्यमंत्री राजेश नागर के पालतू प्यादे, जिसका नाम भी राजेश नागर ही है, ने ‘मज़दूर मोर्चा’ के मुख्य वितरक महेन्द्र शर्मा को 29 दिसम्बर को फोन किया। उसने अपने आका मंत्री के बाबत छपी उक्त खबर का हवाला देते हुए कहा कि उसकी हिम्मत कैसे हुई ऐसा अखबार वितरण करने की? जवाब में शर्मा ने कहा कि इस बाबत अखबार के मालिक से बात करो। प्यादे ने अखबार मालिक का फोन नम्बर पूछ कर कहा कि उससे तो मैं बात कर ही लूंगा, लेकिन वह खुद भी समझ ले कि ऐसा अखबार बंटने नहीं दिया जाएगा, आदि-आदि।
इसके कुछ घंटों बाद उसने अखबार के सम्पादक को फोन करके पूछा कि उनकी हिम्म्त कैसे हुई एक मंत्री के विरुद्ध ऐसी ऊल-जलूल खबर छापने की? खबर छापने से पहले मंत्री जी का वर्जन क्यों नहीं लिया गया? पूछने पर उसने बताया कि वह भी एक पत्रकार है। ‘मज़दूर मोर्चा’ सम्पादक ने उसे सहजता से समझाया कि प्रकाशित समाचार पुख्ता दस्तावेज़ों पर आधारित होने के नाते वर्जन की कोई विशेष आवश्यकता नहीं थी, फिर भी यदि कोई तथ्य गलत लिखा गया है अथवा कोई बात मंत्री जी कहना चाहते हैं तो वे अपना वर्जन लिखित रूप में भेज सकते हैं, जिसे ज्यों का त्यों प्रकाशित किया जाएगा। मंत्री का वर्जन भेजने की बात को अनसुना करते हुए उसने कहा कि आइंदा से ऐसे समाचार न छापना। इससे मंत्रीजी की बदनामी होती है। उनसे सम्बन्धित कोई भी खबर छापने से पहले उनका वर्जन जरूर लेना। जवाब में उसे बता दिया गया कि वे किसी से पूछ कर अथवा अनुमति लेकर खबर लिखने के लिए पाबंद नहीं हैं। मजे की बात तो यह है कि उसने न तो मंत्री का कोई फोन नम्बर या अता-पता बताया और न ही अपना फोन नम्बर दिया, खुद भी ऐसा वॉटसएप कॉल किया था कि उसका नम्बर भी पता न चल सका।
‘मज़दूर मोर्चा’ सम्पादक द्वारा अन्य पत्रकारों से पूछ-पड़ताल करने पर पता चला कि वह पंजाब केसरी का एक पुराना वितरक एवं हॉकर है। पंजाब केसरी की नीति के अनुसार जो वितरक एक विशेष निर्धारित संख्या तक उसके अखबार बेच लेता है तो उसे पत्रकार का दर्जा दे दिया जाता है, भले ही उसे पत्रकारिता का ककहरा भी न आता हो। यह तथाकथित पत्रकार भी उसी श्रेणी का है। पत्रकारिता को ओढ़कर इसका मुख्य काम तमाम सत्तारूढ़ नेताओं की चाकरी करना है, जिसकी आड़ में यह तमाम सरकारी दफ्तरों, थानों, तहसीलों आदि की दलाली करता है। मंत्री राजेश नागर की तो इस पर विशेष कृपा बताई गई है। वे मीडिया प्रबन्धन के नाम पर मिलने वाली राशि भी इसको दे देते हैं जिसके बल-बूते यह प्यादा तमाम मीडिया को मैनेेज कर सके। उनकी बदकिस्मती से ‘मज़दूर मोर्चा’ मैनेज नहीं हो पाया।
संजय चंदीला को हत्या के केस में लपेटने की तैयारी मंत्री नागर के पिता रूप सिंह नागर ने हरियाणा तरंग के संपादक ज्योति संग को बताया जो संजय चंदीला उनके विरुद्ध खबरें छपवाता फिर रहा है वह खुद बहुत बड़ा शातिर अपराधी है। वह जल्द ही हत्या के एक मामले में गिरफ़्तार होने वाला है। हत्या के मामले में पूछे जाने पर संजय चंदीला ने बताया कि वर्ष 2014 मेें श्रीकांत श्रीवास्तव उर्फ डॉ. भारती नामक 75 वर्षीय बुजुर्ग को भूदत्त नामक व्यक्ति ने उनके यहां किराए पर कमरा दिलवाया था, भूदत्त इसके बाद कभी बुजुर्ग की खैर खबर लेने नहीं आया। करीब आठ माह बाद डॉ. भारती की प्राकृतिक मृत्यु हो गई थी, पुलिस ने 174 की कार्रवाई कर बाकायदा पोस्टमॉर्टम कराया था, विसरा रिपोर्ट में प्राकृतिक रूप से मृत्यु होना प्रमाणित हुआ था, पुलिस ने उन्हें क्लीनचिट दे रखी है। मंत्री राजेश नागर के पिता रूप सिंह नागर सत्ता का दुरुपयोग कर उन्हें फंसाने के षणयंत्र रच रहे हैं। आरोप है कि समाचार छपने से नाराज रूप सिंह नागर ने रविवार को अपने बाउंसर सोनू नागर, नितिन गूजर और राणा गूजर से उनको पिटवाने का प्रयास किया। वह परिवार के साथ बिहारी मार्केट जा रहे थे कुम्हारों की दुकान के पास ये तीनों दो बाइक से आए और जबरन उनकी कार रुकवा कर जान से मारने की धमकी देने लगे, उन्होंने 112 पर कॉल कर मदद मांगी, इस दौरान भीड़ जुटने पर हमलावर धमकियां देते हुए चले गए। संजय का आरोप है कि उन्होंने बीपीटीपी थाने में शिकायत दी लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की, उल्टा उन्हेंं ही परेशान किया जा रहा है। यदि अन्याय हुआ तो वह न्यायालय की शरण लेंगे। यह तो नहीं कहा जा सकता कि चंदीला ने कोई हत्या की है या नहीं की है। मज़दूर मोर्चा इस बाबत कोई टिप्पणी करना नहीं चाहेगा, हां एक बात जरूर है, जो मज़दूर मोर्चा संपादक ने खुद भुगती है। सत्ता जब चाहे जिसको चाहे किसी भी केस में लपेट सकती है। एक बार तो कोई भी आदमी लपेटा खा ही जाता है बाद में लड़ता, भिड़ता, घिसटता बेशक कोर्ट से बरी हो जाए, इस देश में अदालतों में मुकदमा लडऩा ही अपने आप में एक सजा है। विदित है कि मज़दूर मोर्चा संपादक भी 2002 में हत्या यानी 302 का आरोप झेल चुके हैं तथा अगस्त 2019 में डीसीपी एनआईटी कपूर आत्महत्या केस में भी उन्हें लपेट लिया गया था, दोनों ही मामलों में हाईकोर्ट से उन्हें अग्रिम जमानत मिली थी और आरोप रद्दी की टोकरी में फेकने पड़े थे।