एसीबी द्वारा रंगे हाथ रिश्वत लेते पकड़े गए एसआई सुमित बर्खास्त फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) धौज थाने में तैनात सब इंस्पेक्टर सुमित कुमार को डेढ़ लाख रुपये रिश्वत लेते एंटी करप्शन ब्यूरो टीम ने बीते दिनों रंगेहाथ पकड़ लिया। टीम ने उसे तो पकड़ लिया लेकिन थाना इंचार्ज महोदय, नरेश कुमार यादव के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जिसके लिए अमित रिश्वत की रकम वसूल रहा था। एसएचओ साहब ने तो पार्टी से पंद्रह लाख रुपये मांगे थे। पूछताछ में सुमित ने एसएचओ नरेश कुमार के लिए वसूली करना भी कबूल किया लेकिन एसीबी कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई।
छापामारी में पकड़े जाने के तुरन्त बाद डीसीपी अभिषेक जोरवाल ने सख्ती दिखाते हुए सुमित कुमार को बर्खास्त कर दिया क्योंकि वह अभी प्रोबेशन अवधि में था। दूसरी ओर इंस्पेक्टर नरेश कुमार को निलंबित करके विभागीय कार्रवाई के आदेश जारी कर दिए। एक ही केस में एक आरोपी को बर्खास्त और दूसरे को सिर्फ निलंबन की सजा पुलिस विभाग में चर्चा का विषय है। समझने वाली बात यह है कि सब इंस्पेक्टर प्रोगेशन पर होने की वजह से बर्खास्त किया जा सका जबकि इंस्पेक्टर पक्का कर्मचारी होने के नाते विभागीय जांच के बाद ही किसी सजा का हकदार होगा। इसके अलावा बेशक नरेश यादव का पिछला इतिहास भी भ्रष्टाचार के आरोपों से दागदार है। अनुशासन वाले पुलिस विभाग में चर्चा है कि नरेश यादव पर यह मेहरबानी कैबिनेट मंत्री राव नरवीर के आशीर्वाद से हो रही है। नाम न छापने की शर्त पर एसीपी स्तर के एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि इस एसएचओ को तो तब ही निलंबित कर दिया जाना चाहिए था जब अलफलाह में इतनी बड़ी आतंकवादी वारदात का खुलासा हुआ था, उसके ही थाना क्षेत्र में तीन हजार किलोग्राम विस्फोटक पकड़ा गया था। इतना ही नहीं इस एसएचओ के खिलाफ दस दस गांवों के सरपंचों ने भ्रष्टाचार का लिखित आरोप लगा कर कार्रंवाई करने की मांग की थी। उनका कहना है कि आला अधिकारी तब ही इसको दंडित करना तो चाहते थे लेकिन गुडग़ांव से मंत्री जी ने हाथ हल्का रखने का इशारा दे दिया।
जब मंत्री जी का सिर पर हाथ और मोटी कमाई वाला थाना हाथ में हो तो कौन नर वीर होकर उडऩे नहीं लगेगा फिर ये तो एसएचओ थे, यानी एक इलाके के राजा। एसएचओ का उडऩा तो समझ में आता है, लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि वह अकेला ही यह उड़ान नहीं भर रहा था। वह लूट कमाई का एक वाजिब हिस्सा अपने तमाम छोटे-बड़े आकाओं को भी जरूर देता रहा होगा। सर्वविदित है कि बिना लेन-देन के कोई किसी को संरक्षण नहीं देता। सत्ता के संरक्षण में बेखौफ नरेश यादव ने कुुरुक्षेत्र निवासी जीपीएस प्रोडक्ट की सेवाएं देने वाले मनोज कुमार को एक केस में लपेट लिया। केस में सब कुछ आइने की तरह साफ था लेकिन हाथ आई मुर्गी से बिना अंडे लिए कैसे छोड़ा जा सकता था? वसूली के लिए पीडि़त को चक्कर लगवाने का पुराना पुलिसिया फार्र्मूला अपनाया गया कि आखिर तंग आकर सौदेबाजी को राजी हो जाए। मनोज कुमार के साथ भी यही हुआ। बताया जा रहा है कि बकौल मनोज कुमार एसएचओ ने केस की कार्रवाई जल्दी करने के एवज में पंद्रह लाख रुपये मांगे। जाहिर है कि थाने के मुखिया होने के नाते वही रेट तय करते होंगे। वसूली के लिए चेले चपाटों को ही लगाया जाता है, सो इस वसूली का जिम्मा एसआई सुमित कुमार को सौंपा था, जाहिर है कि रिश्वत वसूलने के एवज में उसको भी चंद टुकड़े मिलते। बाकी काम एसीबी ने कर दिया।
सुधी पाठकों को याद दिला दें कि भाजपा सरकार ने बड़े जोर-शोर से एलान किया था कि यदि कोई मातहत कर्मचारी किसी भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है तो उसके उच्चाधिकारियों के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उस फार्मूले के तहत सम्बन्धित एसीपी, डीसीपी व सीपी तक भी जांच के घेरे में आते हैं। लेकिन लगता नहीं कि इन में से किसी भी अधिकारी को कोई सेक लगा हो।