आनन्द स्वरूप वर्मा 1990 के दशक के साथ ही भूमंडलीकरण का दौर शुरू हो गया। ग्लोबलाइजेशन का एक ‘बिल्ट-इन मेकेनिज्म’ है-जनआंदोलन की खबरों का ब्लैक आउट करना। इसके पीछे दलील यह है कि अगर जनआंदोलन की खबरें ज्यादा प्रकाशित होंगी तो निवेश का वातावरण खराब होगा। बाजार आधारित अर्थव्यवस्था में निवेश बहुत मायने रखता है और इसमें जनआकांक्षाओं की भरपूर अनदेखी की जाती है जो आज भारत में हो रहा है। इसके लिए राज्य की तरफ से तरह-तरह के बहाने ढूँढ़े जाते हैं। तीसरी दुनिया के देशों की समूची अर्थनीति और राजनीति विश्वबैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष द्वारा संचालित होने लगी। 1990 के दशक में ही नोबल पुरस्कार विजेता प्रमुख जोसेफ स्तिगलीज का एक दस्तावेज विश्व बैंक की ओर से प्रकाशित अर्थशास्त्री हुआ। उस समय स्तिगलीज विश्व बैंक के उपाध्यक्ष थे। उस दस्तावेज का शीर्षक था- री डिफाइनिंग दि रोल ऑफ स्टेट’ अर्थात् राज्य की भूमिका को पुनर्परिभाषित करना। उन दिनों स्तिगलीज भूमंडलीकरण की नीतियों के समर्थक थे हालांकि बाद के दिनों में वे इसके घोर विरोधी हो गये और विश्व बैंक की नीतियों के खिलाफ उन्होंने अनेक महत्त्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं। इस दस्तावेज में विभिन्न देशों को सलाह दी गयी थी कि वे सभी जनकल्याणकारी काम निजी कंपनियों को सौंप दें और राज्य एक सहजकर्ता (फेसीलिटेटर) की भूमिका निभाये। कहने का तात्पर्य यह कि शिक्षा, पेयजल, स्वास्थ्य, परिवहन आदि का निजीकरण कर दिया जाए और उन्हें अपने ढंग से काम करने दिया जाए। देश का जो कार्यकारी प्रधान हो अर्थात् प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति, वह अपनी एक कमेटी बना कर इस निजीकरण की निगरानी करे। इस दस्तावेज को तीसरी दुनिया के देशों ने बाइबिल की तरह स्वीकार किया। इसी का अनुसरण करते हुए 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ‘प्राइम मिनिस्टर्स काउंसिल ऑन ट्रेड ऐंड इंडस्ट्रीज’ का गठन किया जिसमें देश के प्रमुख उद्योगपतियों को शामिल किया गया। ये थे- रतन टाटा, मुकेश अंबानी, आर.पी. गोयनका, पी. के. मित्तल, कुमार मंगलम बिड़ला, नुस्ली वाडिया आदि । इन लोगों को विभिन्न क्षेत्रों की जिम्मेदारी सौंपी गयी। प्रधानमंत्री कार्यालय से विभिन्न मंत्रालयों को इस आशय का पत्र भेज दिया गया कि इनके नेतृत्व में बनी समितियाँ संबद्ध मंत्रालय का सर्वोच्च निकाय होंगी और इन्हें सारी जरूरी जानकारी और सुविधाएँ उपलब्ध करायी जाएँ। इस घटना की खबर अखबारों में नहीं छपी। अँग्रेजी अखबार ‘दि हिंदू’ में एक सिंगिल कॉलम की खबर दिखायी दी लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय की वेबसाइट पर इसकी जानकारी विस्तार से उपलब्ध थी। उन दिनों सोशल मीडिया भी नहीं था लिहाजा यह खबर व्यापक प्रचार नहीं पा सकी तो भी कुछ उत्साही पत्रकारों ने इस बात पर चिंता जाहिर की कि अगर शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्त्वपूर्ण मामलों की देखरेख अंबानी और टाटा करेंगे तो जनता के लिए ये सुविधाएँ कितनी महँगी साबित हो सकती हैं। धीरे-धीरे विरोध के स्वर मुखर होते गये और तब पूरी योजना को कुछ समय के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
अप्रैल 2000 में शिक्षा में सुधार पर बनी समिति के संयोजक मुकेश अंबानी और समिति के एक और सदस्य कुमारमंगलम बिड़ला ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी जिसका शीर्षक था- ए पॉलिसी फ्रेमवर्क फॉर रिफार्म्स इन एजुकेशन इसमें कहा गया था कि उच्च शिक्षा को दी जा रही सब्सिडी में सरकार को कटौती करनी चाहिए और इसकी भरपाई फीस बढ़ा कर की जा सकती है। इसमें यह भी कहा गया था कि एक ऐसा प्राइवेट विश्वविद्यालय होना चाहिए जो बाजार की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पाठ्यक्रम तैयार करे। यह भी कहा गया था कि विश्वविद्यालय परिसरों और शिक्षण संस्थाओं में किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधि पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। विश्वविद्यालयों में यूनियनबाजी को रोकने के उपाय किये जाने चाहिए।
यहाँ से कॉरपोरेट घरानों के लिए, समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सरकार से भी बड़ी भूमिका निर्धारित करने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह अबाध गति से चलता रहा और इसने धीरे-धीरे मीडिया पर भी अपना शिकंजा कस लिया। वर्ष 2016 में एक भाषण में पत्रकार पी साईनाथ ने कहा था कि ‘अगर हम लोग पाँच साल और पत्रकारिता में टिक गये तो यकीन मानिये हम सबका मालिक मुकेश अंबानी होगा। आज लगभग सारे चैनल मुकेश अंबानी के पास हैं। जो चैनल अंबानी के पास नहीं हैं उन पर दूसरे कॉरपोरेट घरानों का कब्जा है। इकोनॉमिक ऐंड पोलिटिकल वीकली’ के पूर्व संपादक परंजय गुहा ठाकुरता ने अपने एक लेख में बताया है कि किस तरह भारत के सबसे बड़े कॉरपोरेट घराने के मालिक मुकेश अंबानी और उनके रिलायंस इंडस्ट्रीज ने देश के ढेर सारे चैनलों पर अपना कब्जा कर रखा है। उनके इस खोजपूर्ण लेख के बारे में मैं इतना ही कहूँगा कि मीडिया पर कॉरपोरेट घरानों का कब्जा कितना मजबूत हो चुका है इसे जानने के लिए हर मीडियाकर्मी को यह लेख पढऩा चाहिए।’ प्रिंट मीडिया हो अथवा इलैक्ट्रॉनिक मीडिया आज इनमें से कोई ऐसा नहीं है जो कॉरपोरेट घरानों से अलग हो और जिसके सरोकार आम जनता से जुड़े हों। ऐसी स्थिति में मीडिया से यह उम्मीद करना कि वह जनता के हित की बात करेगा बिल्कुल बेमानी है। इससे भी पहले 2012 में युवा पत्रकार दिलीप खान ने अपने दो लेखों में देशभर के उन मीडिया घरानों का सर्वेक्षण प्रस्तुत था और यह नतीजा निकाला था कि किस तरह राजनीति की दशा किया और दिशा को संचालित करने में आज मीडिया बेहद महत्त्वपूर्ण हो गया है। ‘
दक्षिण भारत में निरपवाद रूप से हर अखबार और टीवी चैनल का किसी न किसी पार्टी के साथ गठजोड़ है। दिलीप खान ने आंध्र प्रदेश के साक्षी मीडिया समूह के कर्ताधर्ता जगनमोहन रेड्डी का उदाहरण देते हुए बताया है कि काले धन को सफेद करने में इस कारोबार से बेहतर कोई दूसरा काम नहीं है। उनका कहना है- ‘2004 में जगनमोहन रेड्डी जब कडप्पा से चुनाव लड़ रहे थे तो चुनाव अधिकारी को सौंपे गये ब्यौरे में उन्होंने अपनी आमदनी 10 लाख रुपये बतायी थी। अगस्त 2011 में जगन ने घोषणा की कि उनके पास 365 करोड़ रुपये की चल संपत्ति है। इसके अलावा 41.38 करोड़ रुपये की संपत्ति उनकी पत्नी के नाम अलग से थी। जगन की संपत्ति में वृद्धि दर को अंकगणित के प्रश्न के तौर पर विद्यार्थियों से प्रतियोगिता परीक्षा में पूछा जाना चाहिए। 2004 में 9.18 लाख रुपये से बढ़ कर यह 2009 में 77 करोड़ हुई, फिर 2011 में बढ़ कर 365 करोड़ हुई। परीक्षार्थी कुल वृद्धि दर की गणना करें। सही उत्तर: 3 लाख 90 हजार फीसदी से ज्यादा। इस दौरान जगन ने अगर भारत के किसी भी बैंक में वह पैसा जमा किया होता तो हद-से-हद 20 लाख रुपये तक पहुँच पाते। इससे साबित होता है कि बैंक में पैसा रखना प्रगति की राह में रोड़ा है। प्रगति अगर कहीं है तो मीडिया में है।