फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) लगातार तीसरी बार सत्तारूढ़ हुई भाजपा सरकार द्वारा बीते दस साल में की गईं विकास घोषणाएं आज तक पूरी नहीं हो सकीं, इतना जरूर हुआ कि अधिकतर परियोजनाओं में जमकर कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार हुआ। अब बीके अस्पताल की पुरानी बिल्डिंग तोड़कर 160 करोड़ रुपये से 200 बेड का जच्चा-बच्चा वार्ड बनाए जाने की तैयारी हो रही है। वार्ड बने अच्छी बात है लेकिन अगर, जिले में पहले से बने और चलाए जा रहे सामुदायिक-प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, शहरी स्वास्थ्य केंद्रों में जरूरी मेडिकल, पैरामेडिकल स्टाफ की तैनाती कर दी जाए तो बीके पर इतना बोझ न पड़े। छांयसा के मेडिकल कॉलेज का अपना अस्पताल नहीं है सरकार वहां यदि ये 160 करोड़ खर्च कर 200 बेड का अस्पताल बनाती तो मेडिकल कॉलेज के छात्रों सहित मरीजों का भला होता।
जनता को विकास कार्यों की घुट्टी पिलाने में माहिर पूर्व सीएम खट्टर ने बीते दस साल में घोषणाओं के जरिए जिले में विकास की गंगा बहा डाली। स्वास्थ्य सेवाओं की बात की जाए तो शहर में बीके अस्पताल के अलावा 93 स्वास्थ्य केंद्र हैं। इनमें 14 शहरी स्वास्थ्य केंद्र, 10 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और चार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। बताते चलें कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तीस बेड के होते हैं और इनमें सामान्य प्रसव की सुविधा होती है लेकिन मेडिकल-पैरामेडिकल स्टाफ की कमी के कारण प्रसव तो दूर सामान्य स्वास्थ्य सेवाएं भी इनमें उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं।
पूरे प्रदेश में मेडिकल, खास कर स्त्री एवं प्रसूति चिकित्सकों और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी है। बीके अस्पताल में ही 51 चिकित्सकों के हैं लेकिन तैनाती केवल 30 की है, महिला चिकित्सकों की कमी होने के कारण प्रसव ठेकेदारी स्टाफ द्वारा करवाया जाता है। ऐसे में 200 बेड का जच्चा बच्चा वार्ड बना भी लिया जाए तो भी उसे चलाने के लिए स्टाफ नहीं है, मेवला महराजपुर में खड़ा 46 बेड का तीन मंजिला सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र स्टाफ की कमी के कारण बेकार साबित हो रहा है। सरकार स्वास्थ्य सेवाओं में भर्ती भी नहीं कर रही है, ऐसे में नए वार्ड में प्रसव और नवजात को चिकित्सा कतई नहीं मिलेंगी यह तय है।
पूर्व सीएम खट्टर ने पिछले सालों में जींद, भिवानी, सिरसा, नारनौल और रेवाड़ी में मेडिकल कॉलेज का शिलान्यास किया, पढ़ाई तो दूर यहां अभी भवन के नाम पर एक कमरा तक नहीं बना है। जो बने बनाए मेडिकल कालेज हैं उन्हें भी सरकार चला नहीं पा रही है। नूंह, गोहाना, रोहतक और करनाल के मेडिकल कॉलेजों में स्टाफ की 50 प्रतिशत से भी अधिक कमी है तो जरूरी आधारभूत ढांचा भी पूरा नहीं है। छायंसा का अटल बिहारी मेडिकल कॉलेज तो नाम का है यहां दो दो डायरेक्टर बदलने के बावजूद ओपीडी भी नहीं चल पा रही है। आईपीडी, आईसीयू, ऑपरेशन थियेटर, पैथोलॉजी, रेडियोलॉजी जैसी आधारभूत सुविधाएं और फैकल्टी भी नहीं हैं। गर्भवतियों की जांच और प्रसूति तक का भी कोई इंतजाम नहीं है। बीके में 160 करोड़ की इमारत बनाने की बात की जा रही है छांसया में तो बिल्डिंग भी तैयार खड़ी है लेकिन सरकार यहां अस्पताल नहीं चला पा रही है जबकि मेडिकल कॉलेज में अस्पताल होना अनिवार्य शर्त है। यानी क्षेत्रीय जनता को स्वास्थ्य सेवाओं से और छात्रों को प्रायोगिक चिकित्सा शिक्षा से वचिंत रखा जा रहा है।
जानकारों का कहना है कि निर्माण कार्य में बहुत मोटा कमीशन बनता है, सौ करोड़ के काम में पचास करोड़ तो कमीशन अधिकारी-नेताओं की जेब में चला जाता है, इमारत बनने से जनता को भी विकास नजर आता है, यही कारण है कि सरकार इमारतें बनवाने में लगी है। इमारत बनने के बाद उसमें सेवाएं देने के लिए डॉक्टर, पैरामेडिकल स्टाफ, मशीनें, फर्नीचर व अन्य स्टाफ की जरूरत होती है इसका बजट बनाने में सरकार की रुचि नहीं दिखती।
घोषणाएं स्वास्थ्य क्षेत्र में ही नहीं हुई हैं, सेक्टर 78 में प्रदेश का सबसे बड़ा कन्वेंशन सेंटर आज तक नहीं बना, हां, उसका डिजायन बनाने के नाम पर सेंट्रल विस्टा का डिजायन बनाने वाले गुजराती आर्किटेक्ट विमल पटेल को लाखों दे दिए गए, यह बनेगा भी या नहीं कुछ पता नहीं। गुडग़ांव-पलवल मेट्रो के नाम पर खट्टर से लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने जनता को बार-बार मूर्ख बनाया। फरीदाबाद-नोएडा-गाजियाबाद मार्ग, ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस वे, मोहना एलिवेटेड रोड, बल्लभगढ़-सोहना रेलवे ओवरब्रिज चौड़ीकरण परियोजना तो केवल घोषणा बन कर रह गए। मंझावली पुल दसियों साल से अधूरे पड़ा है।
सुधी पाठकों को मालूम हो कि बीके अस्पताल की मौजूदा इमारत की शुरूआत करीब चालीस साल पहले हुई थी। तब इस प्रोजेक्ट में भवन की तरह ही चार अन्य खंड भी बनाए जाने थे, पूर्व सीएम बंसीलाल ने बाकी खंडों का निर्माण भी जल्द कराए जाने की घोषणा की थी। इसके बाद से कांग्रेस और भाजपा की सरकारें दस-दस साल रहीं लेकिन किसी ने भी निर्माण नहीं कराया। बनाना तो दूर जो बना हुआ है उसका प्रबंधन ही ठीक से नहीं कर पा रहे हैं, अस्पताल में नवजात शिशु चोरी की घटनाएं तो होती ही थीं अब चिकित्सा उपकरण भी चोर उड़ा लिए जा रहे हैं। वार्डों में भी मरीजों और तीमारदारों को पीने के पानी से लेकर स्वच्छ शौचालय तक की सुविधा उपलब्ध नहीं है। लिफ्ट भी जब-तब खड़ी हो जाती है, सर्जरी से लेकर हृदयरोगियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। हार्ट सेंटर में इलाज के नाम पर हृदय रोगियों की लूट और हत्याएं की जा रही हैं।
यही नहीं अस्पताल में आए दिन अल्ट्रासाउंड, एक्सरे मशीन खराब होती रहती है। लैबोरेटरी में जांच होती नहीं है, अगर होती है तो वो भरोसेमंद नहीं होती। मजबूर मरीजों का सारी जांच बाहर से करानी पड़ती है। स्टाफ व सुविधाओं के कमी के नाम पर बीके को रेफरल सेंटर बना दिया गया है।
प्रतिदिन औसतन तीस प्रसूता और पंद्रह से बीस साधारण बीमारियों तक के मरीजों को सफदरजंग रेफर किया जाता है। 108 एंबुलेंस वाले मोटे कमीशन की लालच में अधिकतर मरीजों को निजी अस्पताल पहुंचा देते हैं। पीएमओ-सीएमओ से लेकर सरकार तक को 108 एंबुलेंस की करतूत की पूरी जानकारी है लेकिन मोटी कमाई का साधन होने के कारण सबने आंख बंद कर रखी है। और तो और स्थानीय सत्तारूढ़ नेता भी इसका संज्ञान लेने की जरूरत नहीं समझते। 200 बेड का जच्चा-बच्चा वार्ड जब तैयार हो तो वह भी रेफरल सेंटर ही न साबित हो इसकी तैयारी भी सरकार को कर लेनी चाहिए।