— डॉ. रामवीर किसकी देखे बाट पथिक तू कोई साथ न देने वाला लोग हुए हैं स्व तक सीमित पी कर तुच्छ स्वार्थ की हाला।
लम्बी राह दूर है मंजिल साथ न कोई पथ का साथी एक मात्र अपने ही भरोसे चलना पड़ा मुझे एकाकी।
नित्य निरन्तर चलती रहती सबको पीसे समय की चाकी थोडे से जीवन में इतना देख लिया कुछ बचा न बाकी।
यूं तो मिले बहुत से जिनने साथ निभाने की कोशिश की पर जब मौका पड़ा तो आडे आ गई कोई विवशता उनकी।
यह भी ठीक हुआ अब सोचूं जो कुछ हूं अपने बल पर हूं दबा किसी के उपकारों से नहीं किसी पर भी निर्भर हूं।
जीवन एक सफर है ऐसा जिसकी निश्चित दिशा न दूरी तुम चलना चाहो न चाहो पर चलना है सदा जरूरी।
आप्तकाम जो हुए उन्हें भी यात्रा करनी पड़ती पूरी गति से छूट नहीं मिल सकती गति है जीवन की मजबूरी।