केसी लखानी के मज़दूर ग्रेच्युटी, पीएफ पाने के लिए सड़कों पर उतरे

केसी लखानी के मज़दूर ग्रेच्युटी, पीएफ पाने के लिए सड़कों पर उतरे
November 24 08:44 2024

क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा
सत्ता और प्रशासन के संरक्षण में मज़दूरों का शोषण कर रही केसी लखानी कंपनी की मनमानी के खिलाफ संघर्ष कर रहे मज़दूर मंगलवार को हक पाने के लिए सड़कों पर उतर पड़े। जिला प्रशासन को अपनी ताकत का अहसास कराने के बावजूद मज़दूरों ने शांतिपूर्ण तरीके अपनी मांगें रखीं, साथ ही संदेश दिया गया कि मज़दूरों के सब्र का इम्तेहान न लिया जाए।

सत्ता के संरक्षण के कारण उद्योगपति केसी लखानी मज़दूरों के वैधानिक हक यानी ग्रेच्युटी, भविष्य निधि आदि का लंबे अर्से से भुगतान नहीं कर रहा है। श्रम न्यायालय से लेकर हाईकोर्ट तक ने छह मज़दूरों के बकाया देय चुकाने का फैसला सुनाया हुआ है। इनमें से कई मज़दूरों की ग्रेच्युटी आदि के भुगतान का आदेश न्यायालय ने डेढ़ साल पहले ही किया हुआ है।

हाथों में लाल झंडे लिए सैकड़ों मज़दूर मंगलवार सुबह दस बजे से ही राजस्थान भवन के सामने डीसी कार्यालय वाले मोड़ पर इकट्ठे  हो गए। वहां तैनात पुलिस कर्मियों ने पूछा क्या मामला है भाई, आज फिर आ गए तो बंधी मुट्ठियों और तमतमाते चेहरे वाले मज़दूरों ने एक ही जवाब दिया कि जब तक फऱीदाबाद प्रशासन, डीसी, जि़ला वसूली अधिकारी, तहसीलदार बडख़ल तथा नायब तहसीलदार गौछी श्रम अदालत और उच्च न्यायालय का आदेश पालन नहीं करातेे, हमारी लड़ाई जारी रहेगी।

केसी लखानी मज़दूरों के आर्थिक हक अदा नहीं कर रहा बल्कि लगता है सत्ता के बल उसने जिला वसूली विभाग को खरीद रखा है। यही कारण है कि नायब तहसीलदार गौछी तथा तहसीलदार बडख़ल कहते हैं कि उन्हें के सी लखानी की किसी संपत्ति की जानकारी नहीं है। राजस्व विभाग के इतने महत्वपूर्ण पद पर बैठे इन अधिकारियों के खिलाफ गैर जिम्मेदाराना, अन्यायपूर्ण और फर्ज अदायगी में कोताही बरतने के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन पूरे कुएं में ही भांग पड़ी है।

क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा के कामरेड सत्यवीर सिंह ने केसी लखानी के अन्याय और विभिन्न विभागों द्वारा मज़दूरों के अधिकारों की अनदेखी के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने बताया कि ग्रेच्युटी भुगतान क़ानून 1972 में मज़दूर के नौकरी छोडऩे के 30 दिन के अंदर उसकी ग्रेच्युटी की सारी रक़म अदा किए जाने का प्रावधान है। नहीं किए जाने पर ग्रेच्युटी की रकम पर ब्याज और मालिक को दंडित करने का सख्त प्रावधान है। कंपनी में 5 साल पूरे करने वाले कर्मचारी को यदि किसी कारण नौकरी से निकाल भी दिया जाता है या बर्खास्त भी किया जाता है तो भी उसकी ग्रेच्युटी का भुगतान नहीं रोका जा सकता। अगर कंपनी का दिवाला भी पिट जाए तो भी मज़दूरों की ग्रेच्युुटी आदि का भुगतान समय पर किया जाएगा।

औद्योगिक विवाद क़ानून 1947 के तहत 100 से अधिक मज़दूरों वाली कंपनी का प्रबंधन अपनी मर्जी से किसी कामगार को नहीं निकाल सकता। कंपनी बंद करने के लिए भी श्रम विभाग की अनुमति लेनी होगी। लखानी की कंपनी में कभी भी 1500 से कम मज़दूर नहीं रहे। बावजूद इसके श्रम विभाग एवं श्रम न्यायालय मज़दूरों को उनका हक नहीं दिलवा पा रहे।

केसी लखानी ने न ही मज़दूरों के मासिक वेतन से काटी पीएफ़ की राशि और न ही अपना अंशदान सरकारी खज़ाने में जमा किया। पीएफ़ भुगतान क़ानून, 1952 के तहत, अमानत में खय़ानत अर्थात भारतीय दंड संहिता की धारा 406 और 420 के अंतर्गत अपराध है, हालांकि उसके खिलाफ केस दर्ज हो चुका है अगर ईमानदारी से जांच हुई तो लखानी को जेल जाने से कोई नहीं रोक पाएगा।

क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा लखानी द्वारा उत्पन्न सभी बाधाओं और आपत्तियों के बावजूद मज़दूरों की ओर से बाकायदा क़ानूनी और जन-आंदोलनात्मक लड़ाई लड़ रहा है। मज़दूरों के बक़ाया वेतन, ग्रेच्युटी, ओवरटाइम, छुट्टियों का पैसा और बोनस का भुगतान कराने की लड़ाई श्रम अदालत तथा सड़कों पर आंदोलन इसी तरह जारी रहेगा। अंत में डीसी के जरिए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को मज़दूरों का मांग पत्र भेजा गया।

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