फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) प्रधानमंत्री मोदी द्वारा स्वच्छता अभियान के नाम पर की जाने वाली नौटंकी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए केन्द्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर ने 22 सितम्बर को गोल्फ क्लब में अपनी नाटक मंडली बुलाई। इस मंडली में विधायक मूलचंद, विधायक सतीश फागना, विधायक धनेश अदलखा के अलावा निगम अधिकारी व तमाम भाजपाई पार्षदों के साथ-साथ उनके लगुए-भगुए भी एकत्र हुए। घर हो या शहर इसकी सफाई नियमित की जानी चाहिए। अपने-अपने घरों की सफाई तो सभी लोग कर लेते हैं, लेकिन शहर की सफाई का काम नगर निगम द्वारा किये जाने का प्रावधान है। इसके लिए तमाम नगरवासियों से अच्छा-खासा टैक्स वसूला जाता है। मोदी ने तो प्रधानमंत्री बनने के बाद सफाई के नाम पर एक विशेष उपकर भी लगा कर हज़्ाारों-करोड़ों की वसूली इस देश से कर ली है। इतना सब होने के बावजूद शहर में बढ़ती गंदगी से निजात पाने के नाम पर केन्द्रीय मंत्री गूजर स्वच्छता अभियान की नौटंकी चला रहे हैं।
गोल्फ क्लब में हुई इस नाटकबाजी में तमाम नाटकबाज नेताओं ने बढिय़ा-बढिय़ा भाषण व सुझाव दिए। जब काम कुछ न करना हो तो इस तरह की भाषणबाजियों से जनता को बहलाना बेहतर समझा जाता है। यहां प्रस्ताव पास किया गया कि सभी पार्षद तथा विधायक एक-एक वार्ड को गोद लेकर उसके विकास एवं स्वच्छता पर पूरा ध्यान केन्द्रित करें। क्या इसका मतलब यह समझा जाए कि अभी तक तो किसी ने इस ओर ध्यान दिया ही नहीं था जो अब देंगे? ध्यान दिया नहीं था तो ये तमाम छोटे-बड़े नेता कर क्या रहे थे? करना क्या था, सभी लोग लूट कमाई के नए-नए स्रोत तलाशने व जनता को लूटने में लगे हुए थे और लगे रहेंगे। जहां तक सवाल गोद लेने का है तो मंत्री कृष्णपाल गूजर ने जो तिलपत गांव गोद ले रखा है उसकी सुध उन्होंने बीते 11 साल में कभी ली है क्या? उनके ही क्या वर्तमान और पूर्व विधायकों द्वारा गोद लिए गए गांव, स्कूल, पार्क, स्वास्थ्य केंद्र आदि में कुछ बदलाव हुआ है क्या?
यह खुली हुई सच्चाई है कि बीते दस साल में मंत्री हो या विधायक, पार्षद सबने विकास कार्यों के नाम पर जमकर लूटपाट की। जानकार कहते हैं कि पार्षद अपने ही वार्ड में विकास कार्य नहीं करा पाते तो गोद लिए वार्ड में क्या करेंगे। इससे भी बड़ी बात कोई पार्षद अपने वार्ड मेें किसी दूसरे पार्षद को काम करने देकर जनता के बीच खुद को निकम्मा क्यों साबित कराएगा। यह कुछ और नहीं बल्कि नौटंकी है जो जनता को मूर्ख बनाने के लिए खेली गई थी।
नौटंकी नहीं होती तो मंत्री विपुल गोयल जो इस महकमे का मालिक है वह मौजूद होता, वह अगर कोई आदेश देता तो कुछ समझ में आता। सब जानते हैं कि कोई भी केंद्रीय मंत्री प्रोटोकॉल के तहत बैठक में सम्मान तो पा सकता है लेकिन राज्य सरकार द्वारा संचालित विभाग उसके प्रति जवाबदेह नहीं हैं, यानी राज्य में कोई काम कराने के लिए उस केंद्रीय मंत्री को उस विभाग के मंत्री से गुहार लगानी पड़ेगी। गूजर जिन पार्षदों और निगम अधिकारियों के साथ बैठक कर रहे थे उनकी लगाम कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल के हाथ में है, रही विधायक धनेश अदलखा और सतीश फागना की बात तो उनको जिताने का श्रेय भले ही गूजर ले लेें लेकिन उनकी औकात भी कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल या मंत्री राजेश नागर से ज्यादा नहीं है। समझा जा सकता है कि महकमे के मालिक की गैरमौजूदगी में निगमायुक्त व अन्य अधिकारी औपचारिकताएं निभाते हुए हां में हां तो मिला सकते हैं लेकिन आखिरी निर्णय तो मालिक का ही चलेगा। बैठक में कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल का नहीं आना ही इसके निरर्थक होने का पक्का सुबूत है।